दुनिया की बनाई हुई सरहदें
दिलों की नरमी से पिघल जाना चाहती हैं।
इस तरफ की जो दरिया है
वो उस तरफ भी बहती है
जो फसलें इधर है
वो उधर भी हैं
जैसा इस तरफ सोचते है
वैसा उस तरफ भी सोचते हैं
लेकिन जो दरारें हैं
वो सफ़ेद पोशों ने बनाई हैं
नफरतों का ज़हर इधर भी है
उधर भी है
लेकिन
एक दिन ये ज़हर, सरहदें, दरारें
मिटेंगी
मुझे यकीन है।
हां, मुझे उम्मीद है
फीचर्ड फोटो आभार: गूगल फोटो

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View all postsआमिर, पेशे से बुनकर, उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह झारखंड के गुमला ज़िले में निर्माण संस्था से जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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