मंथन:
कल काफिले उतरे थे
सड़कों पर,
कुदरती काले और साँवले
मेहनत के पसीने
और धूल मिट्टी से सने
धूपजले काले साँवले
कुछ मेहनतकश इंसाफपसन्द गोरे भी
रंगभेद सहित भेद के हर रंग से मुकाबिल
हर रंग के लड़ने – भिड़ने वाले
सफेदपोशों के लूटेरे हत्यारे
कानूनों को नकार रहे थे
साथ ही बड़े सहज भाव से
उन कानूनों को काला बता रहे थे
लगता था मानो
काला कहे बिना वे
वे उनकी पूरी गन्दगी दिखा न सकेंगे
मन की गजब गुलामी है
अकल की अजब नीलामी है
कि नीलामी और गुलामी पर बिफरे हम भोले
शब्दों में सने रंगभेद के आदी हैं
कब हम शब्दों की परतें खोलेंगे
उनके मायने तौलेंगे
नाप तौल ,सोच समझ
लिखेंगे और बोलेंगे

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View all postsश्रुति से जुड़े झारखण्ड के संगठन विस्थापित मुक्ति वाहिनी को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले मंथन जी, अभी जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के अंशकालिक कार्यकर्ता हैं। अध्ययन, अनुवाद, प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में विशेष सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रिए स्तर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर विशेष रुचि और समय-समय पर लेखन का काम करते हैं।

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