मानुराम कुमेटी:
मैं अपने क्षेत्र में देखता हूँ कि अबूझमाड़ क्षेत्र के लोग अपने आप को बदलाव की ओर ले जाना चाहते हैं। मगर मजबूरी भी है और डर भी है कि अगर मैंने अपने अधिकारों के बारे में बोला तो मेरे साथ क्या होगा, और साथ देने वाला भी कोई नहीं है। हम गरीबी से निकलना चाहते हैं, मगर हमारे पास सही प्लेटफॉर्म नहीं है जहाँ हम अपनी खेती के अनाज, जंगल के वनोपज इत्यादि को सही जगह और सही दाम पर बेच सकें, ताकि हमें सही आमदनी हो सके।
अगर मैं बोलूँ कि मुझे नई चीज़ों के बारे में जानना है, कुछ सीखना है, तो कई बार सिखाने वाले ही हमें विपरीत विषयों में उलझा देते हैं। समाज की बात करेंगे तो हमें सिलेंडर का दाम बता दिया जाता है, लेकिन हमारे असल सवालों का जवाब नहीं मिलता।
सामाजिक परिवर्तन कार्यशाला में कुछ समाज से जुड़े मुद्दे जैसे ग्राम सभा, FIR, कानूनी जानकारियों के बारे में सिखाया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसी कार्यशालाओं के सारे शिविर पूरे करने में समय लगता है, और उस दौरान अगर सही जानकारी न हो तो हमारे अधिकार धीरे-धीरे हमसे छीने जा सकते हैं। सही जानकारी के अभाव में यह एक बड़ी समस्या बन जाती है।
कार्यशाला में बहुत अच्छी जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाता है, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है। और जिस तरह वहाँ सिखाया जाता है, मुझे लगता है कि उन सब विषयों पर प्रैक्टिकल भी गाँवों में जाकर करना चाहिए, ताकि हम भी सीखें और प्रशिक्षक भी समझ सकें कि जो सिखाया गया है, वह ज़मीन पर कैसे काम करता है। साथ ही गाँव के लोग भी उससे सीख सकें और उसका लाभ ले सकें।
जब मैं स्कूल में था, पढ़ाई कर रहा था, तब मुझे लगता था कि मैं पढ़-लिखकर नौकरी करूँगा और समाज में बदलाव लाऊँगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। कुछ कारणों से मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया और अब घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए समाज में बदलाव लाना चाहता हूँ। लेकिन कभी-कभी यह भी लगता है कि बदलाव कैसे करें, क्योंकि अपने हक और अधिकारों की सही जानकारी का अभाव है।
आज एक अधिकार को जान लेते हैं तो कल दूसरा नया सवाल खड़ा हो जाता है। इसलिए मुझे लगता है कि बदलाव के लिए सही और लगातार जानकारी होना बहुत ज़रूरी है।

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