आस्था राज:

हमारी धरती नदियों के आंचल से ही सींची और संवरी है। भारत की नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और जीवन की आत्मा हैं। इन्हीं में से एक है तमसा नदी, जो अपने शांत प्रवाह, पौराणिक महत्व और लोककथाओं के कारण आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है। तमसा नदी प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी अपनी अलग पहचान रखती है। तमसा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के कैमूर पर्वत के तमसाकुंड से होकर यहाँ तक आती है। अपने प्रवाह क्षेत्र में यह गाँवों और कस्बों की जीवनरेखा है, जो अपनी शांत जल धाराओं का विस्तार करती है। यह हमारी नदी बहुत नामचिन नहीं है पर इसके साथ बसे लोगों के लिए बहुत महत्व रखती है। खेती-बाड़ी, पशुपालन और लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतें इसी पर आधारित हैं।

तमसा नदी से जुड़ी अनेक रोचक लोककथाएँ प्रचलित हैं।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब श्रीराम जी अयोध्या से वनवास के लिए निकले, तो नगरवासियों ने उनका पीछा किया। राम जी ने तमसा किनारे विश्राम किया और रात्रि में गुपचुप आगे बढ़ गए। सुबह जब लोग जागे तो उन्हें लगा कि राम जी वहीं हैं, लेकिन वे जा चुके थे। इस घटना ने तमसा को “वियोग की नदी” बना दिया।

दूसरी लोककथा के अनुसार, कभी तमसा का जल इतना निर्मल और मीठा था कि लोग इसे “अमृत धारा” कहते थे। ग्रामीण मानते थे कि इस नदी का जल, जीवन में प्यास और अभाव को दूर कर देता है।

तमसा केवल आस्था की धारा ही नहीं, बल्कि किसानों के जीवन की आधारशिला भी है। इसके पानी से किसान अपने खेतों की सिचाई कर गेहूँ, धान, अरहर, चना और विभिन्न तरह की सब्जियों की भरपूर खेती करते हैं।

लोक गीतों में किसान गाते हैं –

“तमसा के पानी से खेत हरियाए, जीवन में सुख-समृद्धि आए।”

आज तमसा नदी भी बदलते समय की चुनौतियों से अछूती नहीं है। बढ़ता प्रदूषण और जलस्तर में कमी इसकी धारा को कमज़ोर कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण जहाँ नदी के समीप शुद्ध वातावरण होता था, अभी बहुत बदलाव हैं। आज के दिन जैसा मौसम इस नदी के पास होता था, वैसे अभी नहीं है।

भदरसा, एक नगर पंचायत है जो की तमसा नदी के किनारे फैज़ाबाद, अयोध्या मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। भदरसा नगर पंचायत के विस्तार में पिपरी गाँव भी शहरी क्षेत्र में शामिल हो गया है लेकिन यह गाँव पूरी तरह से खेती-किसानी करने वालों और मेहनत मज़दूरी करने वालों का ही गाँव है।

हमारे साथ जुड़ी सभी लड़कियाँ खेती-किसानी करने वालों घरों से जुड़ी हैं और जो खुद खेतों में जाकर काम करती हैं। यह लड़कियाँ इस समय धान की निराई, गुड़ाई करने के साथ-साथ विभिन्न तरह की सब्जियों की भी फसल को उगाती है और उनकी देखरेख करती है।

अंशिका बताती हैं की हमको खेत में जाकर सब्ज़ी तोड़नी है और वह सब्ज़ी सुबह पापा मार्केट में लेकर जाएंगे या मंडी में गाड़ी से जाएगी। हमारे पूरे गाँव के सभी लोग पढ़ाई, मज़दूरी जो भी काम करें, पर सबको खेत में काम करना ही होता है

धान के साथ-साथ …

  1. गोभी  – 2 महीना
  2. पलक –  1 महीना
  3. सोया मेथी 1 से 2 महीना
  4. मूली – 1 महीना
  5. लोबिया – 45 दिन
  6. खीरा – 45 दिन
  7. परवल – 2 महीना
  8. करेला – 1 से 2 महीना

अभी जो खेती हो रही है वह सब हाइब्रिड बीजों से ही हो रही है। हमारे पास अभी देशी बीजों का कोई ज्ञान-कौशल नहीं है। पुराने लोग हो सकता है कि इस बारे में जानते हो लेकिन वह भी अब  रखते नहीं हैं।

रिद्धि बताती है तमसा नदी के किनारे है जो नदी से पानी लेकर सिंचाई करने का काम करते हैं। एक छोटा-मोटर नदी में लगाते हैं, जिससे नदी के पानी से वे अपने खेतों को सींचते है। लड़कियों ने यह भी बताया कि हमारे घर वाले बताते हैं कि पहले तमसा नदी में बहुत पानी आता था, यह नदी जो मध्य प्रदेश से निकलती है और आगे अंबेडकर नगर तक जाती है। इसके आसपास जो भी गाँव हैं, वह प्राकृतिक तौर पर खेती-किसानी के लिहाज से बहुत समृद्ध है। यह छोटी सी नदी जो आज एक नाले की तरह बह रही है, उसमें पानी बहुत कम है लेकिन एक समय में यह नदी काफी बड़ी थी। इसमें पानी था और इसके आसपास बड़ी तादाद में नदी से जुड़कर जीवन जीने वाली जो सभ्यता है वह विकसित हुई। हमारे साथ जो ज़्यादातर लड़कियाँ जुड़ी थी, वह अधिकांश लड़कियाँ खेती से जुड़े व्यवसाय करने वाले परिवारों से थी यही कारण है कि पिपरी गाँव के निवासियों का तमसा नदी के प्रति प्रेम व लगाव सदियों के पश्चात भी कम नहीं हुआ।

विकास की अंधी दौड़ में औधोगीकरण की मार झेल रही तमसा नदी दिन ब दिन शहर के तथाकथित विकास के नमूने केमिकल्स बिना किसी रोक-टोक, सीधे नदी में छोड़े जा रहे हैं। इनका कोई ट्रीटमेंट प्लान नहीं है। जिससे अधिकांश जगह पर नदी या तो बहुत दूषित हो गई है या सुख ही गई है।

शहरी विकास की आड़ में हमने दिल्ली में यमुना को और लखनऊ में गोमती को नाला बनते देखा है, तमसा भी उसी राह पर है।

यदि इसे बचाने की ठोस कोशिश नहीं की गई, तो यह धारा केवल किताबों और कहानियों तक सीमित होकर रह जाएगी। जैसे दिल्ली में एक हिंडन नदी होती थी, आज वहाँ अधिकांश लोगों को इस नदी के बारे में पता ही नहीं है। जिनको पता है, उन्होंने उसको देखा नहीं है, पढ़ा और सुना है।

जब अयोध्या की बात होती है तो सरयू नदी का नाम जन-जन की जुबान पर रटा हुआ है। पर वर्षों से अपने आप में एक इतिहास समेटे शांत जलधाराओं के साथ बहने वाली तमसा का अस्तित्व समाप्त होते जा रहा है।

नदी केवल जलधारा नहीं होती, बल्कि अपने साथ इतिहास और लोकजीवन की अनमोल धरोहर होती हैं। इसके बहते पानी में हमारी संस्कृति की आत्मा बसी है, इसलिए ज़रूरी है कि हम सब मिलकर इसे संरक्षित करें। नदी की ज़मीन पर बसे जंगल, पेड़ों को संरक्षित किया जाए। इसके तट पर बसे लोगों का जीवन खुशहाल हो। जो जलवायु परिवर्तन संकट हमारे सामने आया है, उससे निपटने के लिए इस नदी या इसके जैसी विलुप्त होती नदियों को पुनः नदी स्वरूप में लाना चाहिए। जिससे नदियों के तट पर बसे लोगों का जीवन तो खुशहाल हो ही, उसके साथ हमारी पृथ्वी पर बने संकट भी दूर हों।

Author

  • आस्था राज, भदरसा, अयोध्या की रहने वाली हैं। उन्होंने सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर किया है। वर्तमान में आस्था, अवध पीपुल्स फोरम के साथ एक फील्ड फैसिलिटेटर के रूप में काम कर रही हैं। साथ ही वे भदरसा क्षेत्र में, प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र का संचालन भी कर रही हैं। यह किशोरियों के साथ नज़रिया, नेतृत्व व कौशल निर्माण पर काम कर रही हैं।

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