कंचन उइके:
मेरा नाम कंचन उइके है। मैं छिंदवाड़ा ज़िले की तहसील चौरई के ग्राम झुमकी की रहने वाली हूँ। अभी मैं ग्रेजुएशन कर रही हूँ।
हमारे परिवार में कुल पाँच लोग हैं। 2018 में पिताजी का निधन हो गया था, और उसी साल से हमारी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। समय के साथ सबने हमारा साथ छोड़ दिया। माँ ने अकेले ही हमारे घर और हम तीनों बहनों की ज़िम्मेदारी उठाई। छोटी उम्र से ही हमें हर काम करना सीखना पड़ा। इसके साथ-साथ लोगों के ताने भी सुनने पड़े कि हम बिन बाप की बेटियाँ हैं।
माँ ने मेहनत करके घर चलाया और हमें पाल-पोसकर बड़ा किया। लेकिन गाँव में कुछ लोग हमें अलग-अलग तरीकों से तंग करते थे – कभी गंदी नज़र से देखते, कभी गलत बातें कहते। पापा खेती करते थे, लेकिन घर में कोई भाई न होने की वजह से हमें खेती ठेके और बटई पर देनी पड़ी।
इसी बीच एक बार एक आदमी ने मेरे साथ बदतमीजी करने की कोशिश की। उसने गंदी हरकतें कीं, गंदी बातें कही – लेकिन वो अपने इरादों में सफल नहीं हो पाया। जब मैंने इसका विरोध किया तो उसकी पत्नी ने मुझे ही गलत ठहरा दिया। वह कहने लगी कि उसके पति ने ऐसा कुछ नहीं किया, और अगर किया है तो बताओ कैसे किया। सबने मुझे ही झूठा कहना शुरू कर दिया।
उस समय सबसे बड़ी तकलीफ़ मुझे इस बात की लगी कि माँ ने भी मेरी बात पर यकीन नहीं किया। वो भी लोगों की बातों पर भरोसा कर लेती थीं। इसी बात को लेकर मेरा घर में बहुत झगड़ा हुआ। मैं गाँव में रहना नहीं चाहती थी। इसी कारण मैं इंदौर अपनी दीदी के पास रहने चली गई।
मैंने 16 साल की उम्र से ही अलग-अलग कंपनियों में काम किया और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। जीवन में इतने संघर्षों का सामना किया कि मुझे समझ आ गया था – इस दुनिया में अपने अलावा कोई नहीं होता।
समय के साथ माँ को भी समझ आने लगा कि कौन सही है और कौन गलत। आखिरकार उस आदमी को सज़ा मिली, और मुझे इस बात से बहुत सुकून मिला कि मेरे साथ न्याय हुआ।
एक लड़की होकर मैंने बहुत करीब से देखा है कि लड़कियों की ज़िंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितनी लोग समझ लेते हैं। आज मेरी माँ मुझे बहुत समझती हैं – कई बार बिना बोले ही मेरी बात जान जाती हैं। यही मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत है।

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