चित्तौड़गढ़, राजस्थान से लॉकडाउन की कहानी, साथी की ज़ुबानी

गीता साल्वी:

गीता, चित्तौड़गढ़ के भदेसर के आधारशिला बालिका स्कूल में शिक्षिका के तौर पर काम कर रही हैं।

हमने 18 अप्रैल 2020 से मास्क बनाना शुरू किया था। 2 महीने तक पूरे स्टाफ ने मिलकर 5000 मास्क तैयार किए। मई महीने में हम लोग चित्तौड़गढ़ के 30 गांवों में राशन बांटने गए। संस्था की तरफ से राशन बांटा गया जिसमें दैनिक आवश्यकता पूर्ति के लिए खाद्य सामग्री शामिल थी जैसे तेल, हल्दी, मिर्च, आटा, जीरा, नमक, कपड़े धोने का साबुन, नहाने और हाथ धोने का साबुन और सेनेटाईज़र और मास्क आदि का वितरण किया गया। राशन वितरण के लिए गांवों में जाकर ऐसे परिवारों को चुना गया जिन्हें सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

गीता अपनी साथी के साथ मास्क बनाते हुए

सभी गांवों में मनरेगा का काम चल रहा है जिसमें पिछले सालों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा मज़दूर सम्मिलित हुए हैं। इसका मुख्य कारण कोविड-19 था, जिसके कारण अधिकतर लोग बेरोज़गार हो गए थे। ऐसे लोग अब मनरेगा में काम के लिए आवेदन कर रहे हैं। जब हम गांवों में पहुँचते थे तो लोगों की भीड़ लग जाती थी। कुछ परिवारों की स्थिति बहुत ज़्यादा खराब थी, क्यूंकी उनके घर में खाने को अनाज भी नहीं था। सबसे ज़्यादा बुरी हालत भील समाज के लोगों की थी, उनके घरों में लोगों की संख्या भी ज़्यादा थी और आय के साधन भी नहीं थे।

लॉकडाउन की शुरुआत में लोगों के अंदर ज़्यादा डर नहीं था, उनके लिए सब कुछ नॉर्मल था। लेकिन जब प्रवासी लोग पैदल ही वापस लौटने लगे तो लोगों में कोरोना बीमारी का डर दिखने लगा। हर रोज़ टीवी-अखबार, मोबाइल आदि पर कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों को देखकर हम सब के अंदर भी डर पनपने लगा था। लेकिन हमने लोगों से मिलना बरकरार रखा। मास्क और सेनेटाईज़र का हम लोग इस्तेमाल तो कर रहे थे लेकिन बिना लोगों के पास जाए उनकी मदद करना संभव नहीं था। हमने इस बीमारी से बचने के लिए और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए मास्क लगाने, समय-समय पर साबुन से हाथ धोने और बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाने जैसी बातों की जानकारी, अपने क्षेत्र के हर व्यक्ति तक पहुंचाई।

गाँव में मास्क बांटे गए

9 जून को प्रेरणा दीदी, गायत्री दीदी और मुझे राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में भेजा गया। प्रतापगढ़ की देवगढ़ तहसील में प्रयास संस्था के ऑफिस में रहकर हमने उस क्षेत्र में काम किया। देवगढ़ आदिवासी उपयोजना (ट्राइबल सब प्लान या टीएसपी) क्षेत्र में आता है जहां मीणा जनजाति के लोग बहुतायत में रहते हैं। यहाँ के 30 गांवों में हमने स्वास्थ्य के विषय पर मीटिंग की। महिला बैठकें की गयी जिसमें महिलाओं को मास्क वितरित किए गए, साथ ही सामाजिक दूरी या सोशल डिसटेंसिंग का खयाल रखते हुए उन्हें 1 मीटर की दूरी पर बिठाया गया। इन बैठकों में महिलाओं को कोरोना बीमारी सहित मलेरिया और अन्य गंभीर बीमारियों के लक्षणों और उनसे बचाव के उपायों के बारे में जानकारी दी गयी।

किशोर और किशोरियों के साथ भी हर गांव में मीटिंग की जाती थी, जिनमें उन्हे कोरोना बीमारी, मलेरिया और किशोरावस्था में शरीर में आने वाले बदलावों की भी जानकारी दी जाती थी, साथ ही उन्हे सही मार्ग का चुनाव करने के लिए भी प्रेरित किया जाता था। किशोरियों को माहवारी के दौरान अच्छे स्वास्थ्य के लिए सफाई का ध्यान रखने और पौष्टिक आहार लेने और अन्य बीमारियों से बचने के तरीकों पर भी उनके साथ बैठकें की गई।

इस इलाके में लोग दूर-दूर घर बनाकर रहते हैं, ऐसे में उन्हें एकत्रित करने और बैठक करने में काफी दिक्कत होती थी। इस दौरान हमने बच्चों को दलिया, किशोरियों को सेनेटरी पैड और महिलाओं को हाथ धोने के साबुन आदि का वितरण भी किया। बैठक में भाग लेने वाले हर व्यक्ति को मास्क दिया गया, और सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन किया गया।

कुछ गांव सीता माता अभयारण्य के क्षेत्र में भी बसे हुए हैं, इन गांवों से संपर्क करना और उनके साथ बैठके करना ‘टेढ़ी खीर’ समान था। ना तो वहां मोबाइल का नेटवर्क आता है और ना ही पक्की सड़क है। वहां की एक खास बात यह है कि वहां की महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा प्राप्त है।

क्षेत्रीय अखबार में छपे साथियों के प्रयास

कोविड-19 के कारण लॉकडाउन लगातार बढ़ता ही गया। इस वजह से स्कूल नहीं खुल सका तो संस्था की तरफ से बालिकाओं के लिए स्टेशनरी उपलब्ध करवाई गई। स्टेशनरी (रबर, पेंसिल, शार्पनर, सभी विषयों की कॉपी, ड्राइंग नोटबुक, कलर्स, पहेली पुस्तिका, पेन इत्यादि।) के साथ ही प्रत्येक बालिका को किट उनके घर जाकर दिए।

पांच महीनों तक बच्चों का घर पर रहना बहुत बड़ी क्षति साबित हुई है। आधारशिला में पढने वाली सभी छात्राएं दूर-दराज़ के क्षेत्रों से आती हैं। पहली बार जब हमें इन बालिकाओं के घर जाने का अवसर मिला तो उनकी वास्तविक स्थिति से भलीभांति परिचित हो पाए। आधारशिला में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमज़ोर है। भील व मीणा (आदिवासी या ST) समाज की छात्राएं अपने घर व खेत का काम करने में परिवार की मदद करती हैं। लॉकडाउन के कारण पढ़ाई से तो जैसे बच्चों ने दूरी ही बना ली है। विद्यालय से उनके घर की दूरी बहुत ही ज़्यादा है, इसलिए उन्हें बार-बार गृह कार्य देना या पढ़ाना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।

घर पर जाकर उन्हें एक बार फिर पढ़ाई से जोड़ना ही हमारा प्रयोजन है, ताकि वो उस कड़ी से जुड़ी रहें। क्योंकि उनके माता-पिता अनपढ़ हैं और आर्थिक स्थिति से कमज़ोर हैं, तो हर परिवार में तीन-चार या उससे भी अधिक बच्चे हैं, जिसके कारण इन बच्चों का चाहकर भी पढ़ाई की तरफ रुझान नहीं होता है। इसके साथ ही जब हम गांवों में जाते हैं तो कुछ ज़रूरतमंद नई बालिकाओं को भी कॉपी, पेन, पेंसिल, रबर देकर पढ़ाई से जोड़ते हैं। मोबाइल के मध्यम से छात्राओं से संपर्क करते रहते हैं। उनके माता-पिता को भी साथ में प्रोत्साहित करते हैं कि बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और इनका बाल-विवाह ना करें। कोरोना से बचने के लिए निश्चित दूरी, मास्क, सेनेटाइज़र आदि का प्रयोग करते हुए, पूरा ध्यान रखा जाता है।

छात्राओं को स्टेशनरी दी गई

आधारशिला विद्यालय में पढ़ने वाली दो छात्राओं ने अपने घर पर रहकर, गांव की अन्य बालिकाओं को पढ़ाने की मुहिम शुरू की है। मधु भील, केसरपुरा में रहती हैं और कक्षा नौवीं की छात्र हैं। मधु के पापा ने दूसरी शादी कर ली है, जिसके कारण मधु की मम्मी अपने पीहर में रहकर मज़दूरी करती हैं। मधु के घर पर कम से कम 20-25 बालक-बालिकाएं नियमित रूप से पढ़ाई करने आते हैं। मधु का घर पक्का नहीं बना हुआ है, उसकी मम्मी व उसने मिलकर एक तिरपाल डालकर छपरा तैयार किया है, जहां वह बच्चों को खुले आंगन में पढ़ाती हैं। बच्चे नियमित रूप से मास्क और निश्चित दूरी जैसे ऐतिहाद बरतते हैं।

कविता भील, पीरखेड़ा गांव में रहती हैं। कविता के परिवार में उसकी मम्मी, बड़ा भाई और छोटी बहन हैं, उसके पापा की मृत्यु हो गई है। जब हम वहां पाठ्य सामग्री वितरण करने गए और नई लड़कियों को जोड़ा तब से कविता सभी बच्चों को नियमित तौर से पढ़ा रही हैं, कविता कक्षा आठवीं की छात्रा हैं। केसरपुरा और पीरखेड़ा में हम सभी बालिकाओं को दो बार पाठ्य सामग्री, मास्क आदि देकर आए हैं, ताकि बच्चे सुचारु रूप से अध्ययन कर सकें।

गाँव में खुले आँगन में क्लास चलती हुई

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  • गीता, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में शिक्षिका हैं।

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