अक्षवनी बैगा:
मैं जब 5 से 8 महीने के बीच था, तब मुझे मम्मी-पापा छोड़कर इधर-उधर घूमते रहे, क्योंकि शराब ने उन्हें डुबाकर रखा था। मुझे संभालने के लिए मेरी दीदीमा और चाचा लोग थे। कभी-कभी पापा मुझे देखने के लिए आ जाया करते थे, और मम्मी तो पापा को तलाक देकर मुझे छोड़कर चली गई थीं।
धीरे-धीरे मैं होशियार होने लगा और कुछ सालों बाद स्कूल में मुझे भर्ती करा दिया गया। मैं स्कूल जाने लगा, पर उतना ज़्यादा क्लास में फ़ोकस नहीं कर पाता था। ऊपर से कोई समझदारी वाला ज्ञान भी प्राप्त नहीं हो पा रहा था। फिर लगातार 1 सप्ताह तक मैंने आश्रम जाना शुरू किया। सात दिनों में फ़र्स्ट क्लास से पाँचवीं क्लास तक पढ़ने वाली सारी चीज़ें सीख गया।
तीसरी क्लास से लेकर बारहवीं क्लास तक मैं अपने जीवन में एक संघर्ष के मोड़ पर खड़ा रहा। मैं खुद कमाने लगा। उस समय पैसा, कपड़ा या कोई सहारा देने वाला भी नहीं था। बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
सातवीं क्लास में टीचर ने पूछा, “अक्षवनी, आप क्या बनना चाहते हैं?”
मैंने बोला, “सर, मैं टीचर बनना चाहता हूँ।”
पर एक दिन मुझे ऐसा ख़याल आया कि मैं एक ऐसा नागरिक बनूँगा, जो अपने समाज की सेवा कर सके। बचपन के समय, जब मैं 7-8 साल का हुआ, तो जंगल से मिलने वाली सारी चीज़ें इकट्ठा करके बेच देता था और उसी से अपनी ज़रूरत की सारी चीज़ें ले लेता था। जब शाम को घर आता था, तो घर के भी सारे काम करता था: बर्तन साफ़ करना, पानी लाना, खाना पकाना। चाचा-चाची के होते हुए भी सब काम खुद करना पड़ता था।
मैं बिना माता-पिता और बिना परिवार के बड़ा हुआ। पढ़-लिखकर होशियार हुआ तो धीरे-धीरे माता-पिता मेरे नज़दीक आने लगे। तभी मैंने ठान लिया था कि मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में आगे बढ़ना चाहता हूँ। आज अपने क्षेत्र में मेरा बहुत नाम चल रहा है और बहुत सारे लोग मुझे जानने लगे हैं।

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