अजब-गजब सी कशमकश – राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से कोरोना रिपोर्टिंग

प्रेरणा:

एक बार फिर से इस साल शहरों में कोविड-19 महामारी के आंकड़े बढ़ रहे हैं, मैं आप सभी के साथ इस महामारी के समय का अपना अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मैं गाँवों में बच्चों को पढ़ाने जाती हूँ, इसी के चलते मैं कुछ लोगों से मिली और कोविड-19 की दूसरी लहर के बारे में उनसे बात की। उनसे बात करने पर मैंने यह पाया कि गाँव के लोगों को, शहरों में क्या चल रहा है इससे कुछ लेना-देना नहीं है। 

इसी दौरान में भानू भील से मिली, जो चित्तौड़गढ़ ज़िले के, भदेसर तहसील के एक छोटे से गाँव – भीलो का खेड़ा से हैं। लगभग 50 घरों के इस गाँव में 75% भील समुदाय के लोगों के ही घर हैं। भानू अपने घर के बाहर खड़ा था। अब आपको मैं उसके घर के बारे में थोड़ा बताती हूँ। चार कच्ची दीवारों से बने भानू के घर की दूवारों पर बड़े-बड़े छेद हैं, जिससे उसके घर में कुत्ते या अन्य आवारा जानवर आसानी से आ-जा सकते हैं और छत तो है ही नहीं। भानू की सबसे बड़ी बेटी राजू जो 10 साल की है बताती हैं कि जब बारिश होती है तो एक छतरी में हम चारों बहिन-भाई और दूसरी छतरी के नीचे मम्मी-पापा रात भर ऐसे ही बैठे रहते हैं। 

जब मैंने भानू से कोविड-19 को लेकर बात की तो वह बोला, “मैडम सा यो करोनो मारो काई करी है। मारे देन तो बीया ही दाना कौनी – जो कर री बावजी कर रही।” वह फिर बोला कि पिछली बार की तरह इस बार भूखे नहीं सोना पड़ेगा क्यूंकि, “मज़दूरी (धाड्की) नहीं मिली तो काई। मैं तो भूखा रया तो भी काविड-19 मोर पास कौनी आयो – अब कठे सु आसी।” जब भानू मज़दूरी करता है, तो शाम को उसके घर का चूल्हा जलता है। कहने को तो सरकार राशन कार्ड पर धान/गेहूं दे रही है। एक सदस्य पर 5 किलो। अगर परिवार में सदस्यों की संख्या ज़्यादा होगी, तो लागत भी ज़्यादा होगी और जिसका राशन कार्ड – खाद्य सुरक्षा योजना से नहीं जुड़ा है, तो उसको राशन मिलेगा ही नहीं।

भानू भील अपने घर के बाहर

पिछले साल जब कोविड-19 महामारी देश भर में फैलनी शुरू हुयी थी, तब मैं गाँव मोह्ड़ीखेड़ा गयी थी। वहां मैं 10 वृद्ध महिलाओं से मिली थी, सभी की उम्र  60 साल से ज़्यादा की थी। उनमें से एक महिला विकलांग भी थी – उनकी आँखों की दृष्टि चली गई थी, बाकी के परिवार में कोई नहीं था। उनका राशन कार्ड, खाद्य सुरक्षा योजना से नहीं जुड़ा होने के कारण पीडीएस की सुविधाएं उनको नहीं मिल रही थी, न तो गेहूं और न ही कुछ और। आज भी ऐसे कई पचास साल की उम्र से अधिक वर्ष वाले लोगों को गाँव में इन सब समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 

महामारी के आने के बाद से कुछ प्रमुख बातें जो गाँव-स्तर पर लोगों से बात करने पर सामने आ रही हैं –

  • कोविड-19 के आने के बाद से गाँव में बाल-विवाह में बढ़ोतरी हुई है।
  • बालश्रम बढ़ा है।
  • बहुत से लोग, उच्च वर्ग के लोगों के घर पर, कम राशि में साल भर काम कर रहे हैं। यहाँ तक कि वह अपने आप को गिरवी तक रख दे रहे हैं।

मेरा अनुभव तो यही रहा है कि गाँव में कोविड-19 का लोगों में कोई खास डर नहीं है। लेकिन जीवन जीने के लिए दो वक्त की रोटी, हर हाथ को काम, मज़दूरी और रोज़गार नहीं मिले, ये ठीक नहीं है।

Author

  • प्रेरणा, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में शिक्षिका हैं। प्रेरणा खेतिहर खान मज़दूर संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम भी कर रही हैं।

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