निमाड़ अंचल के आदिवासियों की परम्परागत न्याय व्यवस्था

दीवान डुडवे:

प्राचीन समय से आज तक आदिवासी अपनी रूढ़ि-प्रथा अर्थात रीति-रिवाजों से प्रशासित व संचालित होते आ रहे हैं, इसी को हम परम्परागत सांस्कृतिक व्यवस्था कहते हैं। इनकी अपनी परम्परागत न्याय व्यवस्था है, जीवनशैली है, तथा वे अपने अपने रीति-रिवाजों से शासित व प्रशासित होते हैं, अर्थात इनका अपना विधान (कानून) है, जो कि रूढ़ि-प्रथा के रूप में है। आदिवासी, जन्म से लेकर मृत्यु तक के विधि विधान में अपने खुद के रीति-रिवाजों का ही पालन करते थे और आज भी पालन करते हैं। जिस तरह से अन्य धर्मों के लोग, जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि अपने धर्म के नियमों व विधि विधानों से प्रशासित होते हैं, तथा उनका कड़ाई से पालन करते हैं, ठीक वैसे ही आदिवासी भी अपने रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, जो कि अन्य किसी भी धर्म व सम्प्रदाय के नियमों व विधि विधानों से मेल नहीं होते हैं, वे सांस्कृतिक होते हैं। 

वर्तमान व्यवस्था अर्थात कानून व न्याय व्यवस्था जिनमें, पुलिस, कोर्ट, कचहरी की व्यवस्था से आदिवासियों की व्यवस्था बिलकुल अलग है। ऐसा इसलिए है क्यूँकि वे अपनी रूढ़ि-प्रथाओं और रीति-रिवाजों से चलते हैं। इस बात को भारतीय संविधान भी मान्यता देता है। आदिवासियों के बीच में कोई विवाद, झगड़ा, या विवाद हो जाए तो उसे गाँव के पंचों (मुखिया) के सामने रखा जाता है। पंच आपस में निर्णय लेकर विवाद के संबंध में अपना फैसला लेते हैं, जिसे गाँव के सभी लोगों को आवश्यक रूप से मानना होता है। यदि कोई पंचों के निर्णय की अवहेलना करता है तो उस पर दंड की व्यवस्था भी है। पश्चिमी निमाड़ के आदिवासी क्षेत्रों में प्रत्येक गांव में पाँच मुखिया होते हैं जिनमें, गांव का पटेल, पुजारा, वारती, गांव डाहला, व कोतवाल होते हैं, इन्हें पंच भी कहा जाता है। 

हम कह सकते हैं कि आदिवासी समाज की न्याय व्यवस्था वर्तमान न्याय व्यवस्था से भिन्न ज़रूर है लेकिन मजबूत है। स्वराज का अर्थ भी यही है कि हर व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था के उसी अनुशासन का अनुपालन करे। इस तरह से आदिवासी अपनी प्राचीन परंपरागत सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था से संचालित होते हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था के कानून, आदिवासियों को इस व्यवस्था में शामिल करना चाहते हैं। आदिवासी इसमें असुरक्षित महसूस करते हैं, जिससे वह विडम्बना में पड़ गए हैं। इस बात को वर्तमान प्रस्थापिकों को सोचना चाहिए, ये उनके लिए पुनर्विचार का विषय है।

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  • ग्राम देवली, जिला-बड़वानी, मध्यप्रदेश के रहने वाले दीवान डुडवे बिरसा ब्रिगेड व आदिवासी छात्र संगठन से जुड़े हैं और वर्तमान में एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

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