सहअस्तित्व पर आधारित है गोंड समुदाय की ‘साझा’ व्यवस्था

अनुज बेसरा:

आदिवासी समुदाय हमेशा से ही सहअस्तित्व पर विश्वास करते हुए और उसे जीते आए हैं। वह प्रकृति हो या प्राणिजगत, वह सबसे उतना ही दोहन करता आया है जितनी उसे ज़रूरत हो। यही कारण है कि वह, मानवता के कई मामलों में प्रमुखता के साथ फ्रंट लाइन में हमेशा खड़े मिलते हैं। आप इसे निःशब्द जंगली जानवरों की हत्या के खिलाफ आवाज उठाने, जंगलों में लगी आग के लिए चिंता व्यक्त करने और किसी भी अंजान व्यक्ति पर आसानी से भरोसा कर लेने और उसके प्रति अपनत्व का भाव प्रकट करने जैसे रूपों में देख सकते हैं। यही कारण है कि इनकी व्यवस्थाएँ और पद्धतियां भी उसी सहअस्तित्व के समकक्ष घूमते रही हैं। 

गाँव में आज भी परिवार के खाने के बाद बर्तन में एक व्यक्ति के पेट भरने लायक भोजन अवश्य बचा के रखा जाता है, जिसे किसी के मांगने पर या किसी भूखे व्यक्ति को दिया जा सके। आज भी गाँव में खाली बर्तन वापस नहीं लौटाए जाने का रिवाज है, कुछ न कुछ उपयोगी वस्तु के साथ ही बर्तन को वापस किया जाता है। यह तमाम आदिवासी अमुदायों के ‘जियो और जीने दो’ की नीति के कुछ प्रगाढ़ उदहारण हैं, जो आज के आधुनिक, कृत्रिम और सजावटी युग में मानव समाज को कई मायनों में सही पथ प्रदर्शित कर सकते हैं।

सिमडेगा (झारखण्ड) के गोंड समुदायों में उसी सहअस्तित्व पर आधारित एक व्यवस्था है “साझा व्यवस्था”। यह व्यवस्था, आधुनिक साझेदारी सिस्टम या आधुनिक शेयर होल्डिंग सिस्टम से कुछ मिलती-जुलती है, जो किसी ना किसी रूप और नाम में सभी आदिवासी समुदायों में देखने को मिल जाती है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि आज की जो शेयर होल्डिंग सिस्टम की व्यापारिक पद्धतियां हैं, इसका प्रादुर्भाव आदिवासी समाज कई अरसे पहले ही कर चुके हैं। इस व्यवस्था से कई भूमिहीन – संसाधनहीन परिवारों के चूल्हे तो जलते ही हैं, साथ में परिवारों-समुदायों के बीच आपसी निर्भरता और सहजीविता और गहराती रहती है। आदिवासी इलाकों में इसके मायने गहराई से समझे जा सकते हैं। यह पद्धति खासतौर पर खेती-बाड़ी, अपने चिन्हित पेड़-पौधों से वनोत्पाद एकत्रित करने, शिकार करने और पशुपालन में अपनाई जाती है।

इस व्यवस्था के अंतर्गत यदि कोई खेती करने में असमर्थ है या कोई अधिक भूमि वाला पुरुष-विहीन परिवार है, तो वह अपने खेतों को खेती करने में सक्षम या भूमिहीन परिवारों को दे देते हैं। खेती के लिए जमीन देने से पहले दोनों के बीच आपसी समझौता होता है कि कौन कितना पूंजी और श्रम लगाएगा, कटाई के बाद कृषि उपज का बंटवारा कैसे होगा आदि। इससे उनके बीच बंटवारे के समय मतभेद की गुंजाइश कम हो जाती है। प्रायः उपज का बंटवारा, पारम्परिक सिस्टम “मन” (40 पैला या लगभग 40 किलो), “खंड़ी” (20 पैला या लगभग 20 किलो) या काठ पद्धति से होता है। बंटवारे तभी होते हैं जब दोनों परिवार एक साथ खलिहान (बंटवारा स्थल) पर मौजूद हों। अगर कोई पक्ष खलिहान में उपस्थित नहीं है तो इसका तात्पर्य यह है कि वह बंटवारे से नाखुश है, जिसका समाधान ग्राम सभा द्वारा निकला जाता है।  

वनोत्पाद एकत्रित करने, पशुपालन आदि में भी इसी तरह की व्यवस्था अपनाई जाती है। किसी परिवार के पास यदि उनकी पशुपालन की सामर्थ्य से अधिक पशुधन हो जाता है तो वे उसे किसी पशु-विहीन परिवार को साझा  में दे देते हैं, जिसका पालन संबंधित परिवार करता है। बाद में जब पशुधन में वृद्धि हो जाती है तो उसे आपस में पहले के तय हिसाब से बाँट लिया जाता है।

आज के सन्दर्भ में यदि हम देखें तो यह व्यवस्था वर्तमान में कई समस्याओं के समाधान देते हुए नज़र आती है। इसका पहला उदाहरण हम पलायन की समस्या के तौर पर ले सकते हैं, गांव से पलायन ज़्यादातर वही लोग करते हैं जो भूमिहीन हैं या फिर बेरोज़गार। इस व्यवस्था से भूमिहीन और बेरोज़गार लोगों को, गांव में ही साझा व्यवस्था के तहत रोज़गार मिल सकता है। इससे दो परिवारों के बीच निर्भरता भी बढ़ती है, जिसमें एक परिवार रोज़गार मुहैया करा रहा होता है और फलस्वरूप उसे स्वयं भी लाभ प्राप्त होता है। दूसरा, इस पद्धति से हम दो परिवारों, और समाज को आपस में सहजीविता और परस्पर निर्भरता से जोड़ रहे होते हैं। यह व्यवस्था हमें यह सीख देती है कि जीवन के विभिन्न पायदानों पर हमें हमेशा एक-दूसरे की ज़रूरत पड़ती रहेगी। दूसरे अर्थ में कहें तो यह व्यवस्था हमें पहले से ही चेताती रहती है कि यदि हम समाज के बंधनों से छूटे, तो हमें कई तरह की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

आज के इस पूंजीवादी, वर्चस्ववादी, एकाधिकारवादी और श्रेष्ठतावादी आधुनिक युग में तो ऐसी पारम्परिक व्यवस्थाएं और प्रगाढ़ होकर सोचने पर मजबूर करती हैं। जहाँ मानव-जगत खुद को विभिन्न धर्म-संप्रदायों, समूहों या गुटों में बांटकर अपने जीवन के इस अमूल्य स्नेह, सम्मान, सह अस्तित्व और मूल आधार को खो रहा है। तमाम तरह की हालिया रिपोर्ट देखें तो उनके अनुसार इसका नतीजा सामने निकलकर यह आ रहा है कि लोग पूंजी, औद्योगिक प्रगति और श्रेष्ठता पाने में तो एक हद तक सफल हो रहे हैं, लेकिन डिप्रेशन, उच्च रक्तचाप, अकेलापन और कमजोर मनोवृति आदि विभिन्न रोगों का शिकार भी हो रहे हैं। यहां तक उन्हें जान भी गंवानी पड़ रही है। ये बातें तब और सटीक दिखाई देने लगती हैं, जब अथाह धन-संपत्ति वाले लोगों के आत्महत्या कर लेने जैसी घटनाएं समाज के बीच आती हैं। इसका एक अहम कारण अपनी जड़ों से जुड़े न होना भी है।

मतलब साफ है इस औद्योगिक युग में समाज की उन व्यवस्थाओं के प्रति आँखें नहीं मूंद लेनी चाहिए, जो हमारे जीने के एक आधार के सामान हैं। जितनी आसानी से हम आधुनिकता को गले लगा रहें हैं, उससे कहीं ज़्यादा इन मूल पारम्परिक व्यवस्थाओं को भी पकड़े रहने की ज़रूरत है, जो मानव समाज को जीने के उद्देश्य प्रदर्शित करती हैं।

फीचर्ड फ़ोटो आभार : अनुज बेसरा

Author

  • अनुज, झारखण्ड के सिमडेगा ज़िले से हैं। उन्होंने रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में अनुज दिल्ली में रहकर आगे की पढ़ाई के लिए तैयारी कर रहे हैं।

Leave a Reply