आओ समझें कैसे बनता है किसी बीमारी की वैक्सीन या टीका

डॉ. नरेन्द्र गुप्ता:

जब से कोविड-19 महामारी का संक्रमण प्रारम्भ हुआ हैं तब से विश्व में सब जगह इसके लिए टीका और दवाई बनाने के लिए सभी देशों के वैज्ञानिक पूरे जोर शोर से प्रयत्न कर रहे हैं। इस संबंध में साधारण व्यक्तियों में अनेक प्रकार के संशय बने हुए हैं। इस पत्रक के माध्यम से इन संशयों को  दूर  करने का प्रत्यन किया गया है।

टीका और दवाई में अंतरः

टीका का संबंध निषेध से है जबकि दवा का संबंध उपचार से है। टीका रोग को होने से रोकता है जबकि दवा, रोग होने पर उसको समाप्त करने के लिए दी जाती हैं। किसी रोग का टीका स्वस्थ निरोगी व्यक्तियों को इसलिए दिया जाता है कि वे भविष्य में उस रोग से ग्रसित नहीं हो सके, जबकि दवा का उपयोग व्यक्ति जब रोग ग्रस्त होता है तो उसके उपचार के लिए किया जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि टीका देश और विश्व के सभी जिनको रोग की संभावना है को दिया जाना होता है। इसके विपरीत दवा केवल रोगियों को दी जाती है जिनकी सख्यां वैसे भी सीमित होती है और महामारी में भी बहुत अधिक नहीं होती है। इसलिए टीके की बहुत बड़ी संख्या में ज़रूरत होती है जबकि दवा की टीके की तुलना में अत्यन्त कम ज़रूरत  होती है।

किन रोगों का टीका विकसित किया जा सकता है:

टीका केवल जो रोग संक्रामक अर्थात एक व्यक्ति से दूसरे को संक्रमण के कारण  फैलते हैं, के ही बनाये जा सकते हैं। यह संक्रमण जीवाणु, कीटाणु  या परजीवियों के माध्यम से फैलते हैं। ये सभी अत्यन्त सूक्ष्म जीव है जो कि नंगी आंखों से कभी भी नज़र नहीं आते है।  इनमें से जीवाणु जिसे अंग्रेजी में वायरस कहा जाता है तो पूर्णरूप से जीव भी नहीं है। उसका एक भाग ही जीवित की तरह व्यवहार करता है। गैर संक्रामक रोग जैसे मधुमेह, उक्त रक्तचाप, मनोरोग, गुर्दे और जिगर के रोग इत्यादि जो कि एक से दूसरे में नहीं फैलते है के टीके बनाने की विधी अभी तक विकसित नहीं हुई है।

टीके किस प्रकार से विकसित किये जाते हैं:

वैसे तो टीका और दवा बनाने के लिए लगभग एक सी पद्धति और प्रक्रिया होती है पर टीका बनाने में अधिक सावधानी ताकि कहीं इसके उपयोग से शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़े पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है, क्यूंकि यह स्वस्थ्य व्यक्तियों को दिया जाता है।

किसी रोग का टीका विकसित करने के लिए सर्वप्रथम तो यह जानना आवश्यक है कि कोई रोग क्यूं हो रहा है, रोग संक्रामक है या गैर संक्रामक है। अगर संक्रामक रोग है तो किस जीवाणु, कीटाणु या परजीवी  के  संक्रमण  के  कारण  हो  रहा  है और  यह  सूक्ष्म  जीव  शरीर  में  किस  प्रकार  प्रविष्ट हो रहा है। इसके बाद यह जानना आवश्यक है कि यह शरीर के किस अंग को प्रभावित कर रहा है, किस प्रकार प्रभावित कर रहा है अर्थात शरीर के अंग को किस प्रकार कार्य करने में बाधा उत्पन्न कर रहा है। यह भी ज्ञात करना आवश्यक है कि इसके प्रवेश होने के कितने दिनों में लक्षण प्रारम्भ हो जाते हैं। यह सब ज्ञात करने के लिए अनेक शोध और जांच करनी पड़ती है। इसके उपरांत वैज्ञानिक चिकित्सकों के साथ मिलकर उस सूक्ष्म जीव या अद्र्व जीव को अलग करने का प्रयत्न करते है जिसके कारण रोग हो रहा है और उसकी अनुवांशिक संरचना का पता लगाने का प्रयत्न करते हैं। यह अत्यन्त ही जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है। 

यह सब अत्यन्त उन्नत प्रयोगशाला और वैज्ञानिकों द्वारा ही किया जा सकता है। जब यह ज्ञान हो जाता है कि सूक्ष्मजीव की अनुवांशिक संरचना क्या है, मनुष्य में यह किस प्रकार प्रवेश करता है, किस अंग को प्रभावित करता है और किस प्रकार प्रभावित करता है तब इसके लिए टीके बनाने की संभावनाएं तलाशी जाती हैं। इन संभावनाओं में यह तलाशा जाता है कि इसके, मनुष्य शरीर में प्रवेश से लेकर अंग प्रभावित करने के स्थान पर कहां आगे बढने से रोका जा सकता है? क्या इसको प्रवेश होने के समय ही रोका जा सकता है या इसके संख्यात्मक वृद्धि को रोका जा सकता है।

टीका बनाने की अवधारणा क्या है:

टीका अभी तक संक्रामक रोग को निषिद्व करने के लिए बनाया जा सकता है। संक्रामक रोग सूक्ष्म जीव जो कि अर्ध जीव भी हो सकते हैं के कारण होते हैं। कोई भी जीव इसलिए जीव कहा जाता है क्योकि वह अपने जैसे अन्य बना सकता है अर्थात संतानोत्पत्ति कर सकता है। जैसे प्रत्येक जीव को जीवित रहने के लिए भोजन, जल और वायु की ज़रूरत होती है क्योंकि इनके द्वारा ही शरीर के अंगों के लिए ज़रूरी तत्व और उनको चलाने के लिए उर्जा प्राप्त होती है। इसी प्रकार सूक्ष्म जीवों को भी इन सबकी ज़रूरत होती है, जिन्हें वह मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जिस अंग में पंहुचते है उस अंग की दीवार पर चिपक कर या रक्त के कणों में मिलकर प्राप्त करते हैं। जीवित रहने के साथ ही वह अपनी संख्या भी बढ़ाते हैं और शरीर के उस अंग के निर्धारित काम में बाधा उत्पन्न करते हैं। टीका, संबंधित सूक्ष्म जीव की संख्या बढ़ने से रोकता है और उसे नष्ट करता है।

नया टीका बनाने में कितना समय लगता है:

अभी तक जितने भी रोग के टीके विकसित हुए हैं, उनमें सबसे कम 5 वर्ष का समय लगा है। यह टीका मम्स (कंठमाला) रोग का है। अधिकतर टीके विकसित करने में 10-15 वर्ष तक लग जाते है।

टीका विकसित करने में अनेक वर्ष क्यों लगते है:

सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि टीका पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति को लगाया जाता है, जिससे उसे भविष्य में रोग नहीं हो। इसलिए जो टीका विकसित किया जा रहा है उसमें सर्वप्रथम यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि इस टीके को जिस भी व्यक्ति को दिया गया है उस पर कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है। टीके में प्रयोग किए गए किसी भी नये रसायन या तत्व का उपयोग हानिकारक हो सकता है जिससे स्वस्थ व्यक्ति को कोई अन्य गंभीर रोग हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए टीका शरीर को हानि नहीं पहुंचाएगा या इतनी कम हानि पहुंचाएगा कि उसकी तुलना में लाभ अधिक होगा इसकी जांच करना ज़रूरी हैं। इसके लिए टीका विकसित करने को निम्नलिखित चरणों से गुज़रना आवश्यक होता है, मुख्य रूप से इसके दो चरण होते हैं।

1)- प्रयोगशाला शोध और गैरमानवीय परीक्षण और 2)- मानवीय परीक्षण

नीचे जो तालिका दी गयी है उसमें से क्रम संख्या 1 से 4 तक प्रयोगशाला शोध और गैर मानवीय परीक्षण की श्रेणी में जबकि क्रम संख्या 5 से 8 मानवीय परीक्षणों के चरण हैं। तालिका में जो समय अवधी दिखाई गयी है वह केवल सांकेतिक है, क्यूंकी अलग-अलग रोगों के लिए विभिन्न समय अवधी हो सकती है और इनमें बहुत बड़े अंतर हो सकते हैं।

क्र.सं.टीका विधिसांकेतिक समय
मानवीय परीक्षण पूर्व
1प्रयोगशाला में ऐसे टीके का प्रकार देखना जो सूक्ष्म जीव को समाप्त करने की क्षमता रखता हो ।कुछ निश्चित नहीं। अनेक वर्ष तक लग सकते हैं।
2टीके का प्रकार निश्चित होने पर उसका सूक्ष्म जानवर जैसे कीडे-कॉकरोच आदि पर प्रभाव का अध्ययन करना।8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
3सफल होने पर बडे जानवर जैसे चूहा या खरगोश इत्यादि पर परीक्षण8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
4सफल होने पर बंदर पर परीक्षण। (यह इसलिए कि मनुष्य और बंदर के 99 प्रतिशत गुणसूत्र या क्रोमोज़ोम एक समान हैं)8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
मानवीय परीक्षण के चरण
5सफल होने पर प्रथम मानव परीक्षण जो कि 5-10 स्वस्थ व्यक्तियों पर किया जाता है।8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
6सफल होने पर 400-800 व्यक्तियों पर परीक्षण8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
7सफल होने पर 30000 से 40000 व्यक्तियों  पर परीक्षण। यह परीक्षण विश्व के अलग-अलग स्थानों पर किया जाता है। इनमें से आधे व्यक्तियों को नया बनाया हुआ टीका दिया जाता है, जबकि आधे व्यक्तियों को अन्य कुछ जो कि नया विकसित टीका नहीं है।8-9 माह न्यूनतम 90 दिन
8सफल होने पर सार्वजनिक उपयोग कि अनुमति। किंतु लम्बे समय तक निरन्तर पर्यवेक्षण।शरीर पर दीर्घकालीन प्रभाव का आंकलन

इन परीक्षणों में टीका निर्माण के निम्न तथ्यों का परीक्षण किया जाता है।

1)- क्या टीका सुरक्षित है? इसका यह अर्थ है कि टीका लगाने के शरीर पर कोई गंभीर दीर्घकालीन दुष्प्रभाव तो नहीं हैं। यह दुष्प्रभाव शारीरिक या मानसिक हो सकते हैं और इससे कहीं मृत्यु तो नहीं हो सकती। दुष्प्रभाव कितने समय तक रहते है या कहीं यह जीवनपर्यन्त तो नहीं?

2)- निर्मित टीके से रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता अर्थात एंटीबाडीज बनती है? अगर एंटीबाडीज बनती है तो कितनी मात्रा अर्थात कितनी शक्ति की बनती है और यह संक्रमण को रोक पाती है या नहीं। रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता शरीर में एक बार टीका लगाने से कितने समय तक बनी रहती है।

3)- टीका  का  स्वरूप  किस  प्रकार  का  होगा  यह भी  निश्चित  करना  होता  है।  जैसे  किसी  टीके  को  पिलाया  जाता (जैसे पोलियो  का  टीका) और  कोई  इंजेक्शन  के  माध्यम  से  दिया  जाता  है  और  कोई  टीका  सुंघाकर  दिया जा सकता है। कितनी मात्रा में टीका दिया जाएगा यह भी निश्चित करना होता है। यह भी निश्चित करना होता है कि अगर टीका एक से अधिक बार लगाना होगा तो कितने अन्तराल के बाद लगाना होगा। यह इसलिए करना पड़ सकता है क्योंकि एक समय अन्तराल के बाद, एक बार दिये गये टीके द्वारा उत्पन्न प्रतिरोधात्मक शक्ति अर्थात एंटीबाडिज समाप्त या कम पड़ गयी हो तो उसे पुनः बढ़ाया जाए।

क्या  जो  टीके  विकसित  किये  जा  रहे  हैं  वास्तव  में  रोग  को  होने  से  रोक पायेंगे?

इसका उत्तर भविष्य में निहित है। वैसे विश्व में टीकों के विकास और उपयोग से अनेक रोगों को समाप्त या अत्यन्त कम कर दिया गया है। चेचक जैसा भयानक रोग टीके के कारण पूर्ण रूप से समाप्त हुआ, पोलियो भी समाप्त हो गया है। ऐसे ही अनेक रोगो का प्रकोप अत्यन्त सीमित हो गया है। इसलिए टीके के द्वारा रोग समाप्त या उसके प्रकोप को सीमित करने की हमेशा संभावना है। किन्तु अनेक संक्रामक रोग ऐसे हैं जिनका टीका बनना  संभव नहीं हो सका जिनमें एच.आई.वी./एड्स रोग प्रमुख है। 

चूंकि बड़ी संख्या में विश्व के अनेक देशों की प्रयोगशालाएं टीका विकसित करने में लगी हुई है तो आशावादी होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन जो कि विश्व  के राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करता है में स्थापित समिति का मानना है कि अगर कोई विकसित हो रहा टीका अगर 50 प्रतिशत भी प्रतिरोध क्षमता बनाने में सफल होता है तो उसको मान्यता दी जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर 2 व्यक्तियों को टीका दिया गया तो एक में यह कारगर होगा या दोनों में इसके द्वारा सीमित प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी। यह कोई टीका नहीं होने से अच्छा है।

फीचर्ड फोटो आभार: pixbay.com

Author

  • डा. नरेन्द्र गुप्ता पिछले 4० से अधिक सालों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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