संजीव कुमार:

सहरिया जनजाति, जो PVTG की सूची में शामिल है, यह देश की अत्यंत पिछड़ी जनजातियों में से एक है, जहाँ आज भी सरकार की विकास योजनाएँ जैसे शिक्षा, बुनियादी सुविधाएँ, घर, पानी, सड़क आदि पूरी तरह नहीं पहुँच पाई हैं। यह जनजाति शहरों से दूर, एकांत और जंगलों के इलाकों में रहती है। अपना गुज़ारा करने के लिए यह लोग ज्यादातर मज़दूरी, दूसरों के खेतों में काम या जंगल से लकड़ी लाकर बेचने पर निर्भर रहते हैं। इस जनजाति की एक खासियत यह है कि यह आज भी अपनी संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। अपनी पारंपरिक परंपराओं, जीवन-शैली और रीति-रिवाज़ों से इस मजबूत जुड़ाव के कारण सहरिया समुदाय की एक अलग पहचान बनती है, जो इसे अन्य सभी जनजातियों से विशिष्ट बनाती है।

आज हम इस जनजाति की एक महत्वपूर्ण परंपरा को समझते हैं, जो बच्चे के जन्म से जुड़ी हुई है। यह कहानी राजा आदिवासी की है, जिसके घर एक बच्चे का जन्म हुआ।

राजा जी बताते हैं कि बच्चे के जन्म से लगभग 6–7 महीने पहले एक विशेष पूजा की जाती है, जो उनकी कुलदेवी को समर्पित होती है। यह बच्चे के जन्म से जुड़ी प्रारंभिक पूजा मानी जाती है। इस पूजा के माध्यम से परिवार अपनी देवी से जच्चा (माँ) और बच्चा दोनों की कुशलता, शांति और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करता है।

वे बताते हैं कि पहले जब उनके यहाँ बच्चा होता था, तो ज़्यादातर प्रसव घर पर ही समुदाय की अनुभवी महिलाओं द्वारा कराया जाता था। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही थी, लेकिन समय के साथ इसमें काफी बदलाव आया है। आजकल अधिकांश प्रसव अस्पतालों में होते हैं, लेकिन कई बार सरकारी व्यवस्थाओं की कमियाँ साफ दिखाई देती हैं जैसे समय पर बस्ती में एम्बुलेंस का न पहुँच पाना या खराब सड़कों की वजह से एम्बुलेंस का बस्ती के भीतर तक न आ पाना। इन समस्याओं के कारण आज भी कई जगह बच्चों का जन्म घर पर ही हो जाता है, बिना किसी चिकित्सीय सुविधा और बिना उचित देखभाल के। यह स्थिति माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।

बच्चा होने के बाद एक पुरानी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें बच्चे को सूप की टोकरी में नरम कपड़ा रखकर लिटाया जाता है और घर के सभी सदस्य मिलकर उसे झुलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से बच्चे पर आई सभी बुरी बलाएँ खत्म हो जाती हैं, वह हमेशा खुश रहता है और जीवन में उन्नति करता है। यह परंपरा अक्सर पहले बच्चे के जन्म पर, विशेषकर लड़के होने पर की जाती है। इसके पीछे यह धारणा होती है कि लड़का वंश की जिम्मेदारियों को संभालेगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा और कुल का नाम रोशन करेगा।

घाट की पूजा एक महत्वपूर्ण प्रथा है, जिसमें बच्चे के जन्म के 15 दिन तक माँ घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाती है। उनका मानना है कि यदि माँ बच्चे को छोड़कर चली जाती है, तो बच्चे को नज़र लग सकती है। इसीलिए माँ बच्चे के साथ रहकर उसकी रक्षा करती है। 15 दिन बाद, लड़की के मायके से भाई-भाभी आते हैं, और वे बच्चे और परिवार के लिए कपड़े लेकर आते हैं।

लड़की और उसके भाई सुबह पूजा की थाली में 7 प्रकार के मांगलिक सामान लेकर तैयार होते हैं। सहरिया रिवाज के अनुसार जल ही जीवन का देवता है और पहली पूर्ण प्रथा जल देवता को अर्पित होती है। यह दोनों किसी नदी के घाट या हैंडपंप पर जाकर एक प्रकार की परंपरा निभाते हैं, जिसमें भाई और बहन द्वारा लाए गए कलश में सात बार पानी भरा जाता है और बहन यह पानी सातों बार फैलाती है। आठवीं बार भरा पानी बहन अपने सिर पर रखकर घर ले जाती है।

इसके बाद, बहन की ननद (पति की बहन) लड़की और लड़की के भाई को घर के अंदर आने से रोकती है, जिसे ‘रुकाई’ कहा जाता है। इस रस्म के दौरान, लड़की का भाई रस्म के तौर पर कुछ भेंट या कपड़े देता है। इस प्रकार यह रस्म समाप्त हो जाती है। यह प्रथा न केवल बच्चे की सुरक्षा के लिए है, बल्कि यह परिवार और रिश्तों को भी मजबूत बनाती है।

मंगवार की प्रथा एक ऐसी प्रथा है जिसमें बच्चे के जन्म की खुशी को एक खेल की तरह मनाया जाता है। जब बच्चे के जन्म से एक वर्ष हो जाता है, तो लड़की का भाई अपने मायके से आता है। वह आम की पत्तियों की माला और दो गन्ने लेकर आता है। यह माला लड़की के ससुराल के गेट पर लटकाई जाती है। लड़की झाड़ू लेकर आती है और उसके दो देवर गन्नों के ऊपर आम की माला को उठाते हैं। लड़की झाड़ू से उस माला को छूने की कोशिश करती है। जब वह सफल होती है, तो यह रस्म खत्म हो जाती है। इस रस्म को मनाने का उद्देश्य घर में खुशियाँ, अच्छाइयाँ और उन्नति लाना माना जाता है।

पक्ष प्रथा सहरिया समुदाय की एक पारंपरिक रिवाज़ है, जिसमें बच्चे के जन्म के लगभग डेढ़ साल बाद लड़की के मायके वाले उसके ससुराल आते हैं। वे ससुराल पक्ष के सभी सदस्यों के लिए कपड़े, घर में उपयोग होने वाला आवश्यक सामान और बच्चे के लिए झूला लेकर आते हैं। इस प्रथा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब तक लड़की के मायके से यह ‘पक्ष’ नहीं आ जाता, तब तक लड़की के पक्ष के मायके या रिश्तेदार लड़की के ससुराल में खाना-पीना नहीं करते। यह परंपरा अधिकतर परिवारों में पहले बच्चे के जन्म पर ही निभाई जाती है और दोनों परिवारों के बीच सम्मान, संबंध और सामाजिक मर्यादा का प्रतीक मानी जाती है।

इन सभी परंपराओं से स्पष्ट है कि सहरिया आदिवासी समुदाय आज भी अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज़ और अपने पारंपरिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। बच्चे के जन्म से लेकर उसके दो वर्ष पूरे होने तक की मुख्य परंपराएँ सूप की प्रथा, घाट की पूजा, मंगवार और पक्ष ये प्रथाएँ न केवल बच्चे की सुरक्षा और कल्याण का प्रतीक हैं, बल्कि परिवार, मायका और ससुराल के रिश्तों को भी गहराई से जोड़ती हैं।

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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