13 अगस्त को, देहरादून के सिनर्जी अस्पताल में, उत्तराखंड के प्रबुद्ध लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता, त्रेपन सिंह चौहान का 48 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मोटर न्यूरोन डिज़ीज़ (एमएनडी) नाम की बीमारी से लड़ते हुए उस दिन न केवल उनका शरीर खत्म हुआ, बल्कि उत्तराखंड और भारत की परंपराओं से जन्मा वह जीवन भी समाप्त हो गया जिसने लाखों लोगों को छुआ था।

त्रेपन का जन्म उत्तराखंड के टिहरी (गढ़वाल) जिले के केपार गाँव में हुआ था। बहुत छोटी उम्र में ही वे घर से भागकर मेरठ चले गए थे, जहां एक मंदिर और होटल में वह बाल मज़दूरी किया करते थे। लगभग 14 साल की उम्र में उन्होने चिपको आंदोलन के दौरान युवाओं को संगठित करना शुरू कर दिया था। अलग-अलग समूहों-संगठनों में शामिल होने और छोड़ने के बाद, उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1994 में चेतना आंदोलन नामक संगठन की स्थापना की।

संगठन ने अपनी पहली लड़ाई सूचना के अधिकार के लिए लड़ी और जगह-जगह पर सामूहिक जन सुनवाइयों का आयोजन करवाया, धीरे-धीरे वन अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार के मुद्दों पर भी संगठन ने काम करना शुरू किया। ऐसा ही एक बड़ा संघर्ष फालिंडा नामक गांव में एक विनाशकारी परियोजना के खिलाफ किया गया। इस संघर्ष के कारण ही उत्तराखंड में ग्रामीण समुदायों और बांध बनाने वाली कंपनियों के बीच एकमात्र ऐसा समझौता हो पाया, जो वास्तव में लागू भी किया गया। 

इन आंदोलनों के दौरान, त्रेपन को कई झूठे केसों में फंसाया गया और कुछ समय के लिए उन्हें जेल में भी डाला गया। लेकिन न तो त्रेपन और ना ही आंदोलन अपने काम से कभी पीछे हटे। 2009 के बाद से, उन्होंने देहरादून में दिहाड़ी मज़दूरों को संगठित करना शुरू किया और मज़दूरों के अधिकारों और हितों के लिए संघर्ष शुरू किया। इसके फलस्वरूप हज़ारों श्रमिकों को उनके अधिकार प्राप्त हुए। इनके साथ, त्रेपन ने नफरत की राजनीति, सांप्रदायिकता और भीड़-हिंसा के खिलाफ भी अभियान चलाया। उन्होने जातिगत भेदभाव और छुआछूत का विरोध किया और अपने ही गृह क्षेत्र में पितृसत्तात्मक परम्पराओं का विरोध किया।

सीमाओं से परे
एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक जागरूक नागरिक के तौर पर त्रेपन ने जो पहल शुरू की, जिनका नेतृत्व किया या जिनमे वह शामिल हुए, उन्हें संक्षेप में लिख पाना मुश्किल है। उन्होने ‘पारंपरिक’ आन्दोलनकारी की सीमाओं से परे जाकर, उत्तराखंड आंदोलन पर सबसे प्रसिद्ध उपन्यास, यमुना, सहित कविता, छोटी कहानियाँ और उपन्यास लिखे और एक निपुण लेखक बने। उन्होंने एक वैकल्पिक स्कूल भी शुरू किया जो पिछले 15 सालों से चल रहा है। उन्होंने एक उत्पादक कंपनी (एक तरह की सहकारी या कोओपरेटिव) की स्थापना करने में मदद की, जो जल्द ही पूरी तरह से एक गाँव के लिए एक लघु जलविद्युत परियोजना चलाएगी। इसका स्वामित्व भी गाँव का होगा।

घसियारी महिलाएं

2016 में, त्रेपन ने चेतना आंदोलन के माध्यम से घास काटने वाली महिलाओंं के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित करवाईं। यह एक बहुत ही नायाब योजना थी जिसका मकसद दोतरफ़ा था, पहला कि राज्य पाने के संघर्षों में उनके योगदान को सम्मान मिले और दूसरा महिलाओं के मुद्दों पर ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचने के लिए एक मार्ग बन सके। 200 से अधिक गाँवों की 5,000 से भी ज़्यादा महिलाओं ने इसमें भाग लिया और पूरे राज्य के अखबारों के पन्नों  में यह प्रतियोगिता छाई हुई थी।

यह प्रतियोगिता त्रेपन की असाधारण रचनात्मकता और उनकी ऐसे तरीके खोजने की क्षमता का केवल एक उदाहरण भर है जो उदासीनता को तोड़ देती है। जब उनका निधन हुआ, तब उत्तराखंड के हर हिंदी मीडिया आउटलेट ने इस खबर को चलाया और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से लेकर पत्रकारों तक सभी ने सोशल मीडिया पर अपना अपना दुख प्रकट किया। उत्तराखंड के अग्रणी बुद्धिजीवियों में से एक राजीव लोचन शाह ने एक बार त्रेपन को “उत्तराखंड के मस्तिष्क” के रूप में वर्णित किया था।

त्रेपन के लिए उनका काम सिर्फ उनके सोचने के तरीके का प्रतिबिंब था, वे इसे अपने लेखक का नज़रिया कहा करते थे। त्रेपन की प्रतिभा, उनके राजनीतिक विचारों से परे लोगों को गहरी और संयत समझ बनाने, प्यार और बलिदान के लिए प्रेरित से आगे थी। उन्होंने अपना जीवन उस समझ के ही इर्द-गिर्द बनाया।


यह लेख त्रेपन भाई के संघर्ष के साथी शंकर गोपालकृष्णन द्वारा लिखित और अंग्रेज़ी दैनिक ‘द हिन्दू’ मे छपे लेख का हिन्दी अनुवाद है। अंग्रेज़ी भाषा में मूल लेख यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

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