हीरालाल लववंशी:

हमारे क्षेत्र में खरीफ की फसल पूर्णतः बारिश पर आधारित है। कई बार बारिश के अभाव में बीज ठीक से नहीं उग पाते हैं। इस वजह से पुनः बुवाई करनी पड़ती है। इससे फसल कमजोर होती है। मुख्यतः हमारे क्षेत्र में मक्का, सोयाबीन एवं मूंगफली की पैदावार की जाती है। यदि बारिश समय रहते होती रहे तो पैदावार अच्छी होती है। लेकिन अत्यधिक बारिश से कई बार फसल बरबाद भी हो जाती है।

जलवायु संकट की वजह से कृषि पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे कीड़ों की वृद्धि होती है एवं फसल पूर्ण रूप से चौपट हो जाती है।

हमारे क्षेत्र में आज के युवा खेती के बजाय अन्य कामों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। जैसे शहर में जाकर काम की तलाश करना या दिहाड़ी मजदूरी करना आदि। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में किसानों के पास कृषि भूमि के छोटे-छोटे खेत हैं।

खेती, विवाह और युवाओं की बदलती आकांक्षाएं

आज का युवा कृषिगत कार्यों से बहुत कम जुड़ना चाहता है। उसे हमेशा यह लगता है कि खेती में क्या मिलेगा? लेकिन पिछले 8-10 सालों में यह देखने को मिला है कि खेती के नए तरीकों से आय में वृद्धि हुई है। हमारे क्षेत्र के कुछ हिस्सों में लहसुन की खेती होने लगी है। यदि सब कुछ अच्छा रहे तो एक बीघा से 2 लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है।

बीज बोने से जुड़ी रीतियाँ, त्योहार और परम्पराएँ

हमारे क्षेत्र में अधिकतर बीज बाज़ार से लाए जाते हैं। क्योंकि जो बीज किसी जमाने में बचाकर रखने की परंपरा थी, वह खत्म हो चुकी है। अधिकतर “हाइब्रिड” बीजों का उपयोग किया जाने लगा है। बुवाई का कार्य ट्रैक्टर से ही किया जाता है। जब फसल पकती है तब खुशियाँ मनाई जाती हैं। साथ ही फसल पकने पर उसमें से कुछ अंश भूमिहीन लोगों को देने की परंपरा रही है।

खेती में महिलाओं की भूमिका, पहचान और अधिकार

कृषि की बात की जाए तो महिलाओं की भूमिका स्वतः ही सामने आ जाती है। खेत तैयार करने से लेकर फसल को घर लाने तक महिलाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। महिलाएँ समूह में कार्य करते समय गीत भी गाती हैं, जिससे काम के दौरान थकान का अहसास नहीं होता।

हँसी-मजाक के साथ कब दिन ढल जाता है, पता भी नहीं चलता।

आपके इलाके में पहले क्या बोया जाता था और अब क्या बोया जा रहा है

हमारे इलाके में हमेशा से वही फसलें बोई जाती रही हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में लोग लहसुन की पैदावार बड़ी तादाद में करने लगे हैं, क्योंकि इससे अच्छा रुपया मिल जाता है।

हमारे क्षेत्र में मुख्यतः सोयाबीन, मक्का, मूँगफली, तिल, मूँग, उड़द, चावल, चवला, गेहूँ, लहसुन, मटर, चना, सरसों, धनिया आदि की खेती की जाती है।

कुछ सालों से कुछ लोगों ने ऑर्गेनिक खेती भी शुरू की है और इसका परिणाम भी अच्छा आया है।

तेजाटेर गीत: हमारे क्षेत्र को हाड़ौती भी कहते हैं। जुताई एवं बुवाई करने से पहले “वीर तेजाजी” का स्मरण किया जाता है। इसे अच्छी बारिश एवं अच्छी फसल के लिए शुभ माना जाता है।

पंखिड़ा गीत: किसान खेतों में काम करते हुए यह गीत गाते हैं। इस गीत में किसान अलगोजा एवं मंजीरा बजाते हुए पक्षियों को संबोधित करते हैं।

लावणी गीत: हमारे क्षेत्र में जब किसान एक-दूसरे के खेतों में कटाई या निराई-गुड़ाई का काम करते हैं, तब सब लयबद्ध तरीके से इसे गाते हैं।

Author

  • हीरालाल, झिरी के राजस्थान ज़िले में रहते हैं। वह सन 2000 से क्षेत्र के हम किसान संगठन के साथ जुड़कर कार्य कर रहे हैं। साथ ही,झिरी गाँव में चलता आया मंथन स्कूल में हीरालाल जी शिक्षक के रूप में सक्रीय योगदान दिये हैं। वर्तमान में स्कूल नहीं चलाया जा रहा है पर हीरालाल जी संगठन के साथ उनके इलाके के ग्रामीण मुद्दों व समुदाय के आधिकारों के लिए काम कर रहे हैं।

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