क्या हीरा खनन की भेंट चढ़ जाएंगे मध्य प्रदेश के बक्सवाहा के जंगल?

वीरेंद्र दुबे:

मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में स्थित बक्सवाहा के जंगल, दमोह और पन्ना ज़िलों से लगे हुए हैं, जहाँ पर हीरा खनन परियोजना के लिए जंगलों को काटा जाना है। अगल-अलग खबरों में इस परियोजना के तहत करीब 382 हेक्टेयर के क्षेत्र में 2.15 से 4 लाख पेड़ों को काटे जाने का अनुमान लगाया गया है। इसे लेकर जन समुदाय और जागरूक नागरिकों द्वारा वनों में पेड़ों की कटाई को रोकने और वन संरक्षण हेतु आंदोलन किया जा रहा है। ऐसे दौर में, जब लोग कोरोना महामारी के संक्रमण काल से गुज़र रहे हैं, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए लोगों का जुड़ना स्वाभाविक ही है। कोरोना महामारी से अनेक लोगों ने अपने प्रियजनों को ऑक्सीजन की कमी से मरते हुए देखा है, बहुत से लोगों ने अपनों को खोया है। 

बक्सवाहा जंगलों में हीरा खनन परियोजना का सर्वे कार्य, साल 2004 में प्रस्तावित किया गया था, ऑस्ट्रेलिया की एक खनन कंपनी रियो टिंटों को यह कार्य दिया गया था। सर्वे के शुरुआती दौर से ही, वनों पर आश्रित और वनों के समीप रहने वाले स्थानीय जन समुदायों ने इस हीरा खनन परियोजना का विरोध करना शुरू कर दिया था। लोगों के दबाव के चलते सरकारों को बीच में ही इस परियोजना को बंद करना पड़ा था, साथ ही तकनीकी पहलुओं की वजह से भी इस परियोजना का कार्य रोक दिया गया था। 

पिछले कुछ समय से समाचार पत्रों के माध्यम से यह सामने आया है कि बक्सवाहा के जंगलों को सरकार ने खनन के लिए 50 वर्ष की लीज़ पर दे दिया है। यह लीज़ बिड़ला समूह को दी गई है, जो इन जंगलों में पेड़ों की कटाई कर हीरा खनन परियोजना को आगे बढ़ाएँगे। 

इस परियोजना से आने वाले समय में पर्यावरण और स्थानीय लोगों पर बड़ा असर पड़ेगा। बक्सवाहा के जंगलों से ऑक्सीजन तो मिलती ही है, साथ ही यहाँ की वन सम्पदा, स्थानीय वनाश्रित समुदायों की आय का एक प्रमुख स्रोत भी है। बक्सवाहा के जंगलों का विशेष भौगोलिक महत्व भी है, केन नदी इन जंगलों के पास से होकर गुजरती है, इसलिए इन जंगलों के कटने से स्थानीय जल संरक्षण पर भी गहरा असर पड़ेगा, साथ ही स्थानीय समुदायों की आजीविका भी इससे बड़े स्तर पर प्रभावित होगी। इस परियोजना से 13 स्थानीय गाँव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे साथ ही निकटवर्ती 60 अन्य गाँवों पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। 

यह परियोजना पर्यावरण के लिए तो नुकसानदायक है ही, लेकिन इससे जो समुदाय विस्थापित होंगे उनकी लोक संस्कृति और परंपराएँ को भी गहरा नुकसान होगा। वन क्षेत्रों और स्थानीय लोगों की संस्कृति और जीवन को सहेज कर रखे जाने के लिए इन जंगलों को कटने से रोका जाना मौजूदा समय में बहुत ज़रूरी है।                          

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  • वीरेंद्र, मध्य प्रदेश के दमोह ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह बुंदेलखंड मज़दूर किसान शक्ति संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों और आदिवासी समुदाय के अधिकारों पर काम कर रहे हैं।

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