आशा मीणा:
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले में एक छोटा-सा गाँव है, जिसका नाम है गणपत खेड़ा। यह गाँव एक पहाड़ी पर बसा हुआ है। यहाँ भील जनजाति के लोग रहते हैं। गाँव में लगभग 25-30 घर हैं, जिनमें से सिर्फ़ 3 ही पक्के घर हैं। बाकी परिवार बहुत ही खराब आर्थिक हालत में अपना जीवन चला रहे हैं। कई परिवारों को आज तक अपने घरों के पट्टे भी नहीं मिले हैं।
गाँव में आने-जाने का कोई ठीक साधन नहीं है। ज़्यादातर बच्चों के आधार कार्ड और दूसरे ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं बने हैं, जिसके कारण वे स्कूल में दाखिला भी नहीं ले पाते। दस्तावेज़ न होने से उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिलता। कुल मिलाकर, गाँव आज भी बहुत पिछड़ा हुआ है।
गाँव वालों को समय-समय पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जब कोई बीमार पड़ जाता है और पास के स्वास्थ्य केंद्र में इलाज के लिए जाता है, तो अक्सर डॉक्टर ठीक से बात तक नहीं करते। बिना ठीक से जाँच किए, दूर से ही दवा देकर उन्हें वापस भेज देते हैं।
गाँव के लोग कमजोर हैं और कई तरह की बीमारियों से परेशान रहते हैं। सरकार की ओर से उन्हें लगभग कोई सुविधा नहीं मिलती। पेयजल की टंकी तक नहीं थी; यह सुविधा भी एक संगठन द्वारा बनाई गई। गर्मियों में पानी की बहुत ज़्यादा दिक्कत होती है। रोज़ी-रोटी के लिए गाँव के ज़्यादातर लोग मनरेगा में मज़दूरी करते हैं।
गाँव में केवल पाँचवीं कक्षा तक का एक छोटा स्कूल है। आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को लगभग तीन किलोमीटर दूर दूसरे गाँव तक पैदल जाना पड़ता है। पूरे गाँव में केवल तीन लड़कियाँ ही आगे पढ़ रही हैं। यहाँ पर अक्सर लड़कियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। छोटी उम्र में गर्भधारण की वजह से लड़कियाँ कमजोर हो जाती हैं और कई बार उनके बच्चे भी कुपोषित पैदा होते हैं।
गाँव में आज भी लोगों को शिक्षा का मूल्य समझ नहीं आता। पढ़ाई न होने के कारण, सरकारी योजनाओं और जरूरी जानकारी तक उनकी पहुँच बहुत कम है।
गणपत खेड़ा गाँव आज भी बुनियादी सुविधाओं और अधिकारों से काफी दूर है, और यहाँ के लोगों का जीवन अभी भी बहुत संघर्षपूर्ण है।

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