राजू राम:

यह घर के बाहर रखा कप क्या कहता है मेरे घर के बारे में? हम इंसानों के बारे में? इंसानियत के सपनों के बारे में? हमारे अपनो के बारे में? क्या कहता है तुम्हारे बारे में? न्याय की इस लड़ाई के अन्याय के बारे में? क्या कहता है इस समाज के बारे में? कानून के बारे में?  समाज के इस सामाजिक न्याय के बारे में?

वो अभी भी घर के बाहर खड़ा घर में आने का इंतज़ार कर रहा है। घर की शादी में शामिल होना चाहता है। लेकिन सोचता है कि काश वो भी इस उत्सव में शामिल हो सके। वो भी एक सामान्य कप की तरह अपनो से हाथ मिलाना चाहता है। उसे भी तलब है कि घर के इस खुशी के माहौल में शामिल होना है।

इस कप में अभी कोई जान नहीं बची की वो इस जाति रूपी आंधी से सीधा लड़ जाए। कभी-कभी हिम्मत जुटा भी लेता है तो पास में रखी थाली बोल उठती है ज़्यादा हीरो बनने की ज़रूरत नहीं है। मैं स्टील की हूँ, मैंने कई बार आवाज़ उठाने की कोशिश की, लेकिन हर बार मुझे ही हार का सामना करना पड़ा। यह सुन कर कप फिर से शांत होकर बैठ जाता है।

शायद वो सोचता है कि इन इंसानों में अब न्याय की कोई उम्मीद नहीं है। इसी उम्मीद के सहारे एक दिन जब तेज़ आंधी आती है, तो वह गिरकर टूट जाता है, बिखर जाता है। उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं और उसको वहाँ से उठाकर फेंक दिया जाता है। कप जिससे से बना है, आखिरकार उसी में मिल जाता है।

अगले दिन सुबह उसी जगह फिर के नया कप रख दिया जाता है और वो इसी उम्मीद में वहाँ घर के बाहर की छोटी सी अलमारी में सोचता होगा कि कोई किसी दिन घर के अंदर से बाहर आएगा और उसे घर में बुला लेगा। यही उम्मीद उस कप को जिंदा रखती है। 

यह घर के बाहर का कप मुझे, मेरा एक हिस्सा लगता है, जिसे समाज ने ठुकरा दिया है। इस कप में हर एक दलित का चेहरा नज़र आता है। लगता है किसी ने ठुकरा कर फेंक दिया है। और अपनी किस्मत के भरोसे मरने के लिए छोड़ दिया है।

जब कोई अजनबी आकर उठाता है, तो अपनापन लगता है। 

लेकिन इस अपनेपन से बेगाना हूँ।

Author

  • राजू राम / Raju Ram

    राजू ,राजस्थान के जोधपुर ज़िले से हैं और व्हाई.पी.पी.एल.ई. (YPPLE) के तौर पर सामाजिक न्याय केंद्र के साथ जुड़े हैं। वर्तमान में राजू मध्य प्रदेश में जेनिथ सोसायटी फॉर सोशियो लीगल एम्पावरमेंट संगठन के साथ कार्य कर रहे हैं। वह बास्केटबॉल खेलना एवं किताबें पढ़ना पसंद करते हैं।

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