रानी:
मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले की घाटीगाँव पंचायत के पुल का पूरा क्षेत्र में बसे आदिवासी समुदाय की ज़िंदगी आज भी संघर्ष और अभाव से भरी हुई है। यहाँ के ज़्यादातर परिवारों के पास अपनी ज़मीन नहीं है। जिनके पास है भी, वह आधे से भी कम लोगों को मिल पाती है। रोज़गार की कमी, पानी की लगातार तंगी और शिक्षा से दूर होते बच्चे – यही सब इस बस्ती की सच्चाई को साफ़ दिखा देता है।
इस पूरे इलाके में तकरीबन 2000 लोगों के लिए सिर्फ़ पाँच हैंडपंप और दो कुएँ ही पानी के सहारे थे। समय बीतता गया और हैंडपंप एक-एक कर खराब होते गए। पानी की समस्या इतनी बढ़ गई कि लोगों के पास कुएँ ही अकेला विकल्प बचा। पंचायत ने बाद में पानी की टंकी बनवाई, लेकिन उससे भी महीने में बस तीन-चार दिन ही पानी मिलता था।
परेशानी में पड़े आदिवासी परिवारों को दूसरे समाज – जैसे गुज्जर और चमार – के बोरवेल से पानी खरीदना पड़ता था। इसके लिए उन्हें हर महीने 200 रुपये देना पड़ता। गर्मियों में जब बोरवेलों में पानी कम होता, तो वहाँ से भी पानी देना बंद कर दिया जाता। कुछ लोगों ने टैंकरों से पानी बेचने का काम शुरू किया, लेकिन हर परिवार पानी खरीदने की क्षमता नहीं रखता था। इसलिए पानी की किल्त आज भी वैसे ही बनी हुई है।
ज़मीन न होने की वजह से ज़्यादातर आदिवासी परिवार काम की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन करते हैं। कई परिवार ईंट भट्टों पर ईंट छापने और पकाने का काम करते हैं। कुछ लोग आलू बीनने या खेतों में बाजरा, धान, सरसों और गेहूँ की कटाई में मजदूरी करते हैं। रोज़ी-रोटी का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि परिवारों को अपने छोटे बच्चों को भी साथ ले जाना पड़ता है। इसी वजह से बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।
कई बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड या पहचान से जुड़े दस्तावेज़ ही नहीं बने होते। ऐसे में उनका स्कूल में नामांकन रुक जाता है या आगे की पढ़ाई नहीं हो पाती। जिन परिवारों के पास ज़मीन है और जो रोज़गार के लिए बाहर नहीं जाते, उनके बच्चे कभी–कभी पढ़ पाते हैं। लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर कमजोर होने, और कोचिंग जैसी सुविधाएँ न ले पाने के कारण अक्सर बच्चे फेल हो जाते हैं और पढ़ाई छोड़ देते हैं।
पानी, रोज़गार और शिक्षा – ये तीनों ही मुद्दे आज भी यहाँ के लोगों के जीवन को सीधा प्रभावित कर रहे हैं। लोग हैंडपंप के सुधरने का इंतज़ार कर रहे हैं, टंकी से नियमित पानी मिलने की उम्मीद लगाए हुए हैं, और बच्चों के दस्तावेज़ बनवाने व उन्हें पढ़ाई तक पहुँचाने की कोशिश में लगे हुए हैं।
यह कहानी सिर्फ़ घाटीगाँव पंचायत के पुल का पूरा की नहीं है – यह उन हजारों आदिवासी बस्तियों की आवाज़ है जहाँ विकास दरवाज़े तक तो पहुँचा है, लेकिन अंदर आने में अब भी बहुत देर लगा रहा है।

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