गुफरान:
भोजन वो चीज़ जिसे गरीब आदमी खाता है, नेता खाते हैं (पर मतलब कुछ और होता है), और संयुक्त राज्य अमेरिका उसे ‘commodity’ कहता है। भारत में कहावत है ‘भूखे पेट भजन न होय गोपाला’, पर वॉशिंगटन की दीवारों पर लिखा है “भूखा पेट WTO की मंजूरी से ही भर सकता है।”
अब साहब बात कुछ यूँ है कि 2001 में संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव लाया कि “भोजन एक मानव अधिकार है”। जैसे ही ये बात अमेरिका को पता चली, वो बोला “क्या? भोजन अधिकार है? वो तो हमारे यहाँ कार्पोरेट बेचते हैं! इसे अगर अधिकार मान लेंगे तो लोग McDonald’s को Fundamental Duty समझने लगेंगे।”
मोटा-तगड़ा अमेरिका, जिसकी हर साँस डॉलर में चलती है, उसने सीधा कह दिया — “No sir! Food is not a right. It is a business.” और फिर वो WTO के फ्रिज से कोल्ड ड्रिंक निकाल कर पी गया।
कॉमोडिटी बनाम कॉन्स्टिट्यूशन –
अब आप ही बताइए जब गरीब देश भूख के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, तब सुपरपावर कहता है: “भूख तुम्हारी प्रॉब्लम है, हमारा प्रॉफिट है।”
वो ये नहीं देखता कि कोई बच्चा आटा माँग रहा है या कोई माँ छाती का दूध न उतरने से रो रही है। वो बस देखता है कि grains (अनाज) की कीमत कौन तय करेगा गरीब की भूख या Chicago की stock exchange।
2004 में फिर से UN में प्रस्ताव आया। अमेरिका फिर से बोला “हम माफ नहीं करेंगे, ये तो trade barrier है।” इधर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश सब बोले “अरे भइया, भूख barrier नहीं है, मौत है।” पर अमेरिका को भूख नहीं दिखती, उसे सिर्फ agriculture subsidies और copyright दिखाई देता है।
2021 में अमेरिका को अकेलापन खलने लगा –
2021 में फिर से UN ने वही प्रस्ताव दोहराया। इस बार अमेरिका को लगा, अकेले विरोध करते-करते कहीं लोग उसे गांधीवादी न समझ बैठें। तो वो एक अवैध बसाई गई कॉलोनी को साथ ले आया। अब भूख के खिलाफ प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने वाले दो देश हो गए – एक वैध और दूसरा अवैध। एक जो दुनिया को लोकतंत्र सिखाता है, और दूसरा जो फलस्तीन में भूखे बच्चों पर बम गिराता है। यानी एक ने पेट पर ज्ञान मारा, दूसरे ने पेट पर मिसाइल।
संविधान के साथ भोजन की गफलत –
भाई, हमारे संविधान में भी बहुत सारी चीज़ें “directive principles” में हैं मतलब सरकार कहती है “हम दिल से चाहेंगे, अगर फुर्सत मिली तो लागू भी कर देंगे।” पर अमेरिका तो इस भीड़ में शामिल ही नहीं होता। वो साफ कहता है — “हम ICESCR को साइन नहीं करेंगे। हमारे यहाँ भूख है, लेकिन अधिकार नहीं।”
अब कोई पूछे “भाई, जब पेट खाली हो तो कौन-सी आज़ादी काम आती है?” तो अमेरिका कहता है — “Burger is freedom. Pepsi is liberty. Hunger is your fault.”
संयुक्त राष्ट्र का भूखा प्रस्ताव –
संयुक्त राष्ट्र भी क्या करे? वह हर बार प्रस्ताव लाता है, हर बार अमेरिका टोक देता है। फिर भी UN प्रस्ताव लाता है कुछ ऐसे जैसे मुहब्बत में धोखा खाया आशिक बार-बार फूल लेकर दरवाज़े पर चला जाए।
संयुक्त राष्ट्र: “भोजन मानव अधिकार है।”
अमेरिका: “नहीं, यह market-driven उत्पाद है।”
UN: “पर भारत, अफ्रीका, लेटिन अमेरिका भूखे हैं।”
अमेरिका: “तो Amazon से order कर लो।”
निष्कर्ष जो पेट से निकला –
अब बताइए जब अमेरिका भूख को अधिकार नहीं मानता, और पेट को व्यापार कहता है, तो फिर लोकतंत्र, आज़ादी, मानवाधिकार ये सब क्या हैं? कहीं ये भी Amazon Prime सब्सक्रिप्शन तो नहीं?
हमने कभी सोचा था कि भूख पर भी वोटिंग होगी, पर अब लगता है आने वाले कल में “हवा को अधिकार मानना है या नहीं” इस पर भी बहस होगी। और अमेरिका तब कहेगा: Oxygen is a commodity. We export it in cans. Human right? No sir. That’s socialism.
ऐसे ही एक पुरानी रिपोर्ट पढ़ते-पढ़ते ख्याल आया कि आप तक इस बात को पहुँचा दिया जाय।

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