रोहित चौहान:
गुजरात के महेमदाबाद तहसील के धूल-भरे किनारे पर, एक तीन साल के बच्चे की मौत ने बंधुआ मज़दूरी, जातीय शोषण और सरकारी उदासीनता की परतों को उजागर कर दिया। इसके बाद जो हुआ वह डर, प्रतिरोध और मज़दूरों की गरिमा की लड़ाई की कहानी है।
महेमदाबाद, गुजरात:
मई के पहले सप्ताह में, गुजरात के खेड़ा ज़िले में एक ज़बरदस्त तूफान आया। तेज़ हवाओं ने बिजली के खंभे गिरा दिए, कई गाँव अंधेरे में डूब गए, और पूरी रात ज़ोरदार बारिश होती रही। महेमदाबाद तहसील के एक गाँव में अगली सुबह एक छोटे बच्चे की मौत हो गई।
“पूरी रात बारिश होती रही,” मृतक के चाचा अशोक कश्यप ने कहा, जो निषाद समुदाय से हैं और एक बंधुआ मज़दूर हैं।
“बारिश का पानी हमारी झोपड़ी में घुस रहा था, इसलिए हमने पास में एक गड्ढा खोदकर पानी को उसमें मोड़ दिया। अगली सुबह जब महिलाएं खाना बना रही थीं और हम काम के लिए तैयार हो रहे थे, मेरा भतीजा उसी गड्ढे के पास खेल रहा था। पानी गंदा था। हमें समय रहते उसका पता नहीं चला।”
यह परिवार उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले से था और मौसमी ईंट भट्ठे के काम के लिए गुजरात आया था। अपने गाँव के एक ठेकेदार के ज़रिए इन्हें तीन अन्य परिवारों के साथ भर्ती किया गया था, जिसने उन्हें ₹30,000 की अग्रिम राशि और सीजन के अंत में पूरा वेतन देने का वादा किया था। लेकिन सीजन के अंत में भट्ठा मालिक और ठेकेदार ने कहा कि पिछली बार का “टूट” (कर्ज) बाकी है, और उन्हें अगली बार आकर इसे चुकाना होगा।
परिवार फंस गए। उनका वेतन रोक दिया गया, उनकी आवाजाही सीमित कर दी गई, और टूट चुकाने का डर हमेशा सिर पर बना रहा।
कोई जवाबदेही नहीं, भारी दबाव:
बच्चे की मौत को सीधे तौर पर भट्ठा मालिक की ज़िम्मेदारी नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक रोकी जा सकने वाली त्रासदी थी। जैसे भारत के कई अन्य राज्यों में ईंट भट्ठे हैं, वैसे ही यहाँ भी कोई सुरक्षित आश्रय, जल निकासी या बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। लेकिन मज़दूरों के लिए ऐसी दुर्घटनाएं उनके काम का हिस्सा बन चुकी हैं, और वे यह सवाल नहीं उठाते कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है।
“ऐसी दुर्घटनाएं हर साल भट्ठों में होती हैं। लेकिन इसे मालिक की गलती नहीं माना जाता, जबकि वह रहने की सुरक्षित व्यवस्था देने का ज़िम्मेदार होता है”– रमेश श्रीवास्तव, ईंट भट्ठा मज़दूर यूनियन (IBMU)
परिवार ने किसी तरह का मुआवज़ा नहीं मांगा। बल्कि भट्ठा मालिक ने उन्हें पोस्टमार्टम न कराने की सलाह दी, कहकर कि बच्चे का शव काटा जाएगा और यह अपशकुन होगा। डरे हुए और घर लौटने के लिए बेताब परिवार ने बच्चे को चुपचाप दफना दिया।
“हम बस अपना बकाया पैसा लेकर निकलना चाहते थे,” अशोक ने कहा।
“लेकिन मालिक ने कहा, ‘तुमने मेरा पैसा लिया है, अब काम करके चुकाना होगा।’”
ग़म के बावजूद, उन्हें फिर से काम पर लौटना पड़ा।
शोषण का स्वरुप:
यह मामला सिर्फ एक दुखद मौत या वेतन न मिलने की घटना नहीं है — यह एक गहरे स्वरूप को उजागर करता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ से हर साल प्रवासी मज़दूर गुजरात आते हैं। वे बिना किसी औपचारिक अनुबंध के काम करते हैं, साइट पर ही झोपड़ियों में रहते हैं, और जाति आधारित ढांचे में बंधुआ कर्ज के जाल में फंसे रहते हैं।
न कोई लिखित अनुबंध होता है, न कानूनी सुरक्षा, न ही सरकार की ओर से निगरानी — जैसे कि श्रम निरीक्षक या ज़िला श्रम अधिकारी — जो इन भट्ठों की स्थिति की जांच और निगरानी करें।
2024 में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन (CLRA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के 84% ईंट भट्ठा मज़दूरों के पास कोई लिखित अनुबंध नहीं था, 90% को वेतन में देरी या कटौती का सामना करना पड़ा, और 60% से ज़्यादा असुरक्षित झोपड़ियों में रहते थे जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि असुरक्षित हालात की वजह से कई बच्चों की मौतें और चोटें हुईं, लेकिन ये मामले न तो दर्ज किए गए, न ही मीडिया तक पहुंचे। IBMU के पास भी पिछले कुछ वर्षों में केवल दो मामलों की सूचना आई, जहां बच्चों की या तो मौत हुई या वे घायल हुए।
IBMU की मीना जादव ने गुजरात और उत्तर प्रदेश सरकारों की “पूर्ण रूप से गैर-जवाबदेही” की आलोचना की।
“दोनों सरकारें एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी टालती हैं और कोई जवाबदेह नहीं होता,” उन्होंने कहा।
“इन बच्चों को शिक्षा से वंचित रखकर राज्य उन्हें अनौपचारिक मज़दूरी के जीवन में धकेल रहा है। हमने देखा है कि किस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी यही चक्र चलता रहता है — बचपन से लेकर बड़े होने तक वे ईंट भट्ठों में मज़दूरी करते हैं। उनके लिए कुछ नहीं बदलता।”
प्रतिरोध और प्रतिशोध:
बच्चे के दफन के एक दिन बाद, अशोक कश्यप, श्याम, राजू और सुजान — चारों एक ही गाँव और जातीय पृष्ठभूमि से — मदद के लिए आगे आए। उन्होंने ईंट भट्ठा मज़दूर यूनियन (IBMU) से संपर्क किया और बताया कि उन्हें ₹5,000 से ₹10,000 तक की मजदूरी नहीं दी गई है और उन्हें भट्ठे से बाहर जाने नहीं दिया जा रहा है। मालिक पुराने टूट (कर्ज) का हवाला देकर पैसे रोक रहा था।
IBMU ने खेड़ा कलेक्टर के पास बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज की। लेकिन तत्काल राहत देने के बजाय, प्रशासन ने मजदूरों से कहा कि जब तक मामला ‘समीक्षा’ में है, वे भट्ठे पर लौट जाएं।
इसके बाद तेजी से प्रतिशोध हुआ। मालिक ने अशोक और राजू को बुलवाया और उन्हें जबरन स्थानीय पुलिस स्टेशन ले गया। उनके फोन छीन लिए गए और उन पर झूठे आरोप लगाने की धमकी दी गई। डर के कारण श्याम और सुजान भट्ठे से भागकर पास के जंगल में छिप गए।
उत्तर प्रदेश में मज़दूरों के रिश्तेदारों के संपर्क में रह रहे पंजाब के सामाजिक कार्यकर्ता अमरजीत ने IBMU को जानकारी दी। अमरजीत ने कुछ ऑडियो क्लिप भेजीं जिनसे पता चला कि पुलिस डराने की कोशिश कर रही थी और मज़दूरों को झूठे ड्रग केस में फंसाने की योजना थी।
IBMU ने मामले को कलेक्टर तक पहुँचाया और दबाव बढ़ाया। वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने ज़िला प्रशासन से हस्तक्षेप करने की मांग की। इसके बाद, महेमदाबाद के तहसीलदार और पुलिस निरीक्षक भट्ठे पर पहुँचे।
सरकारी इनकार और दबाव में मुस्कानें:
पुलिस स्टेशन में मौजूद कार्यकर्ताओं और मज़दूरों के अनुसार, प्रशासन की शुरुआती प्रतिक्रिया पूरी तरह से इनकार की थी।
तहसीलदार, पुलिस और श्रम विभाग ने कहा कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं। कुछ समय बाद एक वीडियो सामने आया, जिसमें कुछ मजदूर कैमरे पर मुस्कुराते हुए दिखे और कह रहे थे कि उन्हें मालिक से अच्छा व्यवहार मिला है। अशोक ने कहा, “वे डर के मारे ऐसा कह रहे हैं। उन्हें पता है बोलने का क्या अंजाम होता है।”
इसी दौरान, पुलिस ने रात में अशोक और राजू को रिहा कर दिया और उन्हें फिर से भट्ठे लौटने को कहा। लेकिन वे भाग गए और अगली सुबह IBMU से संपर्क किया। यूनियन की टीम चारों मज़दूरों से मिली और सभी मिलकर महेमदाबाद पुलिस स्टेशन पहुंचे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अब भट्ठे नहीं लौटेंगे।
दोपहर में, मालिक लगभग 15 लोगों के साथ थाने पहुँचा, जिनमें कुछ मज़दूर भी थे जो पहले वीडियो में मालिक के पक्ष में बोले थे। माहौल तनावपूर्ण हो गया। एक व्यक्ति, जो खुद को मज़दूर का पिता बता रहा था, कहने लगा कि उसका बेटा मालिक के साथ ही रहेगा। पुलिस मूकदर्शक बनी रही। जब यूनियन ने एक ऐसा दस्तावेज़ साइन करने से मना कर दिया जिसमें उन्हें ‘अवरोधक’ बताया जा रहा था, तो मामला अटक गया।
इसके बाद एक बंद कमरे में बैठक हुई। थाने में कुछ अजनबी लोग यूनियन के सदस्यों से सवाल पूछने लगे। रात 8 बजे तक कोई हल नहीं निकला।
आख़िरकार रात करीब 11 बजे पुलिस और मालिक भट्ठे गए और वहाँ मौजूद अन्य मज़दूरों — जिनमें महिलाएं, बच्चे और रिश्तेदार शामिल थे — को ट्रैक्टर में बैठाकर पुलिस स्टेशन लाया गया। चारों मज़दूर पहले से ही थाने में मौजूद थे। सभी 30 लोग एक साथ पुलिस स्टेशन में इकट्ठा हो गए।
पुलिस ने उन्हें यात्रा भत्ता दिया और वापस घर भेजने की व्यवस्था की। अगली सुबह तक सभी परिवार उत्तर प्रदेश अपने घर पहुँच चुके थे।
पुलिस की चुप्पी:
“हमारी रिपोर्ट के अनुसार, मौत एक दुर्घटना लगती है। किसी तरह की बाहरी चोट या दुर्भावना का संकेत नहीं मिला, और परिवार ने पोस्टमार्टम की मांग भी नहीं की,” – भरत डाभी, सहायक सब इंस्पेक्टर, महेमदाबाद पुलिस स्टेशन।
“हम इन मज़दूरों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में क्या प्रक्रिया अपनाई जाए, यह हमें भी स्पष्ट नहीं है। मालिक ने लिखित समझौते दिखाए हैं और दावा किया है कि मज़दूरों पर उसका बड़ा बकाया है।”– एएसआई डाभी
मज़दूरों के अनुसार, बच्चे की मौत का कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया। बकाया वेतन भी नहीं मिला। भट्ठा पहले की तरह चालू रहा।
प्रतिरोध की एक किरण:
IBMU के समर्थन से, चारों परिवार अब एक सामूहिक शिकायत दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं। यूनियन ने दीर्घकालिक पुनर्वास, बच्चे की मौत का मुआवज़ा और ज़िम्मेदार लोगों पर आपराधिक कार्रवाई की मांग की है। साथ ही उन्होंने बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन अधिनियम के सख़्त क्रियान्वयन और नियमित निरीक्षण की मांग की है।
“वह सिर्फ एक बच्चा था,” अशोक ने अपने भतीजे की तस्वीर दिखाते हुए कहा।
“अगर हमारे पास घर होता, नौकरी होती, ज़मीन का एक टुकड़ा भी होता — तो हम यहाँ कभी नहीं आते। हमें भूख ने यहाँ लाकर खड़ा किया। उसी भूख ने हमारे बच्चे को हमसे छीन लिया।”
भारत के ईंट भट्ठों में ऐसी दुर्घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं। जो दुर्लभ है वह है इनके खिलाफ आवाज़ उठाना। बंधुआ मज़दूरी की चुप्पी के बीच ये आवाज़ें उभरीं — और शायद यहीं से एक शुरुआत होती है।
बाल मज़दूरी और ‘पारिवारिक काम’ के बीच धुंधली रेखा:
ईंट भट्ठों में काम करने वाले मज़दूरों के बच्चे अक्सर किसी भी संस्थागत समर्थन से वंचित रहते हैं। कई बार वे अपने माता-पिता के साथ काम करना शुरू कर देते हैं। ये बच्चे मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिणी हिस्से और गुजरात के पूर्वी क्षेत्रों के आदिवासी परिवारों से आते हैं। इन परिवारों के साथ बच्चे भी पलायन करते हैं, और शिक्षा की पहुंच न होने के कारण वे कम उम्र में ही ईंट ढोने या बनाने में हाथ बंटाने लगते हैं।
इससे बाल मज़दूरी और पारिवारिक काम के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
भट्ठों में आंगनवाड़ी केंद्र लगभग नहीं के बराबर हैं। सरकार तकनीकी रूप से एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) के तहत प्रवासी बच्चों को कवर करती है, लेकिन हकीकत में इन भट्ठों में कोई आंगनवाड़ी केंद्र चालू नहीं होता। एक प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश भट्ठों को अस्थायी बस्तियाँ माना जाता है, जो नियमित सेवाओं के दायरे से बाहर होती हैं।
सरकारी योजना ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के तहत कुछ विशेष प्रशिक्षण कक्षाएं चलती हैं, लेकिन वे भी कागज़ों तक सीमित हैं। शिक्षकों को कम और अनियमित वेतन मिलता है, और कई बच्चों को भाषा की समस्या होती है — खासकर वे बच्चे जो हिंदी भाषी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ से गुजरात आते हैं।
कुछ NGO प्रयास भी मौजूद हैं। सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन (CLRA) राजस्थान के भीलवाड़ा और अजमेर ज़िलों में मौसमी बच्चों के लिए शिक्षा केंद्र चलाता है, जहाँ बुनियादी पढ़ाई और मिड-डे मील की व्यवस्था होती है। IBMU के एक प्रतिनिधि ने बताया, “गुजरात में हमें सिर्फ एक कार्यशील बाल कक्षा के बारे में पता है, जो गांधीनगर के अडालज में HM ब्रिक्स में चल रही है। इसके अलावा हमें कहीं और ऐसी कोई सुविधा नहीं दिखी।”
CLRA Report:
संपादन: राधा रजाध्यक्ष

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