तेजस्विता :

लेखक ने युवानिया के इस अंक के लिए यह लेख गाँव के लोगों और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच की चर्चा के रूप में लिखा है, जिसमें हाल ही में किये गए कोयला और खनन कानूनों में बदलाव के बारे में बातचीत और उससे गाँव वासियों पर क्या प्रभाव होंगे उस पर प्रकाश डालता है ।

सरगुजा के एक गाँव में, पंचायत घर के बाहर, पेड़ की छांव में बैठे बात करते हुए –

सचिव: सरपंच जी बीते दिनों, न्यूज़, सोशल मीडिया और अखबारें एक चकमक सी घोषणा करते हुए नज़र आए – आत्मनिर्भरता की घोषणा। “UNLEASHING COAL, New Hope for Aatmnirbhar Bharat” के ट्वीट के साथ, देश के 80 कोल ब्लॉकों को व्यावसायिक उपयोग के लिए 18 जून से नीलाम किया जाएगा। आप ने देखी थी खबर?

सरपंच जी: हाँ सचिव जी, मैंने भी देखा तो था, पर साफ़-साफ़ समझ नहीं पाया यह आत्मनिर्भरता क्या होती है?

सचिव: अरे सरपंच जी, जैसे हम लोग इस छोटे से गाँव में, अपनी खाने-पीने की सब ज़रूरतें खेती और जंगल से लाए उपज से कर लेते हैं, बिना ज़्यादा किसी दूसरे व्यक्ति या बाज़ार पर निर्भर हुए, उसी तरह अब देश कोयला क्षेत्र में भी स्वयं ही अपनी ज़रूरतों को पूरा करने का प्रयास करेगा, बिना विदेश से कोयला मंगवाए।

रमेश: सचिव जी, तो फिर हमारे गाँव का क्या होगा? कोयला तो हमारे क्षेत्र में भी पाया जाता है। हमारी आत्मनिर्भरता/ इच्छा का क्या?

सचिव: निश्चित ही, हम जैसे आदिवासी समुदायों की आत्मनिर्भरता की चिंता तो इसमें नहीं है, क्यूंकी हम तो वर्तमान में ही आत्मनिर्भर हैं। और तो और इस नीलामी की प्रक्रिया के शुरू होने के बाद हम सब को ही विस्थापित होकर अन्य समुदायों पर आश्रित होना पड़ेगा। मैंने तो यू-ट्यूब पर एक वीडियो देखा जो बता रहा था कि यह आत्मनिर्भरता भारत की कोयला ज़रूरतों से भी नहीं जुड़ी है, क्यूंकी ये खदानें तो कमर्शियल माइनिंग के लिए दी जा रही हैं जिसका हमारे देश की ज़रूरतों से कोई लेना देना ही नहीं है।

अरे रमेश भाई, पता है, उसमें यह भी बोला गया था कि सरकारी आंकड़ों और कोल इंडिया लिमिटेड के vision–2030 के अनुसार, हमारे देश की अगले 10 साल तक की कोयला ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए, वर्तमान में आवंटित/चालू खदानें पहले से ही सक्षम है। सरपंच जी, रमेश भाई, मुझे तो लगता है कि हमको अब नए भारत की उम्मीद भी अब छोड़ देनी चाहिए। कोयला की ही बात करें अगर, तो कोयला तो घने जंगलों और बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा वाली जगहों पर ही पाया जाता है। अब तो हमारे पोता-पोती पता नहीं ऐसा सरगुजा फिर कभी देख पायेंगे या नहीं। आँखों के सामने ही तो क्षेत्र की हरियाली अब कोयले की धूल में ढकती जा रही है। आज से 15-20 सालों में तो यह पूरा काली चादर में ढक जाएगा।

साथ में बैठे, बातें सुन रहे एक व्यक्ति: अगर कोयला निकालेंगे तो हमारे जंगल का क्या होगा? हमारे ढोर-मवेशी कहाँ चरने जायेंगे? जंगल के हाथी, हिरन और बाकी जानवर? अख़बार में मैंने पढ़ा था कि हाथियों के लिए इस पंचायत के पास से एक कॉरिडोर बनेगा!

सचिव: अरे भाई, वही तो खतरे की घंटी है। कई क्षेत्रों के घने जंगलों को तो सरकार ने भी अपने दस्तावेज़ों में “Inviolate” माना है। इसका मतलब यह है कि, किसी भी अवस्था में इन क्षेत्रों में कटाई नहीं की जा सकती, क्षेत्र का विनाश नहीं किया जा सकता और ना ही इस ज़मीन को राज्यों में विकास के लिए अवसर के रूप में देखा जा सकता। हमारा क्षेत्र भी इस ही ज़ोन में आता है।

सरपंच जी: भगवान जाने सरकार फिर किसकी आत्मनिर्भरता, कौन सी उम्मीद, और किसके अवसर की बात कर रही थी टीवी पर, मुझे तो इसमें कोई अवसर दिख ही नहीं रहा!!

सचिव: वही तो बात है सरपंच जी। हमारी सरकार इतनी मेहनत करके कॉर्पोरेट और पूंजिपत्तियों के लिए अवसर खोल रही है। देश को मज़बूत बनाने के नाम पर, पूंजीपतियों की जेब मोटी कर, हम आदिवासियों को उजाड़ रही है। गए हफ्ते जब मैं हसदेव में रह रहे गोमेद काका के घर गया था, तो वहां पर उनकी पहचान के एक पत्रकार और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता आए थे। वह समझा रहे थे कि पिछले एक साल से ही खान और खनन से जुड़े कानूनों में सरकार बार-बार बदलाव/ संशोधन ला रही है। हाल तो ऐसा कर दिया है कि कोयला भी अब किसी सामान्य वस्तु के जैसे बाज़ारों में बेचा जा सकता है। उस पत्रकार के हाथ में तो एक लम्बी सूची थी बदलावों की। जान रहे हैं सरपंच जी, कम से कम 2 पन्ने की सूची तो होगी ही!!

सरपंच रमेश साथ में: 2 पन्ने से भी लम्बी? अरे बाप रे!! आपकी बातों से लग तो नहीं रहा कि हमारे फायदे के लिए कोई संशोधन हुआ होगा।

सचिव: फायदा? फायदा तो दूर, इसके लागू होने के बाद हम सब कहीं के नहीं रहेंगे। हमारा यह जंगल भी नहीं रहेगा। जो बदलाव जारी किये गए हैं, उसमें एक पॉइंट था कि अब विदेश से इस कोयला क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश और खुले बाज़ार में कोयला बेचने की अनुमती दे दी जाएगी। यह भी अपने आप में किसी खतरे से कम नहीं है। अब जब विदेश से पैसा लगाया जा सकता है, तो निश्चित ही माइनिंग करने पर अब ज़्यादा ज़ोर दिया जाएगा। इस ज़ोर का पूरा मकसद भी मुनाफा कमाने की इच्छा से प्रभावित होगा।

सरपंच जी: इसका मतलब क्या अडानी की कंपनी और शक्तिशाली हो जाएगी?

यह जंगल काटे जाएंगे, कोयला निकाला जाएगा और बनेंगे पावर प्लांट।

सचिव: अडानी तो एक पूंजीपति है, उसके अलावा जिन कंपनियों और उद्योगपतियों के पास भारत में कोयला खनन का कोई पूर्व अनुभव नहीं है, वह भी अब कोयला/लिग्नाइट ब्लॉक की नीलामी में भाग ले सकते हैं। इसके साथ-साथ, किसी खदान में कितना भंडार है, इसके सर्वेक्षण का काम भी निजी कंपनियों के हाथ में सौंपने का प्रावधान है। यानी कि पूर्ण रूप से अब न्यूनतम मानदंडों को पूरा करने वाली किसी भी कंपनी को कोयला खानों के लिए बोली लगाने की अनुमति होगी।

रमेश: अरे सचिव जी, आप तो ऐसे डरा रहे हैं, जैसे कल ही हमको यहाँ से विस्थापित कर दिया जाएगा। न्यूज़ पर तो दिखा रहे थे कि खान–खनन से जुड़े कानूनों में बदलाव देश को अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर देगा।

सचिव: यह सब भ्रमित करने वाली बातें है रमेश भाई। आप ही बताओ अगर ऐसा था तो सरकार ने नीलामी की शर्तें क्यूँ बदली? पहले के कानून में तो लिखा था कि नीलामी प्रक्रिया में कम से कम 4 बोलीदार होने ज़रूरी हैं। इस से एक यह उम्मीद तो थी कि हर बोलीदार की बोली को ठीक रूप से परखा जाएगा और फिर ही उसकी जीत होनी संभव है। पिछले कुछ सालों में बार-बार नीलामी तो हुई, पर सब बोलीदार इस कोयला खनन में हस्तक्षेप को एक महंगा सौदा मानते हैं। याद है पिछली बोली में तो सब ने निवेश करने से अपने हाथ ही खड़े कर दिए थे। इसलिए प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए अब नीलामी प्रक्रिया में सिर्फ 2 ही बोलीदार होने आवश्यक हैं। बूझे इससे क्या होगा?

सरपंच: हाँ भाई, अंबानी-अडानी के चक्कर में, हम आदिवासी देंगे अपनी इच्छाओं की बली । ☹

इस बारी चालू होने वाली नीलामी प्रक्रिया में तो हमारे क्षेत्र का भी नाम है! इसका मतलब तो यह है की यहाँ की खदान का आवंटन होते ही, अगले 30 साल तक तो खनन बंद होने से रहा।

सचिव: अरे सरपंच जी, 30 साल? लगता है यह बदलाव भी नहीं देखा आपने भाई! 30 साल से बढ़ाकर अब लीज़ की अवधि 50 साल कर दी गई है। मुझे तो लगता है आने वाली पीढियां अब पुराने नक़्शे और तस्वीरों में ही इस क्षेत्र की सुंदरता देख पाएँगी। 50 साल तो बस बोलने की बात है, क्योंकि नये क़ानूनी संशोधन के अनुसार, खनन करने वाली कोई कंपनी अगर अपने खनन का लीज़ किसी अन्य कंपनी को दे देती है तो नई कंपनी को वन स्वीकृति, ग्राम सभा की स्वीकृति जैसे लगभग 20 तरह की अलग-अलग किस्म की अनापत्तियों की प्रक्रिया पूरी करने के लिये 2 साल का वक़्त दिया जाएगा, लेकिन इस दौरान कंपनी खनिज का उत्खनन जारी रख सकती है। मतलब कागज़ी ज़िम्मेदारी और पर्यावरण बचाने की बस बातें भर हैं, असलियत तो इससे कोसों दूर है।

रमेश: सरपंच जी, सचिव जी! कोई तो उपाय होगा? हम तो पेसा क्षेत्र में आते हैं। ग्राम सभा भी समय से करते हैं। क्या हमारे पास कोई तरीका नहीं अपने सरगुजा को खनन कंपनियों से बचाने का?

सरपंच जी: हाँ, ग्राम सभा की सहमति और राज्य की सहमति भी तो कवच हैं जो शायद बचा पाएं हमारे क्षेत्र को!

सचिव जी: क्या सरपंच जी! आपको लगता है सरकार यह सब नहीं सोची होगी? या उसने अनुमान नहीं लगाया होगा कि किस-किस पड़ाव पर अटकलें आ सकती हैं। सरकार तो दो कदम आगे है इसमें। संशोधन प्रस्ताव में यह भी जोड़ दिया गया है कि उत्पादन जारी रखने के नाम पर केंद्र को कोई भी नये नियम बनाने का अधिकार है। केंद्र सरकार एमडीओ की तर्ज़ पर कोई भी सर्कुलर लाकर किसी भी क़ानूनी प्रावधान को जोड़ने-घटाने का काम कर सकती है।

रमेश: आप दोनों की बातें सुनकर तो लग रहा है कि, खनिज और कोयला क़ानून में किये गये संशोधन से देश में कोयले की अंधाधुंध खुदाई का नया अध्याय शुरु होने वाला है!! मुझे तो लग रहा है निजी कंपनियां अब पहले से भी ज़्यादा ताकतवर होने वाली हैं।

सचिव जी: बात तो तुम्हारी सही है रमेश। कोयले का अंत-उपयोग प्रतिबन्ध हटने से, इसे खुले बाज़ार में बेचने के दरवाज़े भी खुल गये हैं। इस क़ानून में संशोधन का देश की कोयले ज़रूरतों से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधन को निजी कंपनियों के हवाले कर देने की कोशिश है।

सरपंच जी: आप चिंता ना करे सचिव जी, अभी तो ग्राम सभा की ताकत आज़मानी बाकी है। निश्चित ही हम लोग ग्राम सभा बुलाकर खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित करेंगे। मुझे विश्वास है कि पूर्ण बहुमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाएगा। कल ही आप रजिस्टर में आने वाले हफ्ते के लिए ग्रामसभा बुलाने का पत्र लिख दें। समझ रहे हो ना रमेश? अपने टोले के लोगों को भी तुम समझा देना और सबको ग्राम सभा में आने को बोलना। सचिव जी, क्या आप एक छोटा सा प्रेजेंटेशन बना सकते हैं, ग्राम सभा से पहले? मुझे लगता है लोगों को हर बिंदु को बारीकी से समझाना ज़रूरी है।

रमेश: हाँ बिलकुल सरपंच जी, आप निश्चिंत रहे, ग्राम सभा की सूचना और सबके आने को सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी मैं लेता हूँ। मुझे लगता है कि गाँव की सब महिलाओं का इसमे शामिल होना बहुत ज़रूरी हैl मैं जब अपनी चचेरी बहन जया से बात कर रहा था, तो वह बता रही थी की गुमला में तो महिलाओं ने सामने से आकर संगठित विरोध दर्ज करवाया, जिसके कारण वह वहां बॉक्साइट खनन की एक साइट को रोक पाए।

सचिव जी: विचार तो अच्छा है। मुझे लगता है यह मज़बूती हम सबको अपने क्षेत्र में लानी होगी। हमको संकल्प लेना होगा कि चाहे कुछ ही हो या कोई लालच भी दिया जाए, हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे, ना ही उस पर खदान खोलने देंगे। गोमेद काका अपने हसदेव अरण्य क्षेत्र की कहानी बता रहे थे। जानते हैं वहाँ के जंगल तो छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे मध्य भारत में सबसे सघन, और जैव विविधता से परिपूर्ण है, वहां भी हाथी का आवास क्षेत्र है। 

गोमेद काका बोल रहे थे कि, 2010 में इस पूरे क्षेत्र को “नो-गो” घोषित किया गया था। वर्तमान सरकार की “inviolate” नीति के दस्तावेज़ों को देखें तो इस क्षेत्र के अधिकांश ब्लॉक (20 में से 18) अभी भी “inviolate” माने गए हैं। देश के सभी कोलफ़ील्ड में से सबसे ज़्यादा ऐसे ब्लॉक हसदेव अरण्य में ही हैं। फिर भी नीलामी की सूची में यहाँ के 6 कोयला ब्लॉकों को शामिल किया गया है, जबकि 7 का आवंटन पहले ही सार्वजनिक कंपनियों को किया जा चुका है। साथ ही यहाँ की ग्राम सभाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर लगातार खनन का विरोध करती आई हैं। उन्होने कई पत्र तथा ग्राम सभा प्रस्तावों से प्रधान मंत्री, कोयला मंत्री, मुख्य मंत्री, इत्यादि से नीलामी/आवंटन के खिलाफ अपना विरोध जताया है। फिर भी सोचने की बात तो यह है कि, ऐसे महत्वपूर्ण इलाकों का बंदरबांट, जन-विरोध के बावजूद क्यूं किया जा रहा है? और वो भी ऐसे संकट-पूर्ण समय में कमर्शियल माइनिंग, यानि निजी मुनाफे के लिए?

काका बताए कि वह सामाजिक कार्यकर्ता बोल रहे थे कि नीलामी में शामिल की गयी खदान भारत के सबसे घने जंगलों और पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थित हैं। साथ ही इनमें से अधिकांश खदानें आदिवासी बहुल पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में हैं जहां पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार कानून 2006 के तहत जन-समुदाय को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिसके तहत खनन से पूर्व ग्राम सभाओं कि सहमति आवश्यक है। पर पूर्व के अनुभवों को देखें तो नीलामी के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनाश निश्चित है। हसदेव अरण्य तो “छत्तीसगढ़ के फेफड़ें” के रूप में देश भर में जाना जाता है, अगर इसका विनाश हो जाएगा तो इसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।

कोल माइनिंग के खिलाफ, ग्राम सभा ही बचाव है।

सरपंच जी: तो भाई, देरी किस बात की! सरकारी – पूंजीपतियों की लूट पर रोक लगाने के लिए जो प्रयास लगेंगे हम गाँव वाले मिल आकर करेंगे। अगर हसदेव में लोग ग्राम सभा की प्रक्रिया अपना रहे हैं, और अपना विरोध हर तरह से दर्ज करवा रहे हैं, तो मुझे लगता है, हमे भी मैदान में कूद कर, अपने क्षेत्र को बचने के सभी प्रयास शुरू कर देने चाहिए।  सचिव जी, रमेश तुम लोग भी आस-पास के संगठनों से बात करो। मुझे लगता है हमको गाँव में भी अलग-अलग जगह पर पोस्टर लगवाने चाहिए, कोयला क्षेत्र के बारे में जानकारी देते हुएl लोगों को भी तो पता चले कि देश का काला सोना, हम आदिवासियों की मृत्यु का कारण बन रहा है!

सचिव जी: सही बोल रहे हैं आप सरपंच जी। मोदी सरकार ने तो स्पष्ट कर दिया है कि उनकी संवैधानिक प्रावधानों में कोई आस्था नहीं और पर्यावरण संरक्षण से उनका कोई लेना-देना नहीं है। चिंता है तो सिर्फ चुनिन्दा कंपनियों के मुनाफे की – जिसमें देश की कोयला ज़रूरतों, जन-हित, उससे जुड़े पर्यावरणीय तथा सामाजिक न्याय, तथा ग्राम सभा के संवैधानिक अधिकारों की कोई जगह नहीं है। मैं कुछ और साथियों के साथ आज से ही पोस्टर बटोरता हूं और अगले हफ्ते के लिए ग्राम सभा बुलाई जा रही है इसकी सूचना सब तक पहुंचा देता हूँ।

कोयला राष्ट्रीय संपदा है !
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  • तेजस्विता, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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