बाज़ारवाद की चपेट में आ रहे हैं आदिवासी युवा

आदिवासी युवाओं को आइना दिखाया एक लेख।

महेश मईडा:

युवाओं के पढ़ाई-लिखाई से जुड़ाव पर पिछले कुछ सालों से और खास तौर पर इस कोरोना काल के दौरान बहुत प्रभाव पड़ा है। युवाओं की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ने की वजह से हमारा युवा वर्ग बाज़ारवाद एवं अपसंस्कृति के प्रभाव में आकर चकाचौंध भरी कृत्रिम दुनिया में खोते जा रहे हैं। इसमें भी सबसे ज़्यादा असर पड़ा है सोशल मीडिया नेटवर्किंग का। जिन युवाओं को पढ़ाई, कोचिंग, सरकारी भर्ती, प्रतियोगी परीक्षाओं पर फोकस करना चाहिए वे आज फेसबुक व्हाट्सऐप, इन्स्टाग्राम पर नई-नई स्टोरी लगाने, व्हाट्सऐप पर स्टेटस लगाने, नए लुक में अपडेट होने, डीएसएलआर (dslr) कैमरों द्वारा मॉडलिंग फोटोशूट करवाने, हरियाणवी लहजे में डॉन बनने, दोस्तों का व्हाट्सऐप ग्रुप बनाकर गैंगस्टर टाइप छवि बनाने, तेज़ स्पीड में बाइक चलाने, मुर्गे जैसी बालों की कटिंग और बकरे सी दाढ़ी रखने, सारा दिन लूडो जैसे ऑनलाइन गेम खेलने, होटल- ढाबे-मिडवे पर जाकर बर्थडे सेलिब्रेशन पार्टी करने, रोड किनारे बैठकर एवं जंगलो में जाकर दारू व मीट पार्टी करने, ढाबों पर जाकर बीयर पार्टी करने, शराब ठेकों पर झगड़ा करने, अपने पथभ्रष्ट साथियों के साथ मिलकर हथियारों के साथ फोटो अपलोड करने, बुलेट, बुलेरो, स्कॉर्पियो, केम्पर के साथ स्टंट करने, अपने आप को पोलिटिकल किंग मेकर समझने, उधारी के पैसों से बीड़ी-सिगरेट, गांजा-चरस, स्मेक, अफीम, डोडा, दारू पीने, हथियार लहराने का शौक रखने, हरयाणवी भाषा मे बात करने के प्रति ज्यादा झुकते दिखाई दे रहे हैं।

इनमें से अधिकांश, ग्रामीण पृष्ठभूमि के निम्न मध्यम वर्गीय किसान-आदिवासी परिवारों के बच्चे हैं। इनके परिजन इनसे उज्वल भविष्य की उम्मीद पाले बैठे हैं कि उनका बेटा/बेटी उच्च शिक्षित होकर, गाँव-ढ़ाणी-समाज, देश का नाम रोशन करे। उम्मीद पाले यह मां-बाप उन पर भरोसा करके अपनी हाड़-तोड़ मेहनत से कमाई पूँजी को इन युवाओं पर इस आस में लगा रहे हैं ताकि उनका बच्चा बड़ा होकर आर्थिक रूप से सक्षम बने एवं उनके बुढ़ापे का सहारा बन सके।

परंतु ये मुर्गा कटिंग वाले पथ भ्रष्ट युवा, डीजे बजा कर, अश्लील गानों पर नाच-गाना कर अलग ही दुनिया में जा रहे हैं। यदि इनके परिवार वालों या सामाजिक लोगों द्वारा इनको समय रहते नहीं रोका गया, तो इनका भविष्य अंधकार मय हो जाएगा। ये दिग्भ्रमित लोग ना सिर्फ़ प्रशासन बल्कि सीधे राज्य एवं केंद्र सरकारों से टकराने की बात करतें हैं, पुलिस के सामने हमेशा अपने को तीस मार खां समझते हैं और कानूनों का उल्लंघन करते हैं। यदि ये युवा पीढ़ी इसी तरह आधुनिकता और आभाशी दुनिया के नशे में चूर रहे, जिन पर समय रहते परिवारजनों तथा समाज के प्रबुद्ध जनों ने ध्यान नहीं दिया, तो इसका परिणाम इनके साथ-साथ समाज के लिये भी बहुत घातक सिद्ध होगा।

दरअसल, वैसे यह कल्चर कमोबेश हर क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे जो लुभावनी चीज है वह है चमक-दमक भरी दैनिक दिनचर्या, फिल्मी दुनिया का चमक-दमक, अपने आप को सुपर बताने और दिखाने का आकर्षण। हरियाणा-पंजाब जैसे सम्पन्न प्रदेश के युवा अगर कुछ कर रहे हैं तो वो बहुत पहले से सम्पन्न हैं क्य़ूँकि उनमें से हर एक के पास ज़मीन का बहुतायात में है। हालाँकि उन प्रदेशों में भी बहुत से युवा अपराध के अंधकार भरे रास्तों की ओर जाने-अनजाने बढ़ रहे हैं। सम्पन्न होने के बावजूद भी इन इलाकों से भी नैतिक/सांस्कृतिक गिरावट की बातें सुनने में आ रही हैं। इसका ताज़ा उदाहरण ओलंपियन मुक्केबाज सुशील कुमार है, जो हत्या के केस में आज सलाखों के पीछे हैं। परन्तु हमारे यहां के आदिवासी युवा, खासकर जो अभी-अभी यौवन की ओर बढ़ रहे हैं, उनके हाथों में एंड्रॉयड फोन आते ही वो हरियाणा के लठेतों को, और उनके फेसबुकिया ठाठ को देखकर बहुत जल्दी वैसे ही दिखने-बनने की दिशा में चल निकलते हैं। 

फिर शुरू होता है इनके….यारां दा अड्डा, आदिवासी शेर, आदिवासी गैंग, आदिवासी स्टार, युवा नेता-नेती, आदिवासी टाइगर, जिगरी.., धांसू आदिवासी भाई, देसी आदिवासी भाई, गामा हाले छोरे, यारां दी बादशाहत,  अलाना-फलाना ग्रुप, फलाना गैंग, देसी बॉयज, वगैरह-वगैरह गैंगनुमा लड़को की टोली बनना और दिखावटी चोंचलेबाज़ी। काम के नाम पर माफिया लोगो के साथ सेल्समेन बनकर वसूली करना, टोल प्लाज़ा पर काम करना, रॉयल्टी नाकों पर काम, जिन में 5-7 हज़ार रुपय से ज़्यादा कुछ मिलता नहीं। पर वहां फोकट की दारू, रोटियाँ मिल जाना और चकाचौंध की दुनिया, डोडा पोस्त/अफीम तस्करों के प्यादे बनना, जो सारा कैरियर बिगाड़ के रखती जा रही है।

इन समस्याओं का मुख्य  कारण परिवार व समाज की अनदेखी और निष्क्रियता है। आज समाज और परिवारों में इतना विखंडन बढ़ गया है कि अगर पता भी चल जाता है कि कोई गलत दिशा में जा रहा है तो भी हम कोई कदम नही उठा पाते। इसका एक कारण बुरा बनने से बचने की भावना भी है। पहले गांव में कोई बदमाशी करता तो उसे गांव के दूसरे लोग या बड़े-बुज़ुर्ग ही टोक देते थे, पर अब कोई किसी को नहीं टोकता; और टोके भी कैसे, बेचारे उसी की बेईज्ज़ती कर दें या फिर उसे देख लेने की धमकी देते हैं। ना ही परिवार वालों की सुनते है, ऐसे में कुएं में पड़े और भाड़ में जाएं” की मनोवृत्ति धीरे-धीरे जड़ें मज़बूत करती जा रही है।

दूसरा प्रमुख कारण लोकल छुटभैये नेताओं द्वारा राजनीतिक वर्चस्व कायम रखने के लिए युवाओं का दुरूपयोग करना है! चुनावी सीज़न में, हर नेता को इन फेसबुकिया युवाओं की टीम चाहिए, जो 2-3 गाड़ियों में भरकर इन नेताओं के लिए ज़िन्दाबाद के नारे लगाते रहें। इसके बदले हर रात उन्हें चुनावों के दौरान फ्री की शराब और खाने-पीने की सुविधा मिल जाती है। ऐसे माहौल में ये नासमझ युवा शक्ति उन नेताओं को अपना गॉडफादर समझने लग जाती हैं और गलत राह पकड़ लेते हैं। 

परिणाम स्वरूप नेताजी का भविष्य तो सुरक्षित हो जाता है पर खुद इन युवाओं का भविष्य चौपट हो जाता है।  क्योंकि वही नेता बाद में इनको घास तक नहीं डालते है। और यहीं से युवाओं का झुकाव आपराधिक गतिविधियों की ओर हो जाता है, क्योंकि इन तथाकथित नेताओं द्वारा आपराधिक गतिविधियों मे लिप्त युवाओं को राजनीतिक संरक्षण भी दिया जाता है। 

इस प्रकार ये भटके युवा ना घर के ना घाट के हो जाते हैं। जो विवेकहीन और कुंठित, गुस्सैल प्रवृत्ति, शराबी-नशेड़ी, जो हमेशा मरने-मारने को तैयार, शौक पूरे करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। बढ़ते नशे की वजह से अवैध कारोबार, अवैध हथियारों का शौक, गैंग्स प्रवृत्ति ने हमारे आदिवासी क्षेत्र के बहुत से युवाओं को बर्बादी की राह पर धकेल दिया है। 

परिणामस्वरूप अपराध संबंधी घटनाएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। हालत ये है कि अभी मई के अंतिम माह में, राजस्थान के बांसवाडा ज़िले के घोड़ी तेजपुर ग्राम में एक युवक द्वारा खोरापाड़ा ग्राम की युवती की हत्या को अंजाम दे दिया गया। जबकि घोड़ी तेजपुर ग्राम पंचायत में कई छोटी-मोटी चोरी की वारदातें सामने आई हैं। इनमें कई नाबालिग, जिनकी उम्र अभी स्कूल जाकर शिक्षा ग्रहण करने कि है, स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा डिटेन किये गये हैं।

तीसरा आदिवासी समाज के कई युवक-युवतियां अलग-अलग धर्मों का धार्मिक चोला पहनकर, उनका झंडा उठाए घूम रहे हैं और उनके जयकारे लगा रहे हैं। जबकि हमारी खुद की पुरातन आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक जुड़ाव, रूढ़ि-रीतियों, संवैधानिक हक़-अधिकारों को भूलते जा रहे हैं। इससे युवाओं का जुड़ाव प्रकृति से कम हो रहा है, जो चिंतनीय विषय है। 

हमारे आदिवासी क्षेत्र के कई वर्तमान युवक-युवतियां आजकल सोशल मीडिया पर प्रेमी-प्रेमिका की फोटो, वीडियो पोस्ट करते हैं। सोशल मिडिया पर आपस में एक-दूसरे से खुद का प्यार साबित करने की होड़ मची हुई है। कोई गले में हाथ डाल कर फोटो खींच पोस्ट कर रहा है, तो कोई बाहों में बाहें डाल कर..। उससे भी ज़्यादा कई युवक-युवतियां भोंडे रूप में प्यार करती तस्वीरें और वीडियो अपलोड करते हैं। आखिर क्यों…? जबकि जो लोग इस प्रकार की चीजें सोशल मीडिया पर शेयर नहीं करते, क्या वे लोग आपस में प्यार नहीं करते या उनमें आपस में दुश्मनी होती है। वास्तविकता तो यह है प्यार निभाने की चीज होती है ना कि दिखाने की। जो लोग अपने मां-बाप के प्रेम-प्यार को भूल कर प्रेमी-प्रेमिका में प्यार ढूंढ रहे हैं, वह कहां तक प्यार निभाएंगे? असल में वे लोग अपने मां-बाप की बरसों के प्यार को एक पल में ठुकरा कर उनके प्रेम सपनों तथा त्याग को लात मार रहे हैं और अपने सुनहरे भविष्य से तो खिलवाड़ कर ही रहे हैं। 

आने वाले समय मे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति बार-बार हो सकती है जिसको रोकने के लिये हम सब को मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा। अभी भी समय है हमारे पास कि हम सचेत और जागरूक होकर इन युवाओं को बर्बादी के रास्ते पर जाने से रोक सके। इसके लिए ना सिर्फ अभिभावक बल्कि समाज के सभी ज़िम्मेदार नागरिकों को, हर पार्टी दल के राजनीतिक व्यक्तियों को, प्रबुद्धजनों को, सरकारी कर्मचारी एवं प्रशासन, सबको जागरूक होकर उचित कदम उठाने होंगे, नहीं तो हमारा आदिवासी युवा वर्ग नकारात्मक मार्ग पर इतना आगे बढ़ जाएगा कि पछतावे के अलावा कुछ नहीं होगा।

समाज के प्रत्येक जागरूक व संजीदा व्यक्ति से विशेष आग्रह है समाज हित में स्थानीय स्तर पर हमारे घरों-गाँव-ढाणी के आसपास व्यापक जन जागृति अभियान चलाएं। यदि इस तरह का कोई युवा आपको भटका हुआ मिल जाता है तो उसको समझा करके पुनः सामाजिक सरोकार एवं सभ्य सामाजिक विचार धारा से जोड़ने के प्रयास करें। यदि आपने अपने प्रयास से किसी एक युवा को भी समाज की मुख्यधारा में  जोड़ दिया, तो यह अपने आप में हमारे आदिवासी समाज और मानवता की  बहुत बड़ी सेवा हो जाएगी।

ये युवा हमारे परिवार, समाज और देश का भविष्य हैं, हो सके तो इनको बचा लो, कहीं देर ना हो जाए !

फीचर्ड फोटो आभार: क्वार्ट्ज इंडिया

Author

  • महेश मईडा, राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले से हैं। महेश नर्सिंग ऑफिसर के पद पर कलावती सरन केंद्रीय बाल चिकित्सालय, नई दिल्ली में कार्यरत हैं।

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