ख़ीमा जेठी:
उत्तराखंड की सबसे कम जनसंख्या वाली जनजाति ‘राजी जनजाति’ है। यह जनजा
ति एक अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए है। राजी जनजाति पिथौरागढ़ ज़िले के तीन विकास खंडों — धारचूला, कनालीछीना और डीडीहाट — के 9 गाँवों में निवास करती है। राजी जनजाति को ‘‘वनरौत’’ और ‘‘जंगल का राजा’’ भी कहा जाता है। यह जनजातीय समूह मुख्यतः सीमावर्ती वन क्षेत्रों में पाया जाता है। यह जनजाति अपनी विशिष्ट भाषा, वेशभूषा, त्योहारों और रहन-सहन के लिए जानी जाती है।
राजी जनजाति विशेष रूप से उत्तराखंड के खड़ी पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है और जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही है। पिथौरागढ़ ज़िले की डीडीहाट तहसील के अंतर्गत नेपाल से सटे भू-भाग में, पुराने अस्कोट तालुका में, राजी या वनराजी नाम से एक आदिम मानव समूह निवास करता है। अस्कोट तालुका, जो कत्यूरी शासकों के वंशजों से संबंधित है, की ऐतिहासिकता 12वीं सदी के उत्तरार्ध से प्रमाणित मानी जाती है। अस्कोट और पश्चिमी नेपाल के बीच बहने वाली काली (शारदा) नदी दोनों को विभाजित करती है। अस्कोट तालुका की जलधारा दो लघु नदियों — चर्मा और रौतिस — के बीच का क्षेत्र राजी जनजाति का पारंपरिक निवास क्षेत्र है। चर्मा नदी, काली नदी की सहायक नदी है। इन दोनों नदियों (स्थानीय भाषा में ‘गाड़’) के बीच का क्षेत्र राजी समुदाय का मूल निवास है।
राजी जनजाति के कुछ परिवार पश्चिमी नेपाल में भी बसे हुए हैं। पिथौरागढ़ की डीडीहाट और धारचूला तहसीलों के 9 गाँवों में राजी परिवार निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त, चंपावत ज़िले के खिरद्वारी और तराई-भाबर क्षेत्र के चकरपुर में भी इनके कुछ परिवार प्रवासित हुए हैं। धारचूला तहसील के चार गाँव — किमखोला, भक्तिरवा, गाणागाँव और चिफलतरा — और डीडीहाट तहसील के कूटा चौरानी, मदनपुरी, कट्यूला, कंतोली (जमतड़ी), औलतड़ी और कुलेख (भागीचैरा) गाँवों में इनकी उपस्थिति है।
कुमाऊं की पहली जनजाति शौका (या भोटिया) और दूसरी जनजाति राजी मानी जाती है। इन्हें वनरौत, वनरावत, वनराऊत, वनमानुष, जंगल के राजा आदि नामों से भी जाना जाता है, लेकिन ‘राजी’ नाम सबसे अधिक प्रचलित है।
सघन वनाच्छादित क्षेत्रों में बसे तथा उन्हीं से उत्पादित वस्तुओं पर जीवन निर्वाह करने वाली इस जनजाति को ‘वनरावत’ या ‘वनरौत’ के नाम से भी जाना जाता है। लोककथाओं के अनुसार पिथौरागढ़ में पाल वंश का शासन था। आपसी मतभेद के कारण एक भाई को वन क्षेत्र प्रदान किया गया, जिसके वंशज वर्तमान में ‘राजी’ या ‘वनरावत’ कहे जाते हैं।
पारिवारिक व्यवस्था- राजी जनजाति की पारिवारिक व्यवस्था पारंपरिक और संयुक्त प्रकार की रही है, किंतु वर्तमान में यह धीरे-धीरे एकल परिवारों में परिवर्तित हो रही है। पारिवारिक प्रमुख सामान्यतः पुरुष होते हैं, लेकिन महिलाओं की घरेलू निर्णयों में सक्रिय भूमिका होती है। महिलाएं, पुरुषों के साथ मिलकर घर के खर्च का सामूहिक निर्णय लेती हैं। घर मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और घास से बने होते हैं।
सामाजिक व्यवस्था- राजी जनजाति, जिसे ‘वनरौत’ के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखंड का एक विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह है। इसकी सामाजिक स्थिति में कुछ अनोखे पहलू हैं, जैसे कि पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय संरचना तथा बुजुर्गों का समाज में विशिष्ट स्थान। पहले यह जनजाति जंगलों और गुफाओं में निवास करती थी। राजी समाज का संगठन नातेदारी और क्षेत्रीय आधार पर होता है।
समाज का प्रतिनिधित्व एकल परिवार द्वारा किया जाता है। विवाह के बाद नवदंपति नया निवास बनाते हैं और माता-पिता से अलग रहते हैं। राजी समाज की सामाजिक संरचना अत्यंत सरल है। इसमें कन्याल, राकल, पाल, चंद जैसी उपजातियां हैं। इनमें जाति-आधारित कोई भेदभाव नहीं होता और विवाह बहिर्गोत्रीय होते हैं। विवाह को दोनों परिवारों के समझौते के रूप में स्वीकार किया जाता है।
पूर्व में लड़का और लड़की विवाह से पूर्व जंगल में जाकर ‘तरुण’ (जड़ी-बूटी/वनस्पति) खोदते थे और लाकर लड़की के माता-पिता के सामने रखते थे। यदि लड़के द्वारा अधिक तरुण लाया जाता था, तो विवाह की स्वीकृति मिल जाती थी। यदि लड़का कमज़ोर या असफल रहता था, तो विवाह से मना कर दिया जाता था। वर्तमान समय में लड़का-लड़की आपसी सहमति से जंगल में जाकर विवाह करते हैं और बाद में घर आकर माता-पिता से आशीर्वाद लेते हैं। कुछ मामलों में पहले माता-पिता की अनुमति ली जाती है।
विवाह से पहले ‘सांगजांगी’ और ‘पीठा’ संस्कार की परंपराएं भी चली आ रही हैं। विवाह में वधू-मूल्य प्रथा प्रचलित है, जिसमें लड़के के परिवार द्वारा लड़की के माता-पिता को आर्थिक योगदान दिया जाता है। इससे विवाह में मदद मिलती है।
समाज में प्रचलित कहानियाँ- कुछ प्रचलित कहानियाँ के अनुसार, अस्कोट के राजा के दो पुत्र थे। एक बार दोनों जंगल में शिकार पर गए। बड़े भाई से अनजाने में गोहत्या हो गई। आत्मग्लानि में वह जंगल में रहने लगा और वहीं से ‘वनरावत’ समुदाय की उत्पत्ति हुई।
दूसरी कथा के अनुसार, दोनों भाइयों को एक घोड़ा मिला। छोटे भाई ने तुरंत घोड़े पर चढ़कर वहाँ से प्रस्थान कर दिया। बड़ा भाई घोड़े पर चढ़ने की तरकीब ढूंढता रहा और असफल होने पर आत्महत्या की सोचने लगा। जब वह नदी में छलांग लगाने वाला था, तब एक ‘बेल’ (तरुण की लता) ने उसे रोका और समझाया कि जंगल में रहकर उस बेल के फल से जीवन यापन करो। इसके बाद वह बेल की बात मान गया। इसी कारण से आज भी राजी जनजाति ‘तरुण’ को शुभ मानती है।
कृषि और विनिमय प्रथा- राजी जनजाति की जीवनशैली जंगलों पर आधारित रही है। वे काश्त कला और खेती में पारंगत थे। प्राचीन काल में जब वे अन्य समाज से नहीं जुड़े थे, तब वस्तु-विनिमय की प्रणाली का प्रयोग करते थे। वे गाँव वालों से सीधे संपर्क करने में झिझकते थे। गाँव के लोग जंगल में जाकर उनसे बर्तन बनवाने या लकड़ी का सामान बनाने को कहते थे। रात में वे बर्तन और सामान चुपचाप घर के बाहर रख कर चले जाते थे, बदले में गाँव के लोग उन्हें अनाज देते जिसे वे उस जगह पर रख देते थे। लेकिन अब ये प्रथा धीरे-धीरे बदल रही है और आज वे (राजी समुदाय) समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं।
शासकीय प्रयास और सामाजिक स्थिति- सरकार ने राजी जनजाति को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए हैं। किंतु उनकी जनसंख्या कम होने के कारण राजनीति में उन्हें उचित भागीदारी नहीं मिलती। वे आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अब भी काफी पिछड़े हुए हैं।
उत्पत्ति- कुछ विद्वानों के अनुसार, प्राचीन काल में गंगा-पठार क्षेत्र और नेपाल के कुछ भागों में कौल-किरात जातियों का निवास था। कालांतर में इनके वंशज ‘राजी’ कहलाए। उत्तराखंड राज्य में राजी सबसे कम जनसंख्या वाली जनजाति है।
भाषा-बोली- राजी जनजाति की भाषा में तिब्बती और संस्कृत शब्दों की झलक मिलती है। यह भाषा मुख्यतः मुंडा समूह की मानी जाती है। राजी समुदाय की बोली हिंदी और पहाड़ी भाषाओं से भिन्न है तथा कुछ शब्द भोटिया बोली से मिलते-जुलते हैं। दुर्भाग्यवश नई पीढ़ी में हिंदी का चलन बढ़ने से इनकी बोली विलुप्त होने की कगार पर है।
पहनावा- राजी जनजाति के पुरुष पारंपरिक रूप से घोती, अंगरखा, पगड़ी और चोटी रखते हैं। महिलाएं ओढ़नी, लहंगा और चोली पहनती हैं। आधुनिकता के प्रभाव से अब पुरुष पैंट-कमीज़ तथा महिलाएं साड़ी, ब्लाउज, धोती और सलवार-कमीज़ पहनने लगी हैं।
महिलाओं की स्थिति- राजी महिलाओं की भूमिका बहुआयामी है। वे कृषि, पशुपालन, जल-संग्रह, घर के काम और पारंपरिक ज्ञान में दक्ष होती हैं। हालांकि, शिक्षा और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सीमित है।
शिक्षा की स्थिति- राजी समुदाय में शिक्षा की स्थिति बेहद कमज़ोर है। विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति कम है और शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी है। हालांकि, कुछ युवा अब उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था- राजी जनजाति के अधिकांश परिवार सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। परंपरागत चिकित्सा और झाड़-फूंक अभी भी प्रचलित है। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।
बुजुर्गों की स्थिति- राजी समाज में विवाह के बाद नए परिवार अलग हो जाते हैं, जिससे बुजुर्गों को अकेले जीवन यापन करना पड़ता है। वे अपनी आजीविका स्वयं जुटाते हैं और सरकार की खाद्य सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेते हैं। वे पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सामुदायिक सहभागिता- राजी जनजाति का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन सामूहिक सहभागिता पर आधारित है। यह जनजाति शिकारी-संग्राहक जीवनशैली से विकसित होकर आज भी सामुदायिकता की भावना को बनाए हुए है।
- विवाह समारोह, मृत्यु, और त्योहारों में पूरा समुदाय सम्मिलित होता है।
- सामूहिक रूप से भोजन, आयोजन और निर्णय लिए जाते हैं।
- हालांकि, सरकारी योजनाओं में इनकी भागीदारी अभी तक सीमित है।

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