झारखंड के महुआडाँड में हुए युवा शिविर पर स्मृति कुजूर की रिपोर्ट

स्मृति नेहा कुजूर:

मैं 14 वर्षीय स्मृति नेहा कुजूर इस लेख के द्वारा अपने अनुभव साझा कर रही हूँ। इस साल फिर से मुझे केंद्रीय जनसंघर्ष समिति द्वारा आयोजित युवा शिविर में शामिल होने का मौका मिला। मैं पहले भी 2016 में इस शिविर का हिस्सा रह चुकी हूँ। उस वक्त मैं भले ही छोटी थी परन्तु इस शिविर में खेल-खेल में सिखाई गयी अहम बातों ने मेरे अंदर इन शिविरों के प्रति रूचि पैदा कर दी।

इस शिविर का आयोजन हर साल 18 से 21 मार्च के बीच में होता है, जिसमे छेछाड़ी क्षेत्र (झारखंड के गुमला और लातेहार जिलों में आने वाला एक इलाका जो रांची से लगभग 180 कि.मी. की दूरी पर है) के विभिन्न गाँवों से युवा इसमें शामिल होने के लिए आते हैं। इस शिविर का प्रमुख उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपने लोगों की परेशानियों और संस्कृति-सभ्यता से रूबरू कराना है और उन्हें बचाने के लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करना है।

इस शिविर में भाग लेने की उत्सुकता के कारण मैं 18 मार्च को दोपहर 2 बजे ही वहाँ पहुच गयी थी। हर साल की तरह इस बार भी केंद्रीय जन संघर्ष समिति की बैठक में इस शिविर का आयोजन पकरीपाठ (ज़िला लातेहार, ब्लॉक महुआडाँड) में करने का निर्णय लिया गया। मैं वहाँ पर सबसे पहले पहुँचने वाली व्यक्ति थी। शाम के लगभग 6:30 बजे तक काफी युवा वहाँ एकत्रित हो गये थे। परन्तु जिन लोगों का घर कार्यस्थल के नज़दीक था वो लोग अगले दिन की सुबह शिविर में शामिल हुए। 

18 मार्च की शाम ठीक 7 बजे कार्यक्रम आरम्भ हुआ। सबसे पहले हम सबने अपना परिचय दिया, उसके बाद हमें सिनेमा ‘आर्टिकल 15’ दिखाया गया। इस सिनेमा से हमें यह पता चला कि अभी भी हमारे देश में दलित समुदाय के लोगों को किस नज़रिये से देखा जाता है तथा उनके साथ किस तरह व्यवहार किया जाता है। सिनेमा के खतम होने के बाद उस दिन का सत्र समाप्त हुआ।

19 मार्च को सुबह 8 बजे हम दोबारा एकत्रित हुए, इस बार कुछ और साथी भी हमारे साथ शामिल हुए। उस दिन का कार्यक्रम हमने आंदोलन के कुछ गीतों और नारों से शुरू किया, जिसने हमारे अन्दर जोश भर दिया। उसी दौरान हमें विभिन्न समूहों में विभाजित किया गया, फिर लगभग 10 बजे हमारा पहला सत्र शुरू हुआ। सत्र का विषय “युवा नेतृत्व की आवश्यकता क्यों है” था। इस विषय में हमें जेरोम जेराल्ड कुजूर ने बताया कि हमारी युवा पीढ़ी का जागरूक होना क्यों ज़रूरी है। फिर फ्रांसिस्का सांगा दीदी ने हमे नेतृत्व करना सिखाया और बताया कि नेतृत्व करना एक कला है। उन्होंने हमें बताया की एक सच्चा नेतृत्वकर्ता बनने के लिए हमें झुण्ड से अलग होकर अकेले खड़ा होना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि हमारे अन्दर आत्मविश्वास, आशावाद, खुले विचार, साकारात्मक दृष्टिकोण तथा साहस जैसे गुण होने चाहिए। हमारे अंदर सही निर्णय लेने की क्षमता एवं कथनी को करनी में बदलने की क्षमता होनी चाहिए। इस सत्र ने मुझे अपने आपको सुधारने और एक सच्चा नेतृत्वकर्ता बनने के लिए प्रोत्साहित किया।

उसके बाद अनील मनोहर जी ने हमें जन संघर्ष समिति एवं नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के इतिहास से अवगत कराया और साथ ही उन्होंने अपने आन्दोलन के अनुभव को भी साझा किया। फिर एक बार जेरोम जी ने हमें पलामू व्याघ्र परियोजना के बारे में जानकारी दी और हमें पता चला की हमारी सरकार ने लातेहार ज़िले के 8 गाँवों को परियोजना के कोर एरिया के लिए चिन्हित किया है, जिन्हें वे विस्थापित करना चाहते हैं। इनमें रमनदाग, लाटू, कुजरुम, बिजयपुर, गुटुवा, गोपखांड, पंडरा और हेनार गाँव आते हैं। फिर हर समूह को उस दिन क्या सीखा, यह लिखने को दिया गया, इस प्रकार उस दिन का कार्यक्रम समाप्त हुआ।

अगले दिन 20 मार्च को थेदियुस मिंज ने हमें अनिसुचित जाति/ जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के बारे में जानकारी दी, उनका दूसरा विषय ‘कृषि कानून’ था। उन्होंने हमें इसके बारे में बताया और यह भी समझाया कि यह कानून एक किसान विरोधी कानून है। यह कानून किसानों के लिए इसलिए ‘काला कानून’ है क्योंकि इससे सिर्फ पूंजीपतियों को लाभ होगा तथा किसानो का सिर्फ नुकसान ही होगा।  युवाओं के आग्रह करने पर उन्होंने हमें सी.ए.ए., एन.पी.आर. और एन.आर.सी के बारे में भी जानकारी दी, इसके बाद मनोरंजन के लिए हमें खेल भी खेलाया गया। 

एक छोटे से अंतराल के बाद फिर एक बार हमारा सत्र शुरू हुआ ,जिसमे अनुमेहा दी ने पत्रकारिता के बारे में बताया और लेख लिखना सिखाया, जिसके बाद हमें लेख लिखने का अभ्यास कार्य मिला। यह लेख हमें अखबार के लिए तैयार करना था, जिसमे हमें अपने आसपास की समस्या या फिर किसी मुद्दे पर लिखना था। लेख लिखने का यह मेरा पहला अनुभव था, जिससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।

आखरी दिन 21 मार्च को रिचर्ड टोप्पो ने हमें बताया कि हमें अपने लेखन में क्या -क्या सुधार करने चाहिये, साथ ही साथ हमें आर.टी.आई. लिखना भी सिखाया गया, जिससे हम सरकार से किसी भी सरकारी कागजात की मांग कर सकते हैं। इसके बाद हमने विरोध एवं संकल्प दिवस के कार्यक्रम के लिए अभ्यास किया जो हर वर्ष नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध में 22-23 मार्च को टूटूवापानी (ज़िला लातेहार, ब्लॉक महुआडाँड) में होता है, इस तरह हमारा यह शिविर समाप्त हुआ। 

मुझे इस शिविर में बहुत कुछ सीखने को मिला और ख़ासकर अपने लोगों की परेशानियों और ज़मीनी मुद्दों को जानने का अवसर भी मिला। अतः मैं अपने युवा साथियों को यह सुझाव देना चाहती हूँ कि वे इस प्रकार की शिविरों में भाग लें, क्योंकि ऐसे शिविर न केवल हमें ज़मीनी मुद्दों से अवगत कराते हैं बल्कि हमारे अन्दर आत्मविश्वास भी पैदा करते हैं। यह हमें अपने लोगों के हक के लिए लड़ने और आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, और आगे जाकर एक अच्छा नेतृत्वकर्ता बनने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

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  • स्मृति नेहा कुजूर, झारखण्ड के लातेहार ज़िले से हैं और बिशप वेस्टकोट गर्ल स्कूल डोरंडा रांची में, कक्षा नवीं की छात्रा हैं।

2 comments

  1. आपके रिपोर्ट पढ़कर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। आज के इस आधुनिक दुनिया में मैं सभी युवाओं को विशेष कर महिला युवाओं को एक मैसेज देना चाहता हूं कि आप लोग अपनी जिंदगी में कुछ भी कर सकते हैं, एक नई सोच के साथ एक नई उड़ान भरे और जुनून के साथ अपनी सफलता की ओर बड़े।

  2. बधाई हो।
    बहुत ही सुंदर रिपोर्ट आपने लिखी है। इतनी कम उम्र में ही अपने लोगों की परेशानियों से परेशान होना अच्छा लक्षण है। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम आदिवासी समाज के लिए महान कार्य करोगी। तुम आदिवासी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हो।
    हमारा आशीर्वाद एवं शुभकामनाएं!

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