अमित राजावत:
नोट: नीचे दिया गया लेख लेखक द्वारा अपने शैक्षणिक भ्रमण एवं सोशल मीडिया ट्रेनिंग कार्यशाला (संभावना इंस्टीट्यूट, पालमपुर, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश) के अनुभवों पर आधारित रिपोर्ट के रूप में लिखा गया है; हमने केवल शीर्षक जोड़ा है।
मैं लंबे समय से यह सोचता रहा हूँ कि समाज में मौजूद गैर-बराबरी, अन्याय, शोषण कब और कैसे समाप्त होंगे। मेरा रुझान पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों की तरफ ज़्यादा है, मैं अपने इन्हीं कामों से मौजूदा समाज और दुनिया में सकारात्मक बदलाव का हिमायती हूँ। लाल प्रकाश राही जी से मेरी मुलाकात पिछले दिसंबर में हिन्दी भवन में एक कार्यक्रम के दौरान हुई, मैं उस दिन से ही राही जी के कामों और विचारों से प्रभावित हूँ।
दुनिया, समाज बदलने की इनकी कोशिश ने मुझे भी इस तरह के कामों को करने के लिए प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि इन कामों के साथ बहुत गहराई तक जोड़ा है। मैं अपने पत्रकारिता और सामाजिक कामों से दुनिया-जहान को ख़ूबसूरत बनाने की कोशिश करता रहूँगा, इसकी शुरुआत उसी दिन से हो गई जिस दिन मैं राही जी से मिला। साथी लाल प्रकाश राही जी के प्रोत्साहन और मार्गदर्शन में मुझे सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के लिए बेहतर काम कैसे किए जाएँ, इस पर एक कार्यशाला से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ।
यह कार्यशाला संभावना इंस्टीट्यूट के द्वारा 6 से 10 मार्च को पालमपुर संभावना संस्था में होनी थी। मैंने राही जी के सहयोग और मार्गदर्शन से कार्यशाला की सारी रिक्वायरमेंट पूरी कर ली थी। मैं जीवन में पहली बार इतनी लंबी यात्रा पर जाने के लिए उत्साहित था। लेकिन उसी दौरान मेरी दादी माँ की तबीयत बहुत ख़राब हो गई। मुझे लगा कि पहली लंबी यात्रा और कुछ अच्छा सीखने का अवसर खो दूँगा। लेकिन मेरी बहन के आ जाने से मुझे अपनी यात्रा पर जाने का अवसर बन गया।
4 मार्च को मेरी पहली लंबी यात्रा जौनपुर से शुरू हुई। यह पहली यात्रा थी, जो ठीक होली के दिन मैं अपना घर, गाँव, शहर और अपने लोगों को छोड़कर हज़ारों किलोमीटर दूर जा रहा था, जहाँ अपना कोई नहीं था। बस मेरे साथ कुछ था तो वह दुनिया, समाज के लिए कुछ कर गुज़रने की असीम चाहत और मेरा आत्मविश्वास, साथ में राही सर का मार्गदर्शन और उनके द्वारा कुछ अलग कर गुज़रने के लिए दी गई हिम्मत और प्रेरणा, जो मुझे अपने से दूर लिए जा रही थी। मैं रात के 8 बजे जौनपुर अपने घर से निकलकर रात 12 बजे वाराणसी कैंट पहुँचा, जहाँ से अगले रात को 1 बजे मेरी ट्रेन थी। मैं वाराणसी से पठानकोट के लिए अपना सफर शुरू कर चुका था।
आगे पालमपुर तक का सफर बस से करना था। मैं उत्तर प्रदेश की सीमा पार भी नहीं किया था कि मेरी दादी माँ के मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चले जाने की खबर फोन से मिली। मैं सन्न रह गया। वह दादी माँ, जिन्हें मैं कुछ घंटों पहले अपने हाथों से खाना खिलाया था और जल्द ही लौट आने का वादा करके घर से निकला था। वह दादी माँ, जिन्होंने मुझे बचपन से पाला था और अपनी उँगली पकड़कर चलना सिखाया था, वह हमेशा के लिए हमसे दूर जा चुकी थीं। मैंने अपने मन को कसकर दबाया और अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ गया।
मेरी ट्रेन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों से होते हुए हरियाणा और पंजाब के विशाल मैदानों को चीरते हुए पठानकोट की तरफ बढ़ती जा रही थी। यह मेरे अब तक के जीवन की पहली सुखद और ख़ूबसूरत यात्रा थी, साथ ही दादी के गुज़र जाने की कसक भी थी। पंजाब में गेहूँ की फसल पक रही थी, दूर-दूर तक गेहूँ, सरसों और गन्ने की फसलों को देखकर मन खुशी से झूम रहा था। मैं सुबह 11 बजे तक पठानकोट पहुँच गया था और वहाँ से पालमपुर के लिए बस ली। हमारी बस धीरे-धीरे पहाड़ों की ओर बढ़ती गई, वैसे-वैसे प्रकृति का सौंदर्य और निखरता गया। हरे-भरे पेड़, बहती नदियाँ, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घुमावदार सड़कें सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था। एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरफ खड़े पहाड़ों के बीच से गुजरती बस में थोड़ा डर भी लग रहा था, लेकिन उस डर में भी एक अलग ही रोमांच था।
आखिरकार मैं कांवड़ी गाँव पहुँचा, जहाँ संभावना संस्थान है। यहाँ का माहौल बेहद शांत और सुकून भरा था। गाँव के लोग बहुत सरल और दिल के साफ थे। यहाँ के घर बाँस, मिट्टी और लकड़ी से बने हुए हैं, जो यह बताते हैं कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और प्रकृति से जुड़ी हुई हैं। लेकिन भोग-विलासिता की चाहत ने यहाँ भी कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं।
सुबह के समय पहाड़ों की ठंडी हवा, साफ पानी और दूर-दूर तक फैली हरियाली मन को एक अलग ही शांति देती है। यहाँ चाय के बागान भी बहुत हैं, जो पालमपुर की पहचान हैं। इसके साथ ही कई प्रकार के फलदार दरख़्त भी यहाँ उगाए जाते हैं। यहाँ का जीवन अनुशासित है सुबह 7 से 8 बजे नाश्ता, 12 से 1 बजे लंच और शाम 7 से 8 बजे रात का खाना। सबसे खास बात यह थी कि यहाँ हर काम समय पर होता था और हर व्यक्ति अपने काम के प्रति समर्पित था।
इस यात्रा के दौरान पत्रकारिता की कार्यशाला ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी। चुनाव में एक सीट पर 10 पुरुष और सिर्फ एक महिला उम्मीदवार का होना यह असमानता अपने आप में एक बड़ा सवाल है। यह भी समझ आया कि चुनाव के समय एक पत्रकार को सच दिखाने के लिए कितना कुछ सहना पड़ता है दबाव, खतरे और जिम्मेदारियों के बीच भी उसे निष्पक्ष बने रहना सबसे बड़ी चुनौती होती है। आज के दौर में मोबाइल पत्रकारिता की ज़रूरत इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि जिन खबरों को बड़ी मीडिया नहीं दिखा पाती, उन्हें अब आम लोग अपने मोबाइल से दुनिया के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले लोगों तक पहुँचा रहे हैं।
बदलती तकनीक के साथ पत्रकारों को AI से जुड़ना ज़रूरी है, ताकि वे खबर को तेजी और सटीकता के साथ प्रस्तुत कर सकें। साथ ही यह जिम्मेदारी भी है कि किसी भी खबर से किसी धर्म या जाति की भावना आहत न हो और हर जानकारी संवैधानिक मूल्यों के तहत और पत्रकारिता के दायरे में रहकर दी जाए।
इस कार्यशाला में कई अनुभवी लोगों ने हमें मार्गदर्शन दिया, जिनमें नविन कुमार, आर्टिकल 19, शम्भू सिंह (नेशनल दस्तक) और मीना केटावाल शामिल रहे। इसके साथ ही फातिमा जी (मैनेजमेंट) और मोहम्मद मीरा ने भी हमें बहुत कुछ सिखाया। इस कार्यशाला से पत्रकारिता में इस्तेमाल होने वाले कई टूल हमें सिखाए गए, विशेषकर कंटेंट बनाना, कंटेंट कहाँ से और कैसे लेना है, उसका इस्तेमाल कैसे करना है। जनपक्षीय पत्रकारिता किसे कहते हैं और पीत पत्रकारिता (फेक पत्रकारिता) किसे कहते हैं, खबरों का विश्लेषण कैसे करते हैं, ग्रासरूट की पत्रकारिता के मापदंड क्या होते हैं जैसे मुद्दों पर विस्तार से प्रशिक्षण मिला, जो मेरे लिए पत्रकारिता की नज़र से भी और समाज के लिए कुछ बेहतर करने की नज़र से भी बहुत महत्वपूर्ण है।
इस दौरान मुझे देश के अलग-अलग हिस्सों से आए नए दोस्त भी मिले हरियाणा से मनीष, अंबाला से रज़ाक अली, पटना से विकास और पीयूष, ऋषिकेश से नीरज, उड़ीसा से रूपक और महाराष्ट्र से स्वागता, अतिश और सुनील। हम सब अलग-अलग जगहों से थे, लेकिन इस यात्रा ने हमें एक परिवार की तरह जोड़ दिया।
यहाँ की रसोई में काम करने वाले लोग भी बेहद खास थे। वे सभी को अपने बच्चों की तरह प्यार करते थे और हमेशा स्नेह से खाना खिलाते थे। इस यात्रा ने मेरे जीवन को एक महत्वपूर्ण सीख दी। इसने मुझे प्रकृति, समाज और पत्रकारिता तीनों को समझने का मौका दिया।
“यह सफर सिर्फ जौनपुर से हिमाचल तक का नहीं था, बल्कि एक ऐसी सीख का सफर था जिसने मुझे एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार पत्रकार बनने की राह दिखाई।”




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