छोटू सिंह रावत:

आज-कल केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें या सरकार में आने को प्रयासरत राजनीतिक दल, सभी के द्वारा खुले मंच पर जनता को पैसों का लालच दिया जा रहा है। तमाम सरकारें और राजनीतिक दल चुनाव से पहले वादे करते हैं कि हमारी सरकार बनेगी तो गरीबों, किसानों के  खातों में पैसा डालेगें, लेकिन यह कोई नहीं कहता है कि किसानो, गरीबों को सक्षम बनाएंगे। इतने सालों तक सरकारों ने इस तरह की कोई योजना भी नहीं बनाई जिससे किसान, गरीब सक्षम बन रहे हों। 

ग्रामीण मजदूरों और महिलाओं के रोज़गार के लिए एक मुख्य योजना मनरेगा चल रही है और इसके नाम पर हर जगह भ्रष्टाचार चल रहा है। बमुश्किल ही कहीं, मनरेगा का पूरा वेतन मिल रहा है और ना ही इस काम को सही तरीके से चलाया जा रहा है, मनरेगा के नाम पर कहीं भी खड्डे खुदाए जा रहे हैं। सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में पेंशन की कई योजनाएं है, जिनसे गरीब वृद्ध जनों, और विधवा महिलाओं को पैसा मिलता है, लेकिन इन योजनाओ का लाभ लेने के लिए उन्हें कितनी ही जगह चक्कर लगाना पड़ता है। 

इस तरह की जो भी सरकारी योजनाएँ होती हैं उनका लाभ बहुत कम ही ज़रूरतमंद लोगों को मिल पाता है। जब राजनीतिक दल सरकार बनाने के बाद या चुनाव से पहले सरकारें इस तरह से पैसे बांटने के बारे में बात करते हैं तो हमें यह भी समझना चाहिए कि जिस पैसे को बांटने की बात की जा रही है वह पैसा किसका है। सरकारों के पास पैसा कहाँ से आ रहा है, क्या वह हमारे ही पैसे को हमें भीख के रूप में देना चाहती हैं?

क्या किसान हमेशा ही बैंको से कर्जा लेता रहेगा और फिर उसे माफ करवाने के लिए लड़ता रहेगा? आज हम लड़ रहे हैं, शायद कल कोई और लड़ रहा होगा। लेकिन क्या इसी तरह चलता रहेगा, वोट बैंक के लिए क्या राजनीतिक दल इसी तरह किसानों और गरीबों के नाम पर राजनीति करती रहेंगे? इस तरह पैसों का लालच देकर आम जनता को और कमज़ोर बनाया जा रहा है और यह हमेशा यही चाहेंगे कि गरीब, किसान इसी तरह कमज़ोर ताकि यह शोषक सरकारें चलती रहें।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है; फोटो आभार: गूगल

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  • छोटू सिंह, राजस्थान के अजमेर से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वे असंगठित श्रमिक और बच्चों के साथ ज़मीनी स्तर के मुद्दों पर कार्यरत हैं और वर्तमान में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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