जोश-ए-जवानी ज़िन्दाबाद! खेती-किसानी ज़िन्दाबाद

अमित:

आज देश में चल रहे किसान आंदोलन को तीन महीने से ज़्यादा हो गये। इस बीच खेती की समस्यओं पर और किसानों के मुद्दे पर बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। यह भी बताया जा रहा है कि ये लखपति किसान हैं और ये जो मुद्दे उठा रहे हैं वे छोटे और सीमांत किसानों के मुद्दे नहीं हैं। जहाॅं किसानों के साथ अब तक नौकरीपेशा या शहरी लोगों की प्रायः सहानुभूति होती थी, अब मीडिया द्वारा इन्हे राष्ट्रद्रोही, खालिस्तानी, आतंकवादी, नक्सलवादी के रूप में पेश किया जा रहा है और किसानों की जायज़ मांगों को भी लोग शंका से देखने लगे हैं। जो सरकारें, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं व कम्पनियाॅं पिछले पाॅंच दशकों से उन्नत खेती के नाम पर हरित क्रांति मॉडल को किसानों पर लाद रही थी, अब किसानों पर दोषारोपण कर रही हैं कि वे कितनी लापरवाही से पर्यावरणनाशी, भूजल चूसने वाली खेती कर रहे हैं। लेकिन इस सब के बावजूद किसान अपनी माॅंगों को लेकर डटे हुए हैं। मुख्यतः वे कृषि कानूनों को रद्द करवाना चाहते हैं व न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाज़ार के चंगुल से मुक्त करवा के कानून के दायरे में लाना चाहते हैं।

लेकिन आज हम युवानिया के माध्यम से एक ऐसे पहलू पर बात करना चाहते हैं जिस पर अभी तक बात नहीं हुई थी, हाल ही में किसान आंदोलन ने युवा किसान दिवस मना कर इस विषय को छेड़ा है। आज की युवा पीढ़ी का खेती से क्या रिश्ता है? वे खेती को कैसे देखते हैं? दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन में युवाओं की ज़बरदस्त भागीदारी से हम क्या समझें?

अधिकतर राज्यों में हालत यही है कि पढ़े-लिखे युवा, खुशी से तो खेती नहीं करना चाहते। उनके माॅं-बाप, कर्ज़ लेकर या ज़मीने गिरवी रखकर भी उन्हे पढ़ाई में इसी उमीद से डालते हैं कि उन्हे शारीरिक श्रम आधारित व अनिश्चितता का जीवन न जीना पड़े। कोई नौकरी मिल जाये। उनके खेती के रकबे को देखते हुए वे तय करते हैं कि कितने लड़के खेत के लिए पर्याप्त हैं और कितनों को पढ़ाना है। लड़कियां इस गणित का हिस्सा नहीं होती, क्योंकि उन्हे शादी के बाद दूसरे घर जाना है। पढ़ी-लिखी लड़कियाॅं भी नौकरी करना चाहती हैं और नौकरी वाले से ही शादी करना चाहती हैं। बारह-पन्द्रह साल स्कूल काॅलेजों के चक्कर काटने के बाद जब उन्हें साफ़ कपड़े पहन कर इधर-उधर घूमने की और छाॅंव में बैठकर कलम घिसने की आदत पड़ गई हो, ऐसे में यह उमीद करना कुछ ज़्यादा ही है कि वे फिर से रात-रात को कीचड़ में पैर डालकर खेतों में पानी देंगे या वो लड़की धूप में खेतों में काम करेगी, गोबर उठाएगी और चूल्हा-चौका और बच्चे भी देखेगी। पढ़ाई करते-करते बच्चों का भी सपना बन जाता है कि कोई न कोई नौकरी मिल जाए और जीवन में स्थायित्व आए। शहरी चमक-दमक का आकर्षण भी होता है।

खेती से अच्छी आय न होने के अलावा एक और कारण है युवाओं का खेती की तरफ़ आकर्षित न होने का। स्कूल की किताबों में चाहे किसानों की महिमा में कविताएँ रटाई जाती हों, लेकिन वास्तविकता यही है कि समाज में किसानों की कुछ खास इज़्ज़त नहीं है। खेती के साथ अभी भी पिछड़ेपन, गंवारू, पारंपरिक जैसे विशेषण चिपके हुए हैं और युवा, आधुनिकता का प्रतीक हैं।

सरकार की निजीकरण की नीतियों के चलते नौकरियां न मिलने पर जब युवाओं को मज़दूरी के लिए दूसरे शहरों में भटकना पड़ता है तो उनका मनोबल टूट जाता है और घोर निराशा छा जाती है। पढ़ाई में फ़ेल होने या नौकरी न मिलने से, परिवार व गाॅंव में खोई इज़्ज़त को पाने का यही एक तरीका होता है कि मज़दूरी के लिए पलायन करें और कुछ पैसे कमा लें। सभी दोस्त भी इसी बेरोज़गारी की नाॅंव में हिलोरे खा रहे होते हैं इसलिए यह निराशा खास पता नहीं चलती। कुछ लोग नौकरी न मिलने पर मजबूरीवश खेती करने लगते हैं। गाॅंव के लोग ताना मारते हैं – इतना पढ़ा, लेकिन खेती करनी पड़ रही है। ताने सुनने से अच्छा है कि कान में इयरफ़ोन लगाकर दिल बहलाने के लिए कुछ किया जाए – नशाखोरी, जुआ, मोबाइलखोरी, सोशल मीडिया व अड्डेबाज़ी तो हैं ही।

ये हमारी शिक्षा नीति का ही दोष है कि जिनके पास कमाने के लिए ज़मीन, जंगल और श्रम हैं उनके बच्चों को यह अहसास दिलाया जाता है कि ये कमाने के तरीके घटिया हैं और आपका जीवन, किसी का सिक्योरिटी गार्ड बनकर ही धन्य हो सकता है। और जिनके पास चालाकियों के अलावा और कोई कमाई का साधन नहीं होता वे इनकी ज़मीनों और जंगलों को अपने कब्ज़े में लेकर अरबपति बनना चाहते हैं।

लेकिन कई बार ये फ़ुरसती समय की अड्डेबाज़ी से सकारात्मक आइडिया भी निकल जाते हैं। सोशल मीडिया पर सृजनात्मकता की बा़ड़ इसी का नतीजा है। बहुत आसानी से युवाओं ने इस माध्यम को अपनी अभिव्यक्ति का हथियार बना लिया है। चाहे बेमन से ही सही लेकिन इनके द्वारा खेती करने का एक अच्छा नतीजा यह है कि खेती के हर क्षेत्र में बहुत से नये प्रयोग युवा पीढ़ी द्वारा किये जा रहे हैं। जैविक खेती से कम लागत में अधिक उत्पादन बढ़ाने से लेकर कृषि उपज की मूल्य वृ़द्धि के काम व उपज को सीधे उपभोक्ताओं तक पहॅुंचाने के काम। साथ ही पारम्परिक फ़सलों के अलावा बहुत से युवा फूल, फल, मशरूम, पेड़ आदि चीज़ों की खेती में जा रहे हैं।

गत वर्षों में युवाओं के बढ़ते आंदोलनों को हम सब देख रहे हैं। ये आंदोलन, केन्द्रित तो शिक्षा के मुद्दों पर ही थे लेकिन साथ ही उनकी समस्याओं से जुड़े व्यापक पहलुओं की समझ को भी दर्शा रहे थे। नव उदारवादी नीती, निजीकरण, कॉर्पोरेट घरानों की हर क्षेत्र में बढ़ती दखल और सरकार से सांठ-गांठ, खेती में विश्व व्यापार संगठन के नियमों जैसे व्यापक मुद्दों पर भी ये सवाल उठा रहे थे। किसान आंदोलन हो या मज़दूरों का आंदोलन हो, आदिवासी या दलित आंदोलन हो या महिला आंदोलन हो – सभी जगह युवाओं और युवतियों की बढ़ती भागीदारी से यह भी स्पष्ट है कि इन्हे युवा या छात्र की छद्म या अपूर्ण पहचान में सीमित नहीं किया जा सकता। ये किसान हैं, मज़दूर हैं, आदिवासी – दलित हैं, महिला भी हैं।

इन आंदोलनों नें छात्रों और युवाओं को एक अलग रूप में प्रस्तुत किया है – ये प्रगतिशील मूल्यों को स्थापित करने के लिए भी अनुशासित, संगठित हो सकते हैं। ये अपनी बाज़ुओं की फड़फडाती मछलियों और चढ़ती मूछों के जोश को कन्ट्रोल भी कर सकते हैं। ये नये ज़माने की युवतियाॅं अपने स्वैग के वीडियोज़ के साथ साथ देश की समस्याओं पर गंभीर भाषण भी दे सकती हैं। नेतृत्व के निर्णयों से पूरी तरह खुश न होते हुए भी उन्हे मानकर आंदोलन में अनुशासनपूर्वक रह सकते हैं। ये केवल उद्दण्ड, बद्तमीज़, ओछे, फ़ैशनपरस्त, उम्र का लिहाज़ न करने वाले नहीं होते। ये केवल माॅब लिंचिंग या धार्मिक दंगों की विध्वंसक भीड़ के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला कच्चा माल नहीं होते, ये केवल लड़कियों से छेड़-छाड़ करने वाले लम्पट नहीं होते। ये अपनी फटी जीन्स, कानों में इयरफ़ोन और फ़ैन्सी हेयर स्टाइल के वावजूद विचारवान, किसान, मज़दूर भी होते हैं। ये वास्तव में समाज और देश की चिंता कर सकते हैं और उसका नेतृत्व करने का माद्दा रखते हैं। ये केवल बुतों और विचारधाराओं के अंधभक्त नहीं होते, ये सही सवाल पूछने की क्षमता और हौसला भी रखते हैं।

आज के दौर में जहाॅं मीडिया – सोशल मीडिया व खतरनाक कानूनों की कार्रवाही की धमकी के माध्यम से हर हक के लिए उठी आवाज़ को दबाने का प्रयास हो रहा है, ऐसे दौर में किसानों, मज़दूरों या समता, भाईचारा, बहनापा, लोकतंत्र जैसे संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करने वाले आंदोलनों में जवान खून की बढ़ती भागीदारी सभी का हौसला बढ़ाने वाली बात है।

यह भरोसा किया जा सकता है कि जब ये खेती और ज़मीन से अपना रिश्ता वापिस स्थापित कर लेंगे तो ज़मीन गरीब जनता के पास ही रहेगी। जब ये नई पीढ़ी, खेती को अपने हाथों में लेगी और खेती के तमाम रोज़गार उपलब्ध कराने की संभावनाओं को तलाशेगी तभी खेती का तंत्र व ज़मीन किसानों के अधीन रहेगी और किसान, कॉर्पोरेट घरानों के खूॅंटे पर बंधी गाय नहीं बनेंगे।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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