अररिया, बिहार से लॉकडाउन में गाँव की कहानी, साथी की ज़ुबानी

अखिलेश:

लॉकडाउन के चलते लक्ष्मीपुर कुर्साकांटा मे छोटे मज़दूरों, किसानों एवं दलितों पर काफी प्रभाव पड़ा है। बहुत सारे लोग लॉकडाउन के 10 से 15 रोज़ पहले कर्ज लेकर, किश्तों पर रुपया उठाकर बाहर कमाने के लिए गए थे। दिल्ली, पंजाब, सोनीपत, तमिल नाडु आदि जगहों पर जब यह लोग पहुंचे तो किसी ने दो रोज़, किसी ने तीन रोज़ काम किया और फिर लॉकडाउन चालू हो गया। इसके चलते मज़दूरों का काम बंद हो गया और ये भूखे प्यासे रह गए। ये लोग जब कमाते तब गाँव में उनके घर का चूल्हा चलता, लेकिन लॉकडाउन के कारण मज़दूर लोग रुपया नहीं भेज पाए। मज़दूर लोगों के घर पर काफी दिक्कतें हुई, और महिलाओं का टेंशन ज़्यादा बढ़ गया।

लोग बीमार हो रहे थे और भूख के कारण बहुत सी दलित गर्भवती महिलाओं को बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। जब संगठन को इसका पता चला तो हर ज़रूरतमंद परिवार को एक पीस साबुन, 5 किलो चावल, 1 किलो दाल की मदद सबके घर तक पहुँचाई गई। इस दौरान सरकार ने 500 रुपये की सहायता देने की बात कही, लेकिन यह कुछ लोगों को मिला और कई लोगों को नहीं भी मिला।

संगठन लोगों की मदद भी करता है और उन्हें ताकत भी देता है।

सरकार ने तो यह भी बोला था कि जिसके पास राशन कार्ड नहीं है, उन सभी का 7 दिनो के अंदर राशन कार्ड बनकर आ जाएगा। बहुत सारे लोगों ने जीविका के पास इसके लिए आवेदन भी दिए थे, लेकिन किसी का भी राशन कार्ड बनकर नहीं आया। ऐसे में जिनके नाम राशन कार्ड नहीं था उनको राशन नहीं मिला, जो लोग संगठन से नहीं जुड़े थे, उनको भी किसी तरह की मदद नहीं मिल पाई, ऐसे लोगों की हालत बहुत ही गंभीर थी।

लॉकडाउन के कारण गाँव मे लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा था। छोटे मज़दूर-किसान अपने खेतों मे पूरा काम खुद ही काम कर रहे थे, क्योंकि जब लॉकडाउन लगा तो वह समय मकई (मक्का) तैयार करने का था। छोटे मज़दूर-किसान अलग से मज़दूर नहीं रख सकते थे, क्योंकि मकई का सही मूल्य नहीं मिल रहा था।

मनरेगा में काम के लिए तैयार मजदूर साथी।

ऐसे समय में रोज़गार के खातिर, सोशल डिस्टेन्सिंग का खयाल रखते हुए लोगों को नरेगा में काम के लिए भी आवेदन किए। आवेदन करने के बाद पंचायत रोज़गार सेवक, प्राप्ति देने का तैयार नहीं होता था। प्राप्ति लेने के लिए लोगों को लगातार ब्लॉक का चक्कर काटना पड़ रहा था। जब प्राप्ति मिल भी गया तो भी वह काम देने के लिए वो तैयार नहीं थे।

प्राप्ति मिलने के बाद जब एक महीने से भी ज़्यादा दिन हो गए तो लोगों ने यह सूचना जन जागरण शक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं को बताई, संगठन के प्रयासों से उस समय लोगों को पोखर बनाने का काम भी मिला। जब मज़दूर काम करने के लिए साइट पर पहुंचे तो जमींदार ने पोखर बनाने से इनकार कर दिया और लोगों को काम करने से रोका। इस तरह दो जगहों पर लोगों को काम करने नहीं दिया गया। जितने दिन का नरेगा का मस्टर रोल निकला हुआ था, उतने दिन लोगों को बैठे ही रहना पड़ा। 100 दिनों में कुछ लोगों को दो सप्ताह तो किसी को एक ही सप्ताह काम मिल पाया।

साथी हाथ बढ़ाना।

जब काफी ज़्यादा बारिश हुई तो फिर काम रुक गया, और अभी भी रुका हुआ है। मज़दूरी करने में कोई दिक्कत नहीं, महिला-पुरूष सब मिलकर काम करते थे। प्रवासी मज़दूर जो वापस लौटे थे, काम में नहीं जुड़ पाए क्योंकि पोखर का जब काम मिल रहा था तो उसमें पानी भरा हुआ था, जिसकी वजह से मज़दूरों को बैठे ही रहना पड़ा। सरकारी अफ़सरों ने काम को लेकर लोगों की कोई मदद नहीं की, कोरोना के बाद अगर पानी की वजह से अगर पोखर या निर्माण का कोई काम नहीं खुल पा रहा था तो वृक्षारोपण के लिए मज़दूरों को काम पर लगाया जा सकता था, पर कहीं भी ऐसा काम नहीं खुला। हम सभी ने साफ तौर पर देखा कि रोज़गार को लेकर सरकारी अफसरों ने काफी लापरवाही बरती।

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  • अखिलेश, बिहार के अररिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। गाने लिखना, गाना और सबको खेल खिलाने में माहिर। जन जागरण शक्ति संगठन के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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