छत्तीसगढ़ से फील्ड रिपोर्ट: कोरोना महामारी और नाकामयाब ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था

गुलाब नाग खुरसेंगा:

कोविड-19 बीमारी ने आज पूरी दुनिया में आतंक मचाया हुआ है। इसका प्रभाव आए दिन विकराल रूप धारण करता जा रहा है। भारत के शहरों, कस्बों और धीरे-धीरे गाँवों में भी बीमारी के फैलने के संकेत मिल रहे हैं। लेकिन 23 मार्च 2020 से लेकर आज तक भी कोविड-19 की बीमारी, हमारे इलाके के समुदाय को संक्रमित करने में नाकाम रही है, और एक भी व्यक्ति इस बीमारी से संक्रमित नहीं हुआ है। हमारे गाँव में ही क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया था, जबकि लॉकडाउन के समय पूरी तरह से गाँव की सीमा बंद कर दी गई थी। उस समय से हम लोगों ने भी अपने गाँव के चारों तरफ नाकाबंदी कर दी थी, ताकि बाहर से आने वाले दिहाड़ी मज़दूर या कोई भी अनजान व्यक्ति को गाँव में प्रवेश करने से रोका जा सके।

कोरोना काल में ग्रामीण क्षेत्र और स्वास्थ्य सुविधाएँ:

लॉकडाउन समाज पर योजनाबद्ध तरीके से जानलेवा हमला है। लॉकडाउन लगने से आम नागरिकों, किसानों, मज़दूरों, दिहाड़ी-मज़दूरों और छोटे-छोटे व्यापारी जो प्रतिदिन अपने-अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दो वक्त की रोटी कमा कर घर में लाते थे, उनका सब काम बंद पड़ा है। साथ-साथ आवागमन के साधन नहीं होने से, लोगों को अपने या परिवार के सदस्यों का उपचार करवाने में भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

मैं स्वयं अपनी माँ का इलाज करवाने के लिए, उनको पास के उप-स्वास्थ्य केंद्र वाडुफ़नगर लेकर गया था। प्रक्रिया अनुसार, मैं सर्वप्रथम माँ को लेकर पर्ची बनवाने, पर्ची काउंटर पर गया और वहाँ कार्य कर रही NM को मैंने बोला- सिस्टर एक पर्ची कटवानी है, तो उन्होंने पूछा की क्या हुआ? जवाब देते हुए मैंने कहा मेरी माँ के हाथ, और घुटनों में दर्द हो रहा है। बातचीत के दरमियान ही NM अचानक मुझ पर भड़क गई और बोली – आपको मालूम नहीं इस समय कोरोना चल रहा रहा और सर्दी-खांसी के अलावा किसी भी अन्य प्रकार की दवाइयाँ नहीं मिल सकती हैं। 

सिस्टर से जब कोई दूसरे विकल्प के लिए बोला तो उसने मुझे डॉक्टर साहब से अनुमति लेकर आने के लिए बोला। उप-स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ डॉक्टर से जब मैं पूछने गया तो दवाई देने की बात तो दूर, उन्होंने पर्ची तक बनाने से मना कर दिया। मैंने फिर BMO साहब के कक्ष में जाकर निवेदन किया तो उनका कथन भी सिस्टर से मिलता-जुलता था, कि इस समय केवल सर्दी-खांसी की ही दवाई उपलब्ध है। ऊपर से मिले आदेश का हवाला देते हुए, उन्होंने भी मना कर दिया। 

कोई विकल्प ना समझ आने पर, मैं वापिस पर्ची काउंटर के पास कुर्सी पर बैठ गया, और बाहर से आने वाले मरीज़ों को देखने और समझने की कोशिश करने लगा। आस-पास के गाँवों के लोग इसी केंद्र में इलाज करवाने आ रहे थे, लेकिन सभी मरीज़ों को एक ही जवाब दिया जा रहा था, कि सर्दी-खांसी के अलावा किसी भी अन्य प्रकार की बीमारी का इलाज या दवाइयाँ नहीं मिल सकती हैं।

कोरोना काल के समय को देखते हुए मेरे ज़हन में यह आभास हुआ, कि किस प्रकार से केंद्र और राज्य सरकार मिलकर योजनाबद्ध तरीके से आम नागरिकों, किसानों और मज़दूरों को कोरोना के नाम पर बेवजह शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर, मौत की खाई में धकेलने का प्रयास कर रही हैं। इसी बीच में, मेरे ही परिवार में एक और समस्या उत्पन्न हुई। मेरी कुंती भाभी, पति स्वर्गीय राजपाल, ह्रदय रोग की बीमारी से पीड़ित थी। उनका इलाज दो-तीन साल से रायपुर एम.आई. नारायण हॉस्पिटल में चल रहा था। लॉकडाउन हो जाने के कारण आवागमन पूरी तरह से बंद हो गया। इस कारण भाभी का उपचार करवा पाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। 

एक दिन अचानक उनका स्वास्थ्य खराब हो गया, तो उनका अंबिकापुर के होली क्रॉस अस्पताल में दाख़िला कराया गया। तकरीबन 1 सप्ताह उनको वहां रखा गया, पर उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। फिर उनको रायपुर के भीमराव अंबेडकर मौका हारा अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां पर कुछ हद तक उनके स्वास्थ्य में सुधार भी हुआ। लेकिन वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाई। पुनः रायपुर ले जाने के लिए पैसा नहीं होने के कारण, उनको अस्पताल नहीं ले जा पाए, क्योंकि गाड़ी बुक करके जाना पड़ता था। एक बार ले जाने का किराया 12000/- रुपए लगता है। हमारे जैसे निर्धन परिवार के लिए, विकट आर्थिक संकट उत्पन्न होने के कारण, हम उनको नहीं ले जा पाए। 31 अगस्त की रात को अचानक कुंती भाभी का स्वास्थ्य ख़राब हुआ और उनको लगातार उल्टी आने लगी। वह  ज़मीन पर गिरी और उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। 

लॉकडाउन के समय में, अगर आवागमन के साधन उपलब्ध होते, तो बस-ट्रेन के माध्यम से, उनको रायपुर पहुंचाया जा सकता था। जैसे उनका इलाज, पिछले दो-तीन सालों से करते आ रहे थे। इस लॉकडाउन के कारण ही कुंती भाभी की मृत्यु हुई। कोविड-19 के काल में, किसी व्यक्ति को, कोई भी प्रकार की बीमारी नहीं होने के बावजूद भी उनको ज़बरदस्ती उठाकर कोरोना संक्रमण के नाम पर अस्पतालों में भर्ती करा दिया जा रहा है। आम जनता, मज़दूर, किसानों को छत्तीसगढ़ सरकार बेवजह परेशान कर रही है। 

Author

  • गुलाब नाग खुरसेंगा, छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह गाँव गणराज्य संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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