भरत भट्ट:
दूर कहीं एक दीपक जल रहा था,
मेरे जेहन में तुम्हारा ख्याल पल रहा था,
तुम्हें सोचते सोचते रात इतनी गहरी हो गई,
इस कस्बे को छोड़कर गई तुम और शहरी हो गई,
तभी अल्हड़ सा मुझे एक ख्याल आया,
शायद कहीं दूर तुम्हें मेरा ख़्वाब आया।।
इसी ख़्याल में एक अश्क गिर आया आंख से,
तुम मानो न मानो, बस गई हो तुम मेरी सांस में,
अब तुम बड़ी हो गई हो, ये खबर है मुझे
तुम ज़रूर लौटोगी मेरी जां ये सब्र है मुझे,
पर शायद अब तुम किसी और की चाहत हो जाओगी। I
जब भी चलेंगी हवाएँ अपने एहसास से मुझे पास पाओगी।।
क्या तुम मेरे सिवा कभी चाहोगी किसी को,
या लौटोगी फिर से सिर्फ और सिर्फ़ मेरी होने को?
तुम सोच रही होगी – क्या हो गया है मुझे आज,
देखो, तुम्हें सोचकर बदल गया मौसम का अंदाज़,
इस अंदाज़ ने खुद में मुझको ऐसा ढाल लिया,
मैं हँसते, रोते, जागते, सोते- सिर्फ़ तेरा नाम लिया।।
खामोशियां ने अब करवट बदल ली है,
इसकी जगह अब तुम्हारी चाहत ने ले ली है।।
पर ये दिल अभी पूरी तरह से तन्हा है,
इसे मोहब्बत हुई तुमसे बेपनाह है।।
तभी एक भयानक सवाल उठ गया मेरे मन में,
लग गई दावानल पूरे कनान में,
मैं…
तुम सिर्फ मुझे प्यार करती हो,
जान – नहीं, मेरी ज़िंदगी में कोई और है,
तब जाकर मेरा ये बदमस्त ख़्वाब टूट सा गया,
जैसे सैलाब में सारा शहर डूब सा गया
पर मौसम अबके मधुमास का था।।
दरख़तो पर नई लहर, बागों में फुलवारी थी,
मौसम तो खुशमिजाज हो गया था,
उदासी से उभरने की अब मेरी बारी थी।।
पर एक कांटा अब थी दर्द कर रहा था
शायद अभी भी मुझसे कुछ कह रहा था
तभी एकाएक तुम्हारा दीदार हो गया
जैसे सुखा रेगिस्तान फ़िर से आबाद हो गया।।
उस गुल्फ़ाम से चेहरे के सहारे मैंने सारा जहां जीत लिया
इसी मंज़र में मैने सबको अलविदा कह दिया !!

Leave a Reply