दीपा मेहरा :
बचपन में दादाजी से जोशीमठ और औली की कहानियाँ सुनकर मन में एक अनोखा उल्लास और जिज्ञासा जागता था। मन करता था कि जाकर देखूं कि पहाड़ कितने ऊँचे हो सकते हैं और वहाँ लोगों का जीवन कैसा होगा। अलकनंदा नदी और जोशीमठ के पहाड़ों के बारे में जानने की जिज्ञासा मन में हमेशा बनी रहती थी। दादाजी ने वहाँ बिताए अपने पांच सालों की बातें बताईं, जिन्हें हम बड़े उत्साह और जिज्ञासा से सुनते थे। सोचते थे कि बड़े होकर कभी वहाँ ज़रूर जाएंगे।
आज जब वहाँ जाने का मौका मिला, तो मन उल्लसित हो उठा और प्रसन्नता से भर गया। जिस जगह के बारे में बचपन में इतना सुना था, आज वहाँ खड़ी होकर मैं अपने बचपन के उस उल्लास को महसूस कर रही थी। हालांकि, आज के जोशीमठ और औली में बहुत बदलाव आ चुके हैं, जो मुझे महसूस हो रहा है। प्रकृति की सुंदरता और खूबसूरती अभी भी वही है, पहाड़, नदी सब कुछ अभी भी अपनी पूरी शोभा में है। हालांकि, पिछले साल जोशीमठ में आई आपदा ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। औली पहुँच कर मैं बचपन में दादाजी से सुनी गई कहानियों को महसूस कर रही थी। आज सब कुछ मेरी आँखों के सामने था। प्रकृति की सुंदरता में मैं इतना रम गई मानो बचपन से आज का दिन एक सपने की तरह हो। जोशीमठ और औली की पहाड़ियों की खूबसूरती सचमुच स्वर्ग समान लगती है। वहाँ के लोगों के जीवन को देखकर लगता है कि कठिनाइयों के बावजूद भी उन्होनें अपने आप को प्रकृति के साथ जोड़कर रखा है और बड़ी सजगता से परिश्रम करते हैं। जोशीमठ शहर के निवासी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाने जाते हैं और उनका जीवन पर्यटन, कृषि और धार्मिक गतिविधियों पर निर्भर है। हिमालय की गोद में बसे इस शहर को प्रकृति की अनुपम लीलाओं, दृश्यों के साथ देखना, महसूस करना, व गहराइयों से देखना, जानना, मेरे लिए एक नया व सुकून भरा एहसास था।
जोशीमठ के पहाड़ दिन में ऐसे दिखते हैं मानो सफेद चादर से ढके हों। पहाड़ों में अलग अलग आकर देखो तो उनमें कहीं सफेद बर्फ तो कहीं नदियों द्वारा बनाए गए रस्ते हैं। परिश्रम की एक अनूठी मिसाल को दर्शा रहे हो, ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से निकलती जल की पतली-पतली धाराएं एक अलग ही दृश्य प्रकट कर रही थी। इन सब दृश्यों को देखना मेरे लिए एक स्वपन सा प्रतीत हो रहा था क्योंकि बचपन में दादाजी के द्वारा बताई गई बातों को, आज सब हकीकत में देखना मेरे लिए एक नया एहसास सा बन गया था। पहाड़ों पर ढकी बर्फ सूर्य की किरणों में चमक कर उसकी शोभा और अधिक बढ़ा रही थी। अक्सर दादा जी हाथी पर्वत का ज़िक्र करते थे। मुझे लगता था हाथी जैसा कैसा होता होगा, जब वह अब सामने था तो लगा कि कोई हाथी ही खड़ा है जो रास्ता भटक गया हो और आकर यहाँ बस गया हो। जोशीमठ अपनी प्राचीन मान्यताओं व धार्मिक महत्वत्ता के लिए जाना जाता हैं।
जोशीमठ से औली झील तक का ट्रेक एक नया एहसास करा रहा था, जो हिमालय की चोटियों के शानदार दृश्य प्रकट कर रहा था। ऊँचे पर्वत, बुग्याल, व बीच में झील जो शंकु नुमा पेड़ों (ओक) से घिरे एक मनोरम दृश्य प्रकट कर रहे थे,जो मानो एक अलग सा सुकून दे रहे हों। बुग्यालों में उग रही छोटी-छोटी घास को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था की यह पशुओं के मन में एक नई आशा जगा रही हो, जो महीनों से बर्फ़ के पिघलने के इंतज़ार में थे और अब घास के उग जाने से उछल उठे हों। औली के मैदान जो चारों तरफ से पहाड़ों व शंकुधारी वनों से घिरे हैं एक अलग सा अनुभव देते हैं। इन दृश्यों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह जगह धरती पर स्वर्ग समान है।
यह ट्रेक मेरे लिए एक बेहतरीन और नया अनुभव था, जो मेरे बचपन की कहानियों का हिस्सा था। अब मैं उसे अपने सामने अनुभव कर रही थी। हिमालय की गोद में बसा जोशीमठ और औली की खूबसूरती सचमुच स्वर्ग समान है।

Leave a Reply