जिनित सामाद:

“देश की माटी में रचा-बसा पसीना,
गांवों, शहरों की धूल में जीना,
खदानों की गहराई में खोए कई नाम,
फिर भी देश बनाते हैं ये अनगिनत इंसान।

कोयले की कालिख में काली हुई सुबह,
लौह अयस्क के बोझ तले झुकी हर एक दह,
निर्माण के ऊँचे मीनारों की ये कहानी,
हर ईंट पे लिखी है मज़दूर की निशानी।

किसी के हाथ में फावड़ा, किसी के कंधे पे भार,
कोई सड़क बना रहा, कोई गढ़ रहा संसार,
मनरेगा की कतारों में खड़ा है मज़दूर किसान,
काम की आस में देखता सरकारी आसमान।

पर हकीकत में कितनी अधूरी है ये तस्वीर,
कभी मज़दूरी अटकी, कभी टूटी तकदीर,
रजिस्टर में नाम, पर जेब में खालीपन,
क्या यही है श्रम का असली सम्मान?

महिला श्रमिक की कहानी और भी गहरी,
दोहरे बोझ तले उसकी जिंदगी ठहरी,
घर भी संभाले, मज़दूरी भी करे,
फिर भी बराबरी के हक़ से दूर ही रहे।

कानून कहते – समान वेतन, सुरक्षा, अधिकार,
पर ज़मीनी सच में क्यों है इतना अंधकार?
ठेकेदारी के जाल में फंसा हर एक हाथ,
पूंजी के खेल में बिखरते उसके जज़्बात।

पर अब चुप रहने का वक्त नहीं है,
ये संघर्ष कोई नया किस्सा नहीं है,
जब माटी के बेटे एक साथ खड़े होंगे,
तब अन्याय के किले भी खुद-ब-खुद गिरेंगे।

संगठन ही शक्ति, ये सच पहचानो,
एकता की लौ से अंधेरा मिटा डालो,
जब हाथ मिलेंगे, आवाज़ बनेगी तूफान,
तब बदलेगा श्रमिक का हर एक विधान।

न खदान रुकेगी, न कारखाना थमेगा,
पर अब श्रमिक बिना अधिकार नहीं जिएगा,
सम्मान, सुरक्षा और पूरा मेहनताना,
यही है अब हर श्रमिक का अफसाना।

आओ इस श्रमिक दिवस पर लें ये संकल्प,
नहीं सहेंगे अब शोषण का कोई विकल्प,
अपने हक़ की लड़ाई खुद ही लिखेंगे,
संगठन बनाकर नया सवेरा दिखेंगे।

क्योंकि-
ये माटी हमारी, ये श्रम हमारा,
नहीं रहेगा अब कोई हक़ अधूरा,
जब श्रमिक जागेगा अपने अधिकार के लिए,
तब ही सजेगा ये देश सच्चे विकास के लिए।

Author

  • जिनित / Jinit

    जिनित, ओडिशा के झारसुगड़ा ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह लोकमुक्ति संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading