जागो रे जागो आदिवासी भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए

(भीली भाषा का यह गीत खासकर कॉलेज, चुनाव व सामाजिक कार्यक्रमों में गाया जाता है।)

जागो रे जागो आदिवासी भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

सरकार आपडी लुटी खाई गई भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

समाज ने आगल वदावो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

गामे-गामे वायको आलजो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

गामे-गामे गमेती बनावो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

गमेती ने पागडी बांधजो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

पागडी नु मान बढ़ावजो रे भाइयो, तमे किमू हुता हो निद्रा माए।

आदिवासी मिलामाए आवजो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

जल-जंगल ते लुटी ली रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

भारत देश ना मालिक आदिवासी, किमू हुता हो निद्रा माए।

मालिक आपड़े बनवु है भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

आदिवासी राज ते लावणु है रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

पाणा ने तीर-कंतु हाई लीजो रे भाइयो, किमू हुता हो निद्रा माए।

इस भीली भाषा के गीत का तात्पर्य है कि जो भी आदिवासी समाज के लोग हैं, वो जाग जाएँ और नींद में नहीं सोए। सरकार हमे लूट रही है। हमे समाज को आगे बढ़ाना है। यह बातें सभी गाँवों को बतानी हैं और सभी गाँवों में एक मुखिया/गमेती को बनाना होगा तथा गमेती को सर पर पगड़ी बांधकर उसका सम्मान करना होगा। आदिवासी की मीटिंग में समाज के लोगों को आना होगा।

जल, जंगल, ज़मीन जो सरकार लूट रही है, उसे बचाना होगा। हम भारत देश के मूल मालिक हैं। हमे आदिवासी क्षेत्र में हमारा राज लाना होगा और हमे पारंपरिक हथियार तीर-कमान, गुफान का अभ्यास चालू रखना पड़ेगा।

Author

  • गोवर्धन, राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह वागड़ मज़दूर किसान संगठन से जुड़कर, गरीब, दलित, आदिवासी समुदायों के हक़ और अधिकार के लिए, संगठन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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