डॉ. रिंकी कुमारी:

भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेशों में शामिल बिहार, आज विस्थापन और बेरोज़गारी की दोहरी मार झेल रहा है। यहाँ की मेहनतकश जनता, विशेषकर युवाओं को रोज़गार की तलाश में अपना घर, गाँव और पहचान छोड़ कर अन्य राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता है। यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय त्रासदी भी है – जिसमें घर छूटता है, संबंध बिखरते हैं, और पहचान खोती जाती है। बिहार में विस्थापन का इतिहास कोई नया नहीं है। ब्रिटिश काल से लेकर अब तक, यहाँ के श्रमिक देश-विदेश में काम की तलाश में जाते रहे हैं। आज़ादी के बाद भी स्थिति नहीं बदली। औद्योगिक विकास की कमी, शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण की सीमित पहुँच, तथा राजनीतिक अस्थिरता ने स्थिति को और विकराल बना दिया। आज भी लाखों लोग उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा आदि राज्यों में मज़दूरी, निर्माण कार्य, होटल-रेस्तरां, ट्रांसपोर्ट और खेती के क्षेत्र में काम करने को विवश हैं। कई बार वे अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं। न्यूनतम मज़दूरी, स्वास्थ्य सुरक्षा की कमी, और अपमानजनक व्यवहार जैसी स्थितियाँ आम हैं।

    बिहार में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन स्थानीय रोज़गार के अवसर न के बराबर हैं। औद्योगिक इकाइयाँ नहीं के बराबर हैं। कृषि पर निर्भरता अधिक है, लेकिन आधुनिकता और संसाधनों का अभाव है। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं, और प्राइवेट सेक्टर अब तक मज़बूत नहीं हो पाया। इन सबके कारण, योग्य युवाओं को भी मजबूरी में बाहर जाना पड़ता है। यहीं से शुरू होती है एक असंतुलन की प्रक्रिया, जो न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी मानवीयता को चुनौती देती है। विस्थापन केवल भौगोलिक घटना नहीं है, यह भावनात्मक और सांस्कृतिक विस्थापन भी है। मज़दूरी के लिए गए लोग अक्सर अपमान, भेदभाव और हिंसा का शिकार होते हैं। कई बार उन्हें बाहरी’, ‘अनपढ़’ या ‘कमतर’ समझा जाता है, जिससे उनका आत्मविश्वास टूटता है। प्रवासी मज़दूरों की स्थिति कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखी – कैसे लाखों मज़दूर हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँवों की ओर लौटे, भूखे-प्यासे, थके और अपमानित होते हुए। 

   महाराष्ट्र, उन राज्यों में से एक है जहाँ लाखों प्रवासी बिहारी एवं अन्य उत्तर भारतीय काम करते हैं। निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों, होटल-रेस्तरां आदि में बिहारी मज़दूरों के प्रति दुर्व्यवहार, हिंसा किया जाता है। उन्हें अक्सर न्यूनतम मज़दूरी, औद्योगिक दुर्घटनाएं, और भाषा-संस्कृति के आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। वर्तमान विकास मॉडल में केवल शहरों का विस्तार और पूंजी केंद्रित उत्पादन है। गाँव, किसान, श्रमिक सभी को हाशिए पर छोड़ दिया गया है। जब कोई बिहारी युवक अपने गाँव में मेहनत करके भी पेट नहीं पाल सकता, तो वह अपने परिवार को छोड़कर दूसरे राज्य में ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ बनने को मजबूर होता है। वहाँ उसे सम्मान नहीं, केवल श्रम के बदले मज़दूरी मिलती है। न सुरक्षा, न स्थायित्व। यह परिस्थिति केवल बिहार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक संरचना के लिए खतरनाक संकेत है। आज समय आ गया है कि हम ‘विकास’ और ‘मानवता’ के रिश्ते को पुनः परिभाषित करें। विकास ऐसा हो जो स्थानीय रोज़गार सृजित करे, गाँवों को सशक्त बनाए, और लोगों को उनके मूल स्थान पर ही गरिमापूर्ण जीवन दे सके। बिहार की सांस्कृतिक विरासत, कृषि संसाधन, शिल्पकला, युवा शक्ति – इन सब में असीम संभावनाएँ हैं। इन्हें पहचान कर यदि सही दिशा दी जाए, तो न केवल विस्थापन रुकेगा, बल्कि मानवता भी सुरक्षित रहेगी।

  बिहार का विस्थापन एक आर्थिक नहीं, मानवीय समस्या है। यह केवल रोटी की खोज नहीं, स्वाभिमान, संबंध, और सांस्कृतिक अस्मिता की पीड़ा है। यदि हम मानवता को केंद्र में रखकर नीतियाँ बनाएं, और विकास के नए मानदंड स्थापित करें तो बिहार जैसे राज्यों को विस्थापन से मुक्ति मिल सकती है। यह केवल बिहार के लिए नहीं, बल्कि समूचे भारत की सामाजिक आत्मा के लिए आवश्यक है। सरकार और समाज दोनों को आगे आना होगा। 

  • स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना
  • तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना
  • शिक्षा को व्यावसायिकता से जोड़ना
  • कृषि आधारित स्टार्टअप और MSME को सहयोग देना
  • प्रवासी श्रमिकों के लिए नीति और संरक्षण तंत्र विकसित करना।

  स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना आज के सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत आवश्यक विषय बन चुका है, विशेषकर बिहार जैसे राज्यों में जहाँ रोज़गार की कमी और पलायन एक गंभीर समस्या है। स्थानीय उद्योग न केवल आर्थिक विकास का माध्यम बनते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों को उनके स्थान पर ही रोज़गार और सम्मानजनक जीवन प्रदान करते हैं। स्थानीय उद्योग वे छोटे-बड़े उत्पादन या सेवाक्षेत्र होते हैं जो किसी गाँव, कस्बे या ज़िले में उपलब्ध संसाधनों, कौशल और मांग को ध्यान में रखते हुए विकसित होते हैं। जैसे-

  • हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग
  • कृषि आधारित लघु उद्योग (मधुमक्खी पालन, डेयरी, आचार-पापड़ निर्माण)
  • कुटीर उद्योग (अगरबत्ती, मोमबत्ती, साबुन निर्माण)
  • टूलकिट, मरम्मत सेवा, फर्नीचर, काष्ठ शिल्प आदि।

स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना सिर्फ आर्थिक विकास का उपाय नहीं, बल्कि मानव गरिमा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक सशक्त कदम है। इससे हम न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत को एक नवीन, आत्मनिर्भर और मानवीय समाज में परिवर्तित कर सकते हैं। जहाँ कोई भी व्यक्ति पेट की भूख में अपनी मिट्टी और अस्मिता से दूर न हो।

     तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना एक ऐसा प्रभावी उपाय है जिससे युवाओं को कौशल आधारित शिक्षा प्रदान कर उन्हें रोज़गार योग्य, स्वावलंबी और उद्योगोन्मुख बनाया जा सकता है। विशेषतः बिहार जैसे राज्य, जहाँ बेरोज़गारी और पलायन बड़ी समस्याएँ हैं, वहाँ तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है। तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र केवल प्रशिक्षण का साधन नहीं, बल्कि वे एक नए बिहार के निर्माण की नींव हैं।  जहाँ युवा पलायन करने वाले नहीं, बल्कि रोज़गार देने वाले बनें। आज आवश्यकता है कि सरकार, समाज और निजी क्षेत्र मिलकर यह पहल करें, ताकि हर गाँव और हर ज़िले में कोई न कोई “कौशल केंद्र” हो जो न केवल हाथों को हुनर पर बल दिया जाता है। बिहार, जो भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों का केंद्र रहा है, आज एक ऐसे यथार्थ से जूझ रहा है जो उसकी युवा शक्ति, सामाजिक ढांचे और आर्थिक स्थिति को गहरे रूप से प्रभावित करता है। बेरोज़गारी, प्रवासी श्रम और कुशल श्रमिकों की कमी, इस राज्य के समक्ष विकराल चुनौती के रूप में खड़ी हैं। ऐसे समय में “तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना” एक ऐसा उपाय है, जो न केवल युवाओं को रोज़गार दिलाने में सक्षम है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, कुशल और सम्मानजनक जीवन जीने की दिशा में अग्रसर करता है।

   अतत: बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और श्रमिक परंपरा के बावजूद, यहाँ बेरोज़गारी और पलायन जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। इन समस्याओं से उभरने के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि ज़रूरत है ज़मीनी स्तर पर कौशल प्रशिक्षण को सशक्त करने की। यदि हर ज़िले, ब्लॉक, और गाँव स्तर पर तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जाए, तो बिहार न केवल रोज़गार में आत्मनिर्भर राज्य बनेगा, बल्कि एक नई सामाजिक क्रांति का केंद्र भी बनेगा। युवाओं को यदि हुनर मिले, मार्गदर्शन मिले और अवसर मिले तो वे रोज़गार मांगने वाले नहीं, रोज़गार देने वाले बन सकते हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. राष्ट्रीय कौशल विकास नीति (National Skill Development Policy), 2015
  2. “Vocational Education and Training in India” – UNESCO, 2019
  3. नवीन ग्रामोदय – ग्रामीण कौशल विकास विशेषांक (2022)

फीचर्ड फोटो आभार – https://www.humanrightsresearch.org/post/internal-migrants-in-india

Author

  • डॉ. रिंकी कुमारी / Dr. Rinki Kumari

    डॉ. रिंकी कुमारी वर्तमान में ओडिशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, संबलपुर के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है और उनका शोध कार्य समकालीन साहित्य, नारी लेखन तथा भाषा शिक्षण पर केंद्रित रहा है। वे हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ वे शोध, लेखन और सामाजिक मुद्दों पर भी गंभीरता से कार्य कर रही हैं। उनके कई शोध पत्र और लेख राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरक शिक्षिका के रूप में जानी जाती हैं।

     

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