आत्मनिर्भर झारखंडी आदिवासियों का लॉकडाउन से संघर्ष!

आमिर जलाल:

गौरतलब है कि कोविड-19 संक्रमण के कारण मौजूदा संकट की स्थिति ने जनजातीय कारीगरों सहित गरीब और हाशिये पर रहने वाले समुदायों की जीविका को भी बहुत हद तक आघात पहुंचाया है। इस खतरे ने व्यापार और उद्योग के सभी क्षेत्रों के सभी स्तरों तथा समाज के सभी हिस्सों को प्रभावित किया है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इस वैश्विक महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। यह समय वन्य उत्पाद के संग्रह/विपणन का भी है।

गुमला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के साथ-साथ यहां पर लाह, महुआ, इमली, चार(चिरौंजी), केउंद पत्ता की भी बहुतायत है। गुमला के प्रखंड रायडीह में भी लोगों की ज़रूरतें बाज़ार के मुकाबले अपने गांव-जंगल से ही पूरी हो जा रही है। रायडीह के कुछ लोगों से बातचीत के अंश:


रायडीह प्रखंड के कोंडरा गांव के हमारे साथी ननकू खड़िया कहते है कि लॉकडाउन से हमारा गाड़ी का काम रुक गया है। कहीं आने-जाने पर प्रतिबंध है। जबकि खाने पीने की ज़्यादातर चीज़ें जंगलों से प्राप्त हो जा रही है। सिर्फ तेल, नमक और मसाला ही लेना पड़ता है। डीलर से राशन मिल जाता है। पैसे की दिक्कत तो है लेकिन खाने को हो जाता है। जंगल से जो महुवा चुनकर लाते हैं, उसके बदले में तेल, मसाला, नमक और दाल ले लेते हैं। एक-दो दिन पर बारिश, बिजली की कड़कड़ाहट होती रहती है।

बैरटोली की बसंती देवी बताती है कि हम लोगों ने लॉकडाउन के पहले से दोना-पत्तल तैयार किए हुए थे, अब लॉकडाउन के बाद उसे कहां लेकर जाएं? पहले साप्ताहिक बाजार में ले जाकर ये सब बेचते थे, उससे जो पैसा मिलता उसी से ज़रूरत की अन्य दूसरी वस्तुएं खरीद लेते थे।

पतराटोली के सोमा चाचा घर में अकेले कमाने वाले हैं। घर मे कुल 4 सदस्य है, इनकी दो पोती भी हैं। एक इंटरमीडिट मे है तो दूसरी 7 साल की है। बेटे और बेटी की रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी थी। एक लाह व्यापारी के यहां काम करते हैं, जिससे उनको एक दिन में 300 रुपया मिल जाता था। पूरे सप्ताह भर में 3 दिन बाज़ार करते हैं। लेकिन लॉकडाउन की वजह से साप्ताहिक बाज़ार बंद है, तो काम भी बंद है। खर्चा चलाना मुश्किल हो रहा है, राशन व जंगलों से जो मिलता है उसी से घर चल जाता है।

बुनकर विष्णुदास खेती किसानी के साथ-साथ साप्ताहिक बाज़ार पतराटोली में कपड़े भी बेचते है। लेकिन लॉकडाउन के चलते बाज़ार बंद है। हथकरघे पर बुने गमछा, बेतरा गमछा, चादर इनके पास रहती है। घर की ज़रूरतें खेत से साग-सब्जी, अनाज से हो ही जाती है। कपड़े का बाज़ार में कोई अच्छा दाम नही मिलता है। बाज़ार में लोगों को सस्ता और अच्छा कपड़ा चाहिए, वहां कपड़े की प्रतियोगिता बहुत है।

कोजांग गांव की संतोषी देवी लॉकडाउन में प्रतिदिन घर के आस-पास की अन्य महिला पुरुष के साथ सुबह घर से बकरियां लेकर जंगल तरफ निकल जाती हैं। बकरियों के चराने के साथ-साथ महुआ, फुटकल की कमी और लाह को चुनते हैं। खाने-पीने की हम लोगों की ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं। तेल-मसाला गांव की दुकान पर से सामानों की अदला-बदली से पूरा हो जाता है।

समाचारों में और सोशल मीडिया में शहरी और महानगरीय जीवन की जो परिस्थितियां दिखाई जा रहीं हैं,  यहां उनसे एकदम अलग सा माहौल है। मुझे यह भी महसूस हो रहा है कि शायद प्रकृति के करीब और उस पर आश्रित ग्रामीणों के लिए यह लॉकडाउन बहुत मामूली सी ही बात है।

एक समाज का आत्मनिर्भर होना संभव है अगर जीवन से जुड़ी वस्तुओं और परिस्थिति को हम आदिवासी समाज के नज़रिए से देख पाएं। ढहते हुए वैश्विक पूंजीवाद का विकल्प अभी भी आदिवासी समाज के पास है और जो दुनिया के लिए भी एक विकल्प हो सकता है और इसके दो बहुत सामान्य सिद्धांत हो सकते हैं- पहला ज़रूरत से ज़्यादा की ज़रूरत नहीं और जो भी ज़रूरतें हैं वो आस-पास से पूरी हों।

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  • आमिर, पेशे से बुनकर, उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह झारखंड के गुमला ज़िले में निर्माण संस्था से जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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