मंजुलता मिरी:

देश में मज़दूर वर्ग हमेशा से कठिन परिस्थितियों में जीवन जीता आया है, लेकिन दलित और आदिवासी समुदाय के मज़दूरों की स्थिति और भी अधिक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण रही है। उनका जीवन केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि जल, जंगल और ज़मीन से गहराई से जुड़ा होता है। यही उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति का आधार है। लेकिन विकास के नाम पर खनन, उद्योग, बांध और बड़े प्रोजेक्ट्स के कारण इन्हें बार-बार अपने ही घर और संसाधनों से विस्थापित होना पड़ता है।

दलित और आदिवासी समुदाय का पलायन कोई एक समय की घटना नहीं है, बल्कि यह एक लगातार चलने वाली मजबूरी है। जब उनके जंगल काटे जाते हैं, ज़मीन अधिग्रहित की जाती है और पारंपरिक संसाधनों पर उनका अधिकार कमज़ोर किया जाता है, तब उनके सामने गाँव छोड़कर शहरों की ओर जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचता नहीं है। यह पलायन केवल रोज़गार की तलाश नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने की एक मजबूरी बन जाती है।

इस पूरे संघर्ष में सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ता है। महिला मज़दूरों का संघर्ष कई स्तरों पर होता है – चाहे वो आर्थिक, सामाजिक या शारीरिक हो। वे जहाँ भी जाती हैं, उन्हें असुरक्षा, भेदभाव और शोषण का सामना करना पड़ता है। नए स्थान पर उन्हें कम मज़दूरी, अस्थायी काम और कई बार हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। घरेलू काम, ईंट भट्टों, निर्माण कार्य और खेतों में मज़दूरी करते हुए वे लगातार संघर्ष करती रहती हैं। उनके पास न सुरक्षित रहने की व्यवस्था होती है, न ही कोई मजबूत सहारा।

महिला मज़दूरों को घर और बाहर दोनों ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ता है। दिनभर मज़दूरी करने के बाद भी उन्हें खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और परिवार की ज़िम्मेदारी निभानी होती है। कई बार उन्हें हिंसा, भेदभाव और असुरक्षा का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन उनकी आवाज़ को सुनने वाला कोई नहीं होता।

इसी असुरक्षा के बीच कई बार ऐसी घटनाएँ होती हैं जो उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल देती हैं। महासमुंद ज़िले के कुछ गाँवों से जुड़ी एक ऐसी ही सच्ची घटना सामने आई, जो इस कड़वी हकीकत को उजागर करती है। कोविड के समय शहरों से लौट रहे मज़दूरों में कुछ महिलाएँ और लड़कियाँ भी शामिल थीं। यात्रा के दौरान उन्हें रोडवेज बस से बीच रास्ते में उतार दिया गया था। वहाँ से गाँव तक जाने के लिए कोई साधन नहीं था। मजबूरी में वे एक अनजान जगह पर रात गुजारने को विवश हो गईं।

कुछ लोगों ने इंसानियत दिखाते हुए उन्हें अपने घर के बाहर रुकने दिया, लेकिन वहीं कुछ लोगों की गलत नज़र उन महिलाओं और लड़कियों पर थी। उन्होंने शर्त रखी कि अगर वे दो दिन तक उनके घर में काम करेंगी, तभी उन्हें रुकने दिया जाएगा, वरना वहाँ से जाने को कहा गया। मजबूरी में, बिना खाए-पिए, उन महिलाओं और लड़कियों ने काम करना शुरू कर दिया।

उसी दौरान एक लड़की के साथ बेहद दर्दनाक घटना हुई। रात करीब 10 बजे जब वह सो रही थी, दो लड़के उसे उठाकर खेत में ले गए और उसके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती की। लड़की रोती रही, मना करती रही, लेकिन उन लड़कों ने चाकू दिखाकर उसे जान से मारने की धमकी दी। डर के कारण वह चुप हो गई। पूरी रात वह खेत में पड़ी रही। सुबह जब वह नहीं मिली तो उसके माता-पिता उसे ढूंढने लगे। खेत में जाकर देखा तो वह बेहोश पड़ी थी। लोगों को लगा कि वह मर चुकी है। किसी तरह उसे कपड़े पहनाकर अस्पताल ले जाया गया। वह ज़िंदा थी, लेकिन पूरी तरह सदमे में चली गई थी।

लोगों ने उसके माता-पिता को पुलिस में रिपोर्ट करने की सलाह दी, लेकिन वे डर गए थे। वे मज़दूर थे, उनके पास न पैसे थे, न कोई सहारा था। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने आवाज़ उठाई तो उन्हें भी जान से मार दिया जाएगा। समाज के डर और असुरक्षा के कारण वे अपनी बेटी को लेकर चुपचाप घर लौट आए।

लड़की घर आने के बाद भी किसी से बात नहीं करती थी। वह पूरी तरह सदमे में थी। उसका व्यवहार बदल गया था। वह चुप रहती, डरी रहती और लोगों से दूरी बनाए रखती थी। कुछ समय बाद लड़की के माता-पिता को पता चला कि पिथौरा ब्लॉक में दलित आदिवासी मंच संगठन है, जहाँ उन्हें मदद मिल सकती है। वे वहाँ पहुँचे और अपनी पूरी कहानी साझा की। संगठन की कार्यकर्ता राजिम जी ने तुरंत पहल की और मुझे व चंद्रिका को उस परिवार के पास भेजा।

उन्होंने लड़की से धीरे-धीरे बातचीत शुरू की और उसकी काउंसलिंग हेतु उसे समझाया भी। शुरुआत में लड़की ने दो-चार दिन तक कुछ भी नहीं कहा, लेकिन धीरे-धीरे उसे विश्वास हुआ कि यहाँ उसकी बात सुनी जाएगी। तब उसने अपने साथ हुई घटना को बताना शुरू किया।

लेकिन यहाँ भी एक और बड़ी सामाजिक सच्चाई सामने आई। लड़की के माता-पिता ने कहा कि वे इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते, क्योंकि उन्हें डर था कि “अगर बात गाँव में फैल गई तो उनकी बेटी की शादी कैसे होगी।” यह डर और सामाजिक दबाव इतना गहरा था कि न्याय की आवाज़ भी दब गई।

पलायन कर मज़दूरी करने को विवश परिवारों में गहरा असर बच्चों पर भी पड़ता है। पलायन के कारण बच्चों की शिक्षा सबसे पहले प्रभावित होती है। जब परिवार एक जगह से दूसरी जगह जाता है, तो बच्चों का स्कूल छूट जाता है। नए स्थान पर उन्हें स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाता या वे भाषा और माहौल के कारण पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं। धीरे-धीरे कई बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और अपने परिवार के साथ मज़दूरी करने लगते हैं।

छोटे-छोटे बच्चे ईंट भट्टों, खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करने लगते हैं। यह न केवल उनके बचपन को छीन लेता है, बल्कि उनके भविष्य को भी अंधकार में डाल देता है। लड़कियों की स्थिति और भी ज़्यादा खराब होती है, उन्हें घर के कामों में लगा दिया जाता है या जल्दी शादी कर दी जाती है, जिससे उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता का रास्ता बंद हो जाता है।

दलित और आदिवासी समुदाय के लिए यह पलायन केवल भौगोलिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उनके जीवन के पूरे ढांचे को तोड़ देता है। वे अपने जल, जंगल और ज़मीन से दूर हो जाते हैं, अपनी संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन से कट जाते हैं। शहरों में उन्हें पहचान, अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

दलित और आदिवासी समुदाय का पलायन एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है, जिसे केवल रोजगार के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यह उनके अधिकार, पहचान और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है।

ज़रूरत है कि जल, जंगल और ज़मीन पर उनके अधिकारों को मजबूत किया जाए, उन्हें उनके ही संसाधनों पर नियंत्रण दिया जाए और गाँवों में ही स्थायी आजीविका के अवसर विकसित किए जाएँ। महिला मज़दूरों के श्रम को पहचान और सम्मान मिले, उनकी सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ, और बच्चों की शिक्षा को हर हाल में जारी रखने के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।

तभी हम एक ऐसा समाज बना पाएंगे जहाँ किसी को भी अपने ही घर और ज़मीन को छोड़कर मजबूरी में पलायन न करना पड़े।

Author

  • मंजुलता मिरी / Manjulata Miri

    मंजुलता, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में मंजु, दलित आदिवासी मंच के साथ जुड़कर जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading