राकेश जाधव: लिखते-लिखते कोरे कागज ख़त्म हो गए थे, मैंने फ़टाफ़ट अपने ढीले कपड़े खूंटी पर लटकाए और झोला उठाकर… READ MORE
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पूजा यादव: रक्षा बंधन के बाद हमारे यहाँ एक छोटा-सा मेला लगता है, जिसको पड़इनिया का मेला कहते हैं। यह… READ MORE
हीरालाल: श्रावण का महीना शुरू होता है, प्रकृति नीली चादर ओढ़कर अपने आप को सुसज्जित कर लेती है। वृक्षों की… READ MORE
अंतरसिंग निगवाले: मैं संघर्ष से नहीं डरतामैं भारत का आदिवासी हूँ।मैं प्रकृति की आंचल में रोज जीता हूँ।अपनी सांस को… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
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