मनीषा शहारे:

गर्मियों में और बरसात में धान की खेती होती है। पहले पारंपरिक तरीके से खेती की जाती थी। खेती करते समय धान के बीज मार्केट से खरीदते हैं और कुछ लोग घर के बीज इस्तेमाल करते हैं।

आजकल किसानों ने धान की खेती कम कर दी है। इसकी जगह मक्का की फसल लगाना शुरू किया है। क्योंकि धान की फसल के लिए बहुत पानी लगता है और मक्का की खेती कम पानी में हो जाती है। गाँव में किसानों ने बोरवेल करवाए, लेकिन लाइट ठीक से नहीं रहती, इसलिए पानी की कमी होती है और गर्मी के समय पूरे नाले सूख जाते हैं। कहीं पर भी पानी नहीं रहता, इसी कारण बोरवेल भी ठीक से काम नहीं करते हैं।

गर्मियों में खेती करने वाले ज़्यादातर किसान धान की खेती करते थे। बीच में ही खेती छोड़नी पड़ती थी, गाँव में पीने के पानी की कमी हो जाती थी। इसलिए किसान मक्का की खेती करने लगे हैं।

पहले किसान धान की खेती करते थे, लेकिन आज 90% किसान मक्का की खेती की तरफ मुड़ गए हैं। मक्का का वजन ज़्यादा होता है और इससे किसानों को ज़्यादा पैसे मिलते हैं।

समझो, धान की खेती की तुलना में मक्का की खेती में खर्च ज़्यादा आता है। रासायनिक खाद भी ज़्यादा लगती है। लेकिन खर्च निकलने के बाद मुनाफा ज़्यादा होता है, इसलिए बाजार में अच्छा भाव मिलता है। इसी वजह से किसान मक्का की खेती करने की सोच रहे हैं।

इन्हीं किसानों ने गर्मियों में मक्का की खेती की। खेती के लिए चार महीने मेहनत करनी पड़ती है। खेत की जमीन को अच्छे से तैयार करके महीने में मक्का की बुवाई करते हैं। फरवरी के महीने में मक्का के बीज खेत में डालते हैं। बुवाई के साथ ही खाद भी डालते हैं। मक्का उगने के बाद, बालियां आने पर फिर से खाद डालते हैं। और मक्का तैयार होने पर कटाई के महीने में मक्का काटते हैं और उसे इकट्ठा करते हैं।

मक्का तैयार होने के बाद गाँव-गाँव में मक्का खरीदने के लिए दलाल आते हैं। जिस भाव में दलाल मक्का की कीमत लगाते हैं, उसी भाव पर किसान मक्का बेच देते हैं। नहीं तो किसान 2-3 मंडियों में जाकर पूछताछ करते हैं और फिर मक्का बेचने की प्रक्रिया करते हैं।

किसान मेहनत करने के बाद भी खेत का माल दूसरों द्वारा तय किए गए भाव में बेचने को मजबूर होते हैं। किसान की मेहनत, महिलाओं की मेहनत और मक्का में लगने वाला खर्च ज़्यादा होते हैं। मुनाफा कम मिलता है, फिर भी किसान संतोष मान लेते हैं।

इस साल लगभग 90% लोगों को मक्का की खेती करते हुए देखा गया। खेत में मक्का की खेती खाने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ बिक्री के लिए की जाती है, ऐसा भी देखने को मिला। मक्का की फसल आने के बाद कुछ लोगों ने मंडी में भाव ज़्यादा होने की वजह से ऑनलाइन बेचने के लिए इंतजार किया। ऑनलाइन के लिए 1000 से 2000 रुपये खर्च करने के बाद भी किसानों को बिक्री में दिक्कत हो रही थी। और मक्का की फसल जल्दी खराब हो जाती है, इसलिए 8 से 10 दिन तक इंतजार करने के बाद आखिर में मक्का दलाल को ही बेचना पड़ा। इस तरह आज के किसानों के साथ धोखा हो रहा है, यह देखने को मिलता है।

गर्मियों में मक्का की खेती करने की वजह से गाँव में पीने के पानी की दिक्कत नहीं हुई। बारिश की खेती करते समय लोगों को धान के बीज बाजार से ही खरीदते देखा जाता है। सिर्फ कुछ ही लोग घर के बीज इस्तेमाल करते हैं। रोपाई करते समय धान के बीज का उपचार करना बहुत कम मात्रा में देखने को मिलता है।

धान की बुवाई से पहले बीज की पूजा भी की जाती थी। खेत में फसल अच्छी हो, काम करते समय किसी को कुछ न हो, ऐसी प्रार्थना और एक-दूसरे के लिए शुभकामनाएं देकर इसकी शुरुआत की जाती थी।

खेती पहले पारंपरिक तरीके से की जाती थी। पहले जब किसानों के खेत में रोपाई शुरू होती थी तो सारे खेत में काम करने वाले और रोपाई करने वाले लोगों को खाना दिया जाता था।

खासकर खाने में दाल, चावल, चना का उसळ और भोपळा सब्ज़ी देने का रिवाज था, लेकिन अब वह रिवाज देखने को नहीं मिलता। अब बरसात में रोपाई करते समय भी किसानों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

कृषि केंद्रों में रासायनिक खाद तय कीमत से ज़्यादा में मिलती है। ज़्यादा पैसे लेना और खाद उपलब्ध होने के बावजूद किसानों को खाद न देना, इस तरह किसानों के साथ धोखा किया जाता है।

खेत की निराई करना, खरपतवार निकालना, धान की रोपाई करना, ऐसे बहुत सारे खेतों के काम महिलाएं करती हैं। इस फसल में खाने के लिए बारीक अनाज का भंडार करती हैं और बिक्री के लिए बारीक और मोटे अनाज की खेती करती हैं। रोपाई पारंपरिक तरीके से की जाती है।

बहुत से खेतों में आज की युवा पीढ़ी काम करते हुए कम दिखाई देती है। गिने-चुने युवा ही खेती में रुचि लेते हैं। खेती में फायदा नहीं है, ऐसी युवाओं की सोच है। खाद, ढुलाई, बीज, खेती के लिए दवाई, इन सभी के दाम दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। कमाई कम है और धान की फसल का रेट भी कम है, जबकि खर्च ज़्यादा है, ऐसा युवाओं को लगता है।

लेकिन फिर भी लड़कियाँ रोपाई करने जाती हैं। रोपाई के समय महिलाएँ गाने गाती हैं और गाने गाते समय बाकी सभी महिलाएँ उनका साथ देती हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियाँ खेत में काम करते हुए ज़्यादा दिखाई देती हैं।

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  • मनीषा, महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह कष्टकारी जन आन्दोलन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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