दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे किसानों के आन्दोलन में मध्य प्रदेश के अलग-अलग संगठनों के साथी भी हिस्सा लेने आए। आन्दोलन में अपने क्षेत्र का हाल बताते हुए सिंघू बॉर्डर पर जागृत आदिवासी दलित संगठन की कार्यकर्ता नासरी बाई ने अपनी बात रखी। उनकी कही बातों को नीचे दिए गए कुछ बिन्दुओं में समेटने का प्रयास किया गया है-

1). मंडी दूर होने के कारण ज्यादातर आदिवासी किसान, अपनी उपज मंडियों में नहीं बेचते। किसान आयोग की सिफारिश के अनुसार प्रदेश में 3860 मंडियाँ होनी चाहिए लेकिन आज यहाँ सिर्फ 567 मंडियाँ है। मेरी तहसील पाटी में एक भी मंडी नहीं है। मंडी पास में होने पर भी ज़्यादातर आदिवासी उसका लाभ नहीं उठा पाते क्यूंकी 2006 के वन अधिकार कानून के तहत जिन ज़मीनों के पट्टे उन्हें अब तक मिल जाने चाहिए थे वह नहीं मिल पाए हैं।

2). इस व्यवस्था में सुधार करने के लिए किसान आयोग की सिफारिश के अनुसार हर 5 किलोमीटर के अंदर एक मंडी होनी चाहिए, मंडी मे बेचने का अधिकार हर किसान को देने की जरूरत है और न्यूनतम समर्थन मूल्य (पूरी लागत का डेढ़ गुना भाव) पर सभी 23 फसलों की खरीद को कानून द्वारा सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है

3). राशन में सिर्फ गेहूं या चावल ही नहीं बलकि ज्वार, बाजरा, मक्का और मूंगफली जैसी फसलें भी मिलनी चाहिए। साथ ही ICMR के सिफारिश अनुसार हर वयस्क व्यक्ति को 14 किलो अनाज, हर नाबालिक को 7 किलो अनाज और हर व्यक्ति को 1.5 किलो दाल और 800 ग्राम तेल देने की भी ज़रूरत है। सिर्फ तब ही परिवार स्वस्थ रह पाएगा। 

यह करने के बजाए सरकार मंडियां बंद करवा रही है और ठेका खेती और अनाज की जमाखोरी के लिए रास्ता बनाने मे लगी हुई है। सरकार को धरती उजाड़नी आती है, बनानी नहीं। धरती बनाना, फसल उगाना हम लोगों को आता है। लेकिन सरकार आदिवासी और किसानों से उनके जल, जंगल और ज़मीन को छीन कर, उन्हे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार से वंचित कर, उनसे शहरों में सस्ती मज़दूरी कराना चाहती है।

अपनी बात को नासरी बाई ने समाप्त करते हुए एक गीत गाया, जिसके बोल हैं –  

यह हमारी ज़िंदगी की लड़ाई है, यह हक की लड़ाई है
जान जाए तो जाने दो, हक़ मेरा नहीं जाए.. – 2  
लाठी-गोली खायेंगे, पीछे नहीं हटेंगे.. ।   
जान जाए तो जाने दो, हक़ मेरा नहीं जाए.. – 2  

उनके द्वारा मंच में राखी गयी बात को आप नीचे क्लिक करके देख सकते हैं –


नासरी बाई, मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र से हैं और बारेला आदिवासी हैं। पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने अकेले अपने बच्चों को कई मुश्किलों और व्यक्तिगत संघर्षों के साथ पाला और बड़ा किया। नासरी बाई इस आदिवासी बहुल क्षेत्र में एक प्रेरक, निडर और समर्पित सामुदायिक कार्यकर्ता के रूप में उभरी हैं। वह पिछले 20 सालों से जागृत आदिवासी दलित संगठन के साथ क्षेत्र के आदिवासियों, विशेषकर महिलाओं के साथ गाँवों के विकास और उनके अधिकारों को लेकर निरंतर जागरूकता बढ़ाने का काम कर रही हैं।

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