सुरेश राठौर:

पूजा गोंड, उत्तर प्रदेश के वीरभानपुर गाँव की रहने वाली हैं। उनका जीवन एक साधारण ग्रामीण लड़की से शुरू हुआ, लेकिन आज वो गाँव की किशोरियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनका सफ़र संघर्षों, आत्म-निर्भरता और बदलाव की मिसाल है।

परिवार और पढ़ाई: पूजा के परिवार में आठ लोग हैं – माता-पिता, चार बहनें और दो भाई। उनके पिताजी सिर्फ 5वीं तक पढ़े हैं, लेकिन उन्होंने फल बेचने का काम करके अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। पूजा और उनकी बहनों ने स्नातक (बी.ए.) तक पढ़ाई की है। उनका एक भाई दिल्ली से एम.बी.बी.एस. कर डॉक्टर बन गया है और दूसरा भाई वकालत (एल.एल.बी.) कर रहा है।

शादी और संघर्ष की शुरुआत: 2014 में, जब वह इंटर में थीं, तभी पूजा की शादी मुंबई के उमेश गोंड से कर दी गई। परिवार ने कहा कि शादी के बाद भी पढ़ाई कर सकती हो। शादी के बाद पूजा ने बी.ए. पूरा तो किया, लेकिन ससुराल वालों ने पढ़ाई बंद करा दी और कहा कि अब सिर्फ घर का काम ही करना है। शादी के बाद पूजा को अपने पति से प्यार या साथ नहीं मिला। वो अक्सर पूजा को अकेले छोड़कर दोस्तों के पास चले जाते थे। पूजा ने पूरे 7 साल तक रिश्ता निभाने की कोशिश की, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। समाज और परिवार के दबाव में उन्होंने बहुत कुछ सहा।

घर वापसी और नई शुरुआत: 2020 में जब उनकी छोटी बहन की शादी थी, तब वह अपने मायके वापस आ गईं, और फिर कोविड लॉकडाउन लग गया। यह उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ था। उन्हें पहले से सिलाई का काम आता था, तो उन्होंने घर पर लड़कियों को सिलाई सिखाना शुरू किया। फिर उनकी मुलाकात मनरेगा मज़दूर यूनियन से हुई, जहाँ उन्हें सिलाई शिक्षिका के रूप में काम मिला।

संगठन से जुड़कर जीवन बदला: संगठन के साथ काम करते हुए उन्होंने न सिर्फ लड़कियों को सिलाई सिखाना शुरू किया, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। लड़कियाँ उनकी दोस्त जैसी बन गईं। धीरे-धीरे उन्हें बिहार जैसे दूसरे राज्यों में मीटिंग और ट्रेनिंग में जाने के मौके मिलें, जिससे उन्हें दुनिया को समझने का नया नज़रिया मिला।

“शमता किशोरी युवा मंच” के साथ काम: अब वह मनरेगा मज़दूर यूनियन के “शमता किशोरी युवा मंच” से जुड़कर गाँव की लड़कियों को उनके अधिकारों और हिम्मत के बारे में जागरूक कर रही हैं। वे लड़कियों को बताती हैं कि वो भी आत्मनिर्भर बन सकती हैं, अपने फैसले खुद ले सकती हैं, और उनके साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठा सकती हैं। पिछले ढाई सालों में उन्होनें ने सैकड़ों किशोरियों को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से कई आज अपने घर से सिलाई करके कमाई कर रही हैं।

आज की पूजा – वह आज भी अपने पति से कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं ताकि उन्हें उनका हक़ मिल सके। लेकिन उन्हें कोई पछतावा नहीं है। वे कहती हैं कि – “मैं अब आत्मनिर्भर हूँ और दूसरों को भी आत्मनिर्भर बना रही हूँ। यही मेरी असली जीत है।” शुरू में उनके परिवार को भी डर था कि वह बाहर जाकर काम करेंगी तो क्या होगा। लेकिन आज उनके घरवाले भी उनके काम पर गर्व करते हैं।

पूजा गोंड की कहानी हजारों ग्रामीण लड़कियों की कहानी है – जहाँ समाज उन्हें पीछे खींचता है, लेकिन अगर उन्हें एक मौका और थोड़ा साथ मिले, तो वो खुद भी बदल सकती हैं और दूसरों की ज़िंदगी भी। पूजा आज प्रेरणा हैं, साथी हैं, और बदलाव की मिसाल हैं।

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  • सुरेश राठौर बनारस, उत्तर प्रदेश में रहते है और नरेगा के अंतर्गत महिला मज़दूरों के मुद्दों पर काम करते है ।

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