डॉ पूरन जोशी :

किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा को सही ढंग से समझने से पूर्व यह आवश्यक है कि हम ‘आपदा’ शब्द के अर्थ और उसके निहितार्थ को भलीभाँति समझें। ‘आपदा’ का सामान्य अर्थ है संकट या विपत्ति। अंग्रेज़ी भाषा में इसके लिए प्रयुक्त शब्द Disaster है। यह शब्द फ्रांसीसी भाषा के Desastre से उत्पन्न हुआ है। Desastre का निर्माण दो फ्रांसीसी शब्दों des (अर्थात् बुरा) और astre (अर्थात् तारा) से हुआ है। प्राचीन समय में जब मानव का वैज्ञानिक ज्ञान सीमित था, तब यह धारणा प्रचलित थी कि विपत्तियाँ अथवा प्राकृतिक आपदाएँ अशुभ ग्रह-नक्षत्रों अथवा बुरे तारों के प्रभाव से घटित होती हैं।

किन्तु आधुनिक काल में आपदा का अर्थ इससे कहीं अधिक वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से परिभाषित किया गया है। आज आपदा को ऐसी घटना के रूप में समझा जाता है जो मानव-जीवन, संपत्ति और समाज के बुनियादी ढाँचे – जैसे संचार व्यवस्था, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएँ, ऊर्जा आपूर्ति और सामाजिक तंत्र – को गंभीर रूप से बाधित कर देती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आपदा की स्थिति में स्थानीय संसाधन पर्याप्त नहीं रहते और बाहरी या अतिरिक्त सहायता की आवश्याकता पड़ती है।

उदाहरण के लिए – यदि घर की रसोई में बिल्ली आकर दूध का बर्तन गिरा दे, तो यह केवल एक क्षणिक असुविधा है। लेकिन यदि निरंतर वर्षा से गाँव की मुख्य सड़क कटकर बह जाए और आवागमन बाधित हो जाए, तो यह ऐसी स्थिति है जिसे आपदा कहा जाएगा, क्योंकि इसका प्रभाव व्यापक है और इससे निपटने हेतु बाहरी संसाधनों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि आपदा वह स्थिति है जो सामाजिक-आर्थिक संरचना को अस्त-व्यस्त कर देती है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुसार – “आपदा वह स्थिति है जो प्राकृतिक अथवा मानव-जनित कारणों से उत्पन्न होती है और जिसके परिणामस्वरूप किसी क्षेत्र में गंभीर रूप से विनाश, दुर्घटना अथवा असाधारण घटना घटित होती है।”

खतरा (Hazard) और आपदा (Disaster) का भेद

अक्सर Hazard (खतरा) और Disaster (आपदा) शब्दों का परस्पर प्रयोग किया जाता है, जबकि वास्तव में दोनों के बीच गहरा अंतर है। खतरा एक संभावित स्थिति है, जो यदि संवेदनशील मानवीय या सामाजिक तंत्र से टकरा जाए तो आपदा में परिवर्तित हो जाती है।

उदाहरण के तौर पर यदि कोई चक्रवात निर्जन तटीय क्षेत्र से टकराए, तो उसे केवल खतरा कहा जाएगा क्योंकि वहाँ मानव जीवन और संपत्ति प्रभावित नहीं हो रही। परंतु वही चक्रवात यदि घनी आबादी वाले क्षेत्र से टकराए और वहाँ जन-धन की हानि हो, तो वह आपदा कहलाएगा। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि –

  • खतरा एक संभावित प्राकृतिक घटना है।
  • आपदा उस खतरे का प्रत्यक्ष प्रभाव है, जो जीवन और समाज को क्षति पहुँचाता है।

विभिन्न प्रकार के खतरे जैसे भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, चक्रवात, हिमस्खलन और ज्वालामुखी विस्फोट तब आपदा का रूप लेते हैं जब वे मानवीय जीवन, संपत्ति और आजीविका को प्रभावित करते हैं।

भारत में आपदाओं का स्वरूप

भारत भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत विविधतापूर्ण देश है। यह विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है, जहाँ लगभग सभी प्रकार की जलवायु परिस्थितियाँ और भौगोलिक विशेषताएँ पाई जाती हैं। फलस्वरूप भारत विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है।

  • उत्तर भारत में हिमालयी पर्वत श्रृंखला भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के लिए संवेदनशील है।
  • पूर्वी और पश्चिमी तटीय क्षेत्र चक्रवात और सुनामी जैसी आपदाओं से प्रभावित होते हैं।
  • पश्चिमी भारत का शुष्क भाग सूखा और अनावृष्टि से पीड़ित रहता है।
  • मध्य भारत और गंगा का मैदान बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या झेलता है।

इस प्रकार संपूर्ण देश किसी न किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा से प्रभावित रहता है और कोई भी क्षेत्र पूर्णतः सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।

उत्तराखण्ड का आपदा परिदृश्य

उत्तराखण्ड, जो कि हिमालयी क्षेत्र का अभिन्न अंग है, आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील राज्य है। यहाँ बार-बार भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, जंगलों की आग और अचानक आने वाली बाढ़ें जान-माल की व्यापक क्षति करती रही हैं।

  • 1991 का उत्तरकाशी भूकंप
  • 1998 का मालपा भूस्खलन
  • 1999 का चमोली भूकंप
  • 2009 का लाझेंकला भूस्खलन (पिथौरागढ़)
  • 2013 की केदारनाथ त्रासदी
  • 2021 की अतिवृष्टि
  • 2025 की धराली आपदा 

ये सभी उदाहरण उत्तराखण्ड की भौगोलिक संरचना और संवेदनशीलता को स्पष्ट करते हैं।

हिमालय एक युवा वलित पर्वत है और भूगर्भीय दृष्टि से निरंतर सक्रिय है। यहाँ की विवर्तनिक हलचलें लगातार पर्वत निर्माण और भूकंपीय गतिविधियों को जन्म देती रहती हैं। यही कारण है कि उत्तराखण्ड भूकंप और भूस्खलन जैसी घटनाओं के लिए अत्यधिक संवेदनशील है।

मानव हस्तक्षेप और आपदा की तीव्रता

उत्तराखण्ड में अनियोजित विकास गतिविधियों ने आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को और बढ़ा दिया है।

  • पहाड़ों को काटकर सड़कों और सुरंगों का निर्माण
  • ढलानों पर भारी भवनों का निर्माण
  • बिना भू-वैज्ञानिक परीक्षण के आधारभूत ढाँचों का विकास

इन सभी ने भूस्खलन की घटनाओं को तीव्र किया है। मानसून के दिनों में अक्सर राजमार्ग और संपर्क मार्ग कई-कई दिनों तक अवरुद्ध रहते हैं, जिससे न केवल आर्थिक हानि होती है बल्कि लोगों का जीवन भी संकटग्रस्त हो जाता है।

भूस्खलन का एक और प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है। असमय और अत्यधिक वर्षा, जिसे अतिवृष्टि कहा जाता है, अब सामान्य होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन ने अनावृष्टि और सूखे की घटनाओं को भी बढ़ाया है, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर गहरा असर पड़ा है।

जलवायु परिवर्तन और हिमालयी संकट

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव हिमालयी क्षेत्र पर देखा जा रहा है।

  • ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि ने वैश्विक तापमान को बढ़ा दिया है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है।
  • समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय शहरों के जलमग्न होने का खतरा बढ़ गया है।
  • हिमालयी ग्लेशियर लगातार पिघलकर पीछे हट रहे हैं।

उत्तराखण्ड पर्यावरण प्रतिवेदन के अनुसार –

  • पिंडारी ग्लेशियर प्रतिवर्ष लगभग 23 मीटर की दर से पीछे हट रहा है।
  • गंगोत्री ग्लेशियर लगभग 19 मीटर प्रतिवर्ष की दर से।
  • मिलम ग्लेशियर लगभग 12 मीटर प्रतिवर्ष की दर से।

इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हिमालयी नदियों के जलप्रवाह, कृषि प्रणाली और जल संसाधनों पर पड़ रहा है।

निष्कर्ष

स्पष्ट है कि आपदाएँ और मानव जीवन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, किन्तु उनकी तीव्रता और प्रभाव को कम किया जा सकता है। भूकंप स्वयं लोगों की जान नहीं लेते, बल्कि कमजोर निर्माण और असुरक्षित ढाँचे ही जनहानि का कारण बनते हैं।

हिमालय, जिसे “पृथ्वी का जल-भंडार” कहा जाता है, केवल उत्तराखण्ड ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए जीवनदायिनी है। यदि इसका संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में आपदाओं का खतरा और भी गंभीर होगा। अतः आवश्यक है कि विकास योजनाएँ भूगर्भीय संरचना और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई जाएँ। जब हिमालय सुरक्षित रहेगा, तभी धरती और मानव सभ्यता सुरक्षित रह पाएगी।

Author

  • डॉ. पूरन जोशी / Dr Pooran Joshi

    डॉ. पूरन जोशी सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के भूगोल विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं। वह भूगोल के क्षेत्र में अपने ज्ञान और अनुभव को छात्रों के साथ साझा करते हैं और उन्हें इस विषय में गहराई से समझने में मदद करते हैं।

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