राकेश जाधव: लिखते-लिखते कोरे कागज ख़त्म हो गए थे, मैंने फ़टाफ़ट अपने ढीले कपड़े खूंटी पर लटकाए और झोला उठाकर… READ MORE
तन्नु: मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ,इसे करीब से समझना चाहती हूँमहसूस करनी है मुझे इसकी पीड़ा,इसलिए प्रकृति के रूप में… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
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