“भारी विस्थापन के बीच क्या नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ पाए हैं हम?”

प्रियंका खेस:

पिछले कई वर्षों से आपने देखा होगा कि किस प्रकार गाँवों की आबादी धीरे-धीरे घटती जा रही है। जो गाँव कभी भरा-पूरा हुआ करता था,आज वह सुनसान पड़ा है। गाँव का वह चबूतरा जहां हमेशा बच्चे, बूढ़े, नौजवानों की महफिलें सजती थी, आज उजाड़ पड़ा है। अब दो-चार गाँव की वृद्धा ही हैं, जो उस पर पड़ी रहती हैं। शायद वे भी इस बाग के उजड़ने का शोक मनाती होंगी। मेरे पिताजी भी अक्सर इसी बात का शोक मनाया करते हैं। वो बताते हैं कि पहले गाँव में कितनी रौनक हुआ करती थी। प्रत्येक घर में 7-8 लोग तो होते ही थे, और त्योहारों के समय का तो कहना ही क्या! उस समय तो एक मेला सा लग जाता। हर रोज़ कोई ना कोई सवारी आती अपने साथ किसी प्रवासी को लिए हुए। पर आज ना तो सवारी है और ना ही प्रवासी। अब तो जो बचे-खुचे लोग थे वे भी शहरों की ओर अग्रसर होने लगे हैं।

आखिर इस भारी विस्थापन का कारण क्या है? आज का आधुनिक युग विभिन्न प्रकार की तकनीकों से लैस है, जिसका बीजारोपण शहरों में ही हुआ है। कुछ ज्ञानी पुरुष कह गए हैं कि व्यक्ति को समय के साथ कदम से कदम मिला कर चलना चाहिए। इसी उक्ति को सार्थकता प्रदान करने के लिए गाँव से लोग शहराभिमूख होने लगे हैं। शहरों की इस चकाचौंध में गाँव के दीये कहीं लुप्त से हो गए हैं। कारखानों और गाड़ी-मोटरों के धुंए में गाँव की यादें धुंधला गई हैं। धीरे-धीरे लोग इस पराए शहरों को अपना मान बैठे हैं और अपने गाँव-कस्बों को पराया कर दिया है। गाँव की एकड़ों भूमि को छोड़ बीघे भर ज़मीन के लिए दर-दर भटकते लोग, शहरों में बसने के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार हैं।

ऐसे ही हमारे परिचित हैं जो रोज़गार की तलाश में झारखंड के सिमडेगा ज़िले के एक छोटे से गाँव से राउरकेला आए, तब यह शहर विकसित हो ही रहा था। कहते हैं कि उस वक्त नौकरी की इतनी मारा-मारी ना थी। थोड़ा प्रयास करने पर कोई ना कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल ही जाया करती थी। सौभाग्य से इन्हे भी एक स्कूल में पियोन की नौकरी मिल गई। स्कूल की ओर से उन्हें रहने के लिए एक छोटा सा घर भी मिल गया। शहर में नौकरी और घर, बस और क्या चाहिए था, जीवन बड़े ही आराम से कटने लगा। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हो गई। 

जब रिटायरमेंट का समय नज़दीक आने लगा तो उन्हें घर की चिंता सताने लगी, क्योंकि गाँव तो पहले ही छोड़ चुके थे। अब उनके पास शहर में ज़मीन खरीदने के अलावा और कोई उपाय ना था। इधर शहर जैसे-जैसे विकसित हो रहा था, ज़मीन के भाव आसमान छू रहे थे। अब तो लोग अनाबादी ज़मीन भी लाख-लाख रुपए देकर खरीदने लगे थे। उन्होंने भी सोचा की ऐसी ही कोई ज़मीन मिल जाए तो सस्ते में शहर में अपना भी एक मकान बन जाएगा। खोजबीन करते-करते उन्हें ऐसी एक ज़मीन मिल गई जो कुछ 10-11 डिसमिल रही होगी। इस ज़मीन को उन्होंने करीब दो-ढाई रुपए में खरीद लिया। लेकिन अफसोस कि कुछ दिनों बाद ही पता चला कि उस ज़मीन पर किसी और का भी दखल है। अब वो पैसे और ज़मीन दोनों से ही हाथ धो बैठे। ऐसी ठगबाज़ी ना जाने कितनों के साथ हुई होगी, लेकिन लोग धोखा खाने पर भी इस शहर को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। शहरों में रहने में ही वे खुद को कृतार्थ समझने लगे हैं। ना जाने इन शहरों में ऐसी कौन सी बात होती है जो बनावटी होने पर भी बड़ी ही आकर्षक लगती है।

मैंने कई लोगों के बच्चों को यह कहते सुना है की वो कभी गाँव गए ही नहीं, और जो गए भी उन्होंने उसे कभी अपना माना ही नहीं। वो बस अतिथि बन कर गए और वापस लौट आए। उन्हें तो ये तक नहीं मालूम कि उनकी ज़मीनें कितनी हैं? कौन-कौन सी उनकी ज़मीनें हैं? ज़मीन के कागज़ात और पट्टा आदि कैसे देखे जाते हैं, मालगुजारी, घरबारी कैसे दी जाती है। वे तो शहरों की कुछ स्क्वायर फीट ज़मीन पर बने घर को ही अपनी जायदाद समझ बैठे हैं।

जब चुनाव का मौसम आता है तो लोग शहरों में ही अपना वोट डालते हैं, क्योंकि उनका पहचान पत्र गाँव का है ही नहीं। सिर्फ वोटर कार्ड ही नहीं आधार, ड्राइविंग लाईसेंस, पैन कार्ड आदि सभी पर तो हमारे शहर का ही ठिकाना है। गाँव की भूमि तो बस जाति प्रमाण पत्र या मूल निवास प्रमाण पत्र पाने का साधन मात्र बनकर रह गई हैं। अगर आरक्षण हटा जाए तो शायद वो भी ना बचें। 

आज जब हम खुद को मूलनिवासी कहते हैं तो क्या वास्तव में हम अपने मूल से जुड़े हुए हैं? क्या हम इस नई पीढ़ी को उनकी जड़ों से जोड़ पाए हैं? हम निश्चित तौर पर चाहते हैं कि हमारे बच्चों का भविष्य उज्वल हो और इस कारण हम शहरों की ओर अग्रसर भी हुए ताकि उन्हें सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लेकिन इन शहरों के प्रति गहरा आकर्षण कहीं उनसे उनकी पहचान तो नही छीन रहा है? वर्षों पहले इस भूमि पर जो बीज हमारे बाप-दादों ने लगाया, उसे तो आज एक विशाल वृक्ष होना था, पर इससे पहले ही हमने इसकी टहनियां काट ली। पहले एक फिर दो ऐसे धीरे-धीरे सारी टहनियाँ कट गई। अब इस पेड़ का बस ठूंठ मात्र ही रह गया है, जिसे सींचने वाला कोई नहीं बचा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब यह ठूंठ जाड़े की अंगीठी में स्वाहा हो जाएगा या दीमक इसे मिट्टी में मिला ले जाएगी और हम मूलनिवासी नहीं बस प्रवासी बनकर रह जाएंगे।

फीचर्ड फोटो आभार: मैनफर्ड सोमर

Author

  • ओडिशा के सुंदरगढ़ ज़िले की रहने वाली प्रियंका, हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और उन्होंने पिछले साल यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। उन्हें खासतौर पर कविताएँ लिखना पसंद है, वर्तमान में वह नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं।

Leave a Reply