जंग हिन्दुस्तानी:
शिवालिक की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरे जंगल में सदियों से रहने वाले वन गुज्जर परिवारों के बच्चे किताबों को दूर से ही पहचानते थे। उनके लिए जंगल ही जीवन था – पेड़ों की छांव, जानवरों की आहट और नदी का संगीत ही उनका विद्यालय था। लेकिन समय बदल रहा था।
वन गुज्जर समाज के बुजुर्गों का मानना था कि अब बच्चों को अक्षर–ज्ञान मिलना चाहिए। गाँव से आने वाले यूनियन के कार्यकर्ताओं ने उनकी यह इच्छा सुनी और मिलकर झोंपड़ी में एक छोटा-सा स्कूल खोल दिया। रोज़ सुबह दरी पर बैठकर बच्चे “क, ख, ग” सीखते और दोपहर में फिर बकरियाँ चराने चले जाते। उनके चेहरों पर एक नए उजाले की चमक थी।
लेकिन यह खबर जल्द ही जंगल चौकी तक पहुँच गई। वन विभाग के अफसरों ने कहा – “जंगल पढ़ाई के लिए नहीं है, तुम सबको यहाँ से जाना होगा। यह ज़मीन सरकार की है, यहाँ स्कूल बनाना मना है।” अधिकारी जब-तब झोंपड़ी के स्कूल को तोड़ देने की धमकी देते।
बच्चों के मासूम चेहरे डर और उत्सुकता के बीच फंसे रहते। वे सोचते – “क्या जंगल छोड़कर हम शहर चले जाएंगे? और अगर गए तो हमारी बकरियाँ, हमारा दूध बेचने का काम, हमारी पहचान कहाँ जाएगी?”
यूनियन के कार्यकर्ताओं ने सरकार से अपील की कि वन गुज्जर को उनके वन अधिकार दिए जाएँ। लेकिन सरकारी दफ्तरों में फाइलें अलमारी में धूल खाती रहीं। अफसर सिर्फ यही कहते – “मामला विचाराधीन है।”
एक दिन गाँव की मीटिंग हुई। उन छोटे-छोटे बच्चों ने भी बोलने की हिम्मत दिखाई। एक लड़की बोली – “अगर जंगल हमारा घर है, तो स्कूल हमारी नई दुनिया है। हम घर भी चाहेंगे और स्कूल भी। कोई हमें यह कहकर न निकाले कि पढ़ाई सिर्फ शहर वालों के लिए है।”
उसकी आवाज़ सुनकर सबकी आँखें भर आईं। बुजुर्गों ने कहा-
“हम न जंगल छोड़ेंगे, न शिक्षा। अगर झोंपड़ी टूटेगी तो हम नई झोंपड़ी बनाएँगे। जितनी बार रोका जाएगा, उतनी बार बैठकर पढ़ेंगे। हमारा संघर्ष पढ़ाई सेलड़ाई तक चलेगा।”
धीरे-धीरे यह संघर्ष एक आंदोलन का रूप लेने लगा। अख़बारों में भी खबरें छपने लगीं “जंगल में झोंपड़ी स्कूल, जहाँ शिक्षा बन रही है वनगुज्जर बच्चों की ताकत।”
वन गुज्जरों का यह स्कूल सरकार और विभाग की आँखों में चुभता जरूर था, मगर बच्चों की चमकती आँखों में भविष्य का सपना और भी साफ़ दिखाई देने लगा। जंगल की हवा में अब सिर्फ पत्तों की सरसराहट नहीं, बच्चों की मासूम कविताएँ और पढ़ाई की आवाज़ भी गूंजने लगी।
(कहानी काल्पनिक है)

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