पूजा यादव:
रक्षा बंधन के बाद हमारे यहाँ एक छोटा-सा मेला लगता है, जिसको पड़इनिया का मेला कहते हैं। यह मेला भी साल में एक बार लगता है। पहले के समय में मेले में दंगल भी होता था। दंगल देखने के लिए पहले मेले में बहुत भीड़ हुआ करती थी। इस मेले के आस-पास के 2-3 गाँवों के लोगों में महीने भर पहले से ही काफी उत्साह और खुशी रहती है।
मेले में गोदना, टैटू, कॉस्मेटिक, टिकिया, चाउमीन, खिलौने, झूले- हर तरह की दुकानें लगती हैं। ज़्यादातर दुकानें आस-पास के बाज़ारों से आती हैं और कुछ दुकानें दूर-दराज़ के बाज़ारों से भी आती हैं। यह मेला चार-पाँच गाँवों के बीच का है और सभी गाँवों का यह काफी नज़दीकी मेला है।
हमने जो देखा और ऑब्ज़र्व किया, सभी गाँवों का करीबी मेला होने की वजह से मेले में काफी भीड़ होती है, जिसमें ज़्यादा संख्या में महिलाएँ और लड़कियाँ भी मेला देखने आती हैं। रक्षा बंधन के त्यौहार पर जो भी बहनें और लड़कियाँ अपने मायके, भाइयों को राखी बाँधने आती हैं, वे भी मेला देखने के लिए बहुत उत्साहित रहती हैं। मेले के लिए ही वे त्यौहार के बाद भी 6-7 दिन रुकती हैं। अपने मायके में अपनी पुरानी यादों को जीने के लिए उनको थोड़ा समय मिल जाता हैं।
महीनें पहले ही बच्चे बहुत खुश और उत्साहित रहते हैं। इसके लिए पैसा भी जुटाते और बचा कर रखते हैं। बच्चे कहते हैं- “पड़इनिया का मेला आ रहा है, हम सब साथ मेला देखने जाएँगे, हम वहाँ से खिलौने लाएँगे ढेर सारे और टिकिया, जलेबी, चाउमीन खाएँगे और घर भी लेकर आएँगे।” बच्चों में तो अलग ही तरह की खुशी देखने को मिलती है। यहाँ जो दुकान आती हैं, वह सभी आस पास की होती हैं। जो खाने का समान मिलता हैं, वह भी देसी ही होता हैं। जो शहरी बाज़ार से बिलकुल भिन्न हैं।
कहा जाता है कि पहले इतनी सुविधा और साधन नहीं थे लोगों के पास, फिर भी मेले को लेकर लोगों में अलग ही खुशी रहती थी। बहुत दूर-दूर से लोग पैदल ही मेला देखने आते थे। पहले के ज़माने में कुछ लोग तीतर नाम की चिड़िया भी पालते थे और उनका खेल दिखाने के लिए मेले में लाया करते थे। मेले में हिलडोलना नाम का झूला आता था, जो अपने ज़माने का बहुत मशहूर झूला हुआ करता था। महिलाएं, लड़कियों को उस झूले पर झूलने की बहुत खुशी मिलती थी।
जहाँ पर मेला लगता है, वहाँ पहले बहुत बड़ा मैदान हुआ करता था, जो अब काफी छोटा हो गया है। बुज़ुर्ग लोग कहते हैं कि यह मेला सौ-डेढ़ सौ साल से लग रहा है। मेले का अपना एक अलग ही वर्चस्व है। ऐसे मेले गाँव- देहात में बहुत असर रखते थे। कई लोग जो अपना हाथ से समान बनाते थे, वह मेले में बेच कर अपने परिवार के लिए अन्य समान खरीद लेते थे।
ग्रामीण मेले, संस्कृति, भाषा स्थानीय कला कौशल को तो संरक्षित करते ही थे साथ ही लोगों के एक-दूसरे से मिलने-बतियाने और संबंधों को मजबूत करने के अवसर भी थे।
स्थानीय कलाकारों को अपनी कला को प्रदर्शित करने और कलाकृतियों को बाज़ार मिलता था। स्थानीय स्तर पर मेलों का संरक्षण बहुत ज़रूरी है, जब तक ऐसे मेले, हाट-बाजारों का संरक्षण नहीं होगा तो स्थानीय ज्ञान कला-कौशल गायब होते जायेंगे और संस्कृति का भी नुकसान होता जायेगा।

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