अरविंद अंजुम:
प्रोफेसर दिलीप सिमियन
“क्षेत्रीयता का आग्रह हमारे जीवन का अभिशाप है, जबकि मेरी कल्पना का राज्य अनिवार्यतः भारतीय सरहद में समाकर रहेगा और अंततः वह इस पृथ्नी की सीमा तक फैल जाएगा, नहीं तो यह स्वतः नष्ट हो जाएगा।”
महात्मा गांधी, सितंबर 1947
“सत्य कभी मरता नहीं, लेकिन उसे भिखारी की तरह जीने को मजबूर किया जाता है”
एक यहूदी कहावत:
तीन परिकल्पनाए थी जिन्होंने महात्मा गांधी का पूरा जीवन आच्छादित कर रखा था ईश्वर, सत्य, और अहिंसा। वे इन्हें अलग-अलग खांचों में बंटा नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन के ताने-बाने में गुंथा हुआ देखते थे। सत्य की खोज में समर्पित उनका जीवन एक दार्शनिक जीवन है। सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के जी तोड़ प्रयास उन्होंने किए, उन्हें उनके गहन चरित्र से अलग नहीं किया जा सकता है। गांधी सामान्य जन के सद्गुणों से अपने लिए ताकत हासिल करते थे। वे आम जन के आदर्श प्रतीकों, उनके प्रिय आख्यानों, उनके काव्यों की भाषा में उनसे बात करते थे; और किसी राजनेता ने नहीं बल्कि इन्हीं सामान्य जन ने उन्हें महात्मा माना था। इस सब के साथ मनुष्य की गरिमा का गहरा बोध उन्हें स्थितप्रज्ञ या धीरात्मा बनाता था।
गांधी एक ज्ञानी व्यक्ति थे। आज मैं उनकी विवेकशीलता को समझने की कोशिश करूंगा, मेरा यह प्रयास काफी हद तक दूसरे विद्वानों की विद्धता के सहारे चलेगा।इसलिए इसमें जो कमी या चूक होगी, उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी।
गांधी ने अन्याय और सामाजिक बुराइयों से मुकाबला करने का उत्कट भावावेग था। वह यह भी जानते थे कि हर व्यक्ति की अंतरात्मा में अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष चलता रहता है। देशों और समुदायों के बीच चलने वाले संघर्षों से यह अलग चीज है। आज का दौर राजनीतिक नफरतों के बौद्धिक खेती का युग है।
राजनीति को लोग दोस्त- दुश्मन वाले रिश्ते से, परिभाषित करते हैं, तो गांधी इसे ‘दोस्ती और संवाद की प्रक्रिया के रूप में देखते थे। ” अगर राजनीति की एक परिभाषा छल -कपट के आवरण के रूप में की जाती है तो गांधी राजनीति में सच्चे आचरण पर, जीवन में सच्चे आचरण से कम जोर नहीं देते थे। मेकियावली, हॉब्स ,फ्रेंच जैकोबिन, कार्ल स्पिट और लेनिन समेत पश्चिम के तमाम राजनीतिक चिंतकों की पूरी परंपरा यह मानती है कि राजतंत्र मूलतः हिंसा पर आधारित होता है। गांधी मानते थे कि ऐसे विचार और ऐसे राज्यतंत्र अंततः विनष्ट हो ही जाएंगे।
गांधी विचार नैतिकता, धर्मशास्त्र और राजनीति के तत्वों के मिश्रण से तैयार होता है। जीवन की उनकी परिकल्पना आत्मीय तत्वों के निषेध की नहीं सर्वजन की सेवा के अवसर के रूप में की थी। कहा जा सकता है कि, गांधी अपनी आत्मा उन लोगों में साकार पाये थे जिन्हें इतिहास की बदकिस्मतियां भुगतान पड़ी थी। इसलिए 1917 में श्रम साध्य कोशिशो के बाद चंपारण के जिन भोले- किसानों से वे मिल सके थे और मुलाकात के बारे में वह यह कह सके थे कि यह अतिशयोक्ति नहीं बल्कि एकदम सच है कि उन किसानों के साथ अपनी मुलाकात में ईश्वर,अहिंसा और सत्य से मेरी सीधी मुलाकात हुई।
यहां चार ऐसी बातें हैं जो मुझे चिंतित करती है- सांस्कृतिक विविधता वाले समाज में उपनिवेशवाद विरोधी रणनीति की समस्या, धर्म या राष्ट्र की संकीर्णताओं के प्रदूषण से मुक्त सत्य के प्रति प्रतिबद्धता,बुराई की अवधारणा और एक कृपालु ईश्वर की अवधारणा के साथ उसकी असंगति और अपनी स्वार्थी वृत्ति तथा अंतरात्मा के द्वंद्व की स्थिति में अंतरात्मा के साथ जाने की मनुष्य की क्षमता।
अरविंद अंजुम द्वारा प्रसारित:
प्रोफेसर दिलीप सिमयन मेरे घनिष्ठ वैचारिक मित्र हैं।

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