श्रुतिका साह:

छलांगो और छलांगो…
कभी आसमां जकड़ने की कामना से छलांगो,
कभी तपते सूरज को लाठी पर से सरकाने की उम्मीद से छलांगो,
कभी कोहरे से बुदबुदाने के लिए छलांगो,
कभी ऊपर फैली नीली चादर को घर की छत पर सुखा सकने की ज़िद से छलांगो;
इतनी महत्वाकांक्षा से छलांगो
कि जब तुम हवा में हो
तुम्हारे पैरों तले समूची सृष्टि घूम जाए
और जब तुम उतरो
तो रीढ़ की हड्डी पर एक गहरी चोट लेकर उतरो
और मैं मरहम न कर पाऊं।

क्या ऐसा संभव है कि
तुम्हारे उछलते ही मैं कोणीय वेग से चली जाऊं
और तुम मेरी कोख में न गिर सको ?
क्या ऐसा संभव है कि तुम्हारी चोट पर
मैं व्यथित न होऊं ?
और क्या ऐसा संभव है कि
तुम्हारे उछलते ही मैं समूची सृष्टि को अपने अंचल पर बांधती हुई
तुम्हारे पैरों के पौर से तिर्यक रेखा में गमन कर जाऊं
नहीं न…….?
तो जड़त्व इसके अलावा और कुछ है भी नहीं;
जिस प्रकार…..
मैं मातृत्व से परे अपनी कोख छोड़कर जा नहीं सकती
ठीक उसी प्रकार ये ज़मीं तुम्हारे उछलने पर भी
तुम्हें छोड़कर घूम नहीं सकती।

तो अब तुम छलांगो…
और छलांगो…..
आसमां जकड़ने की कामना से छलांगो,
तपते सूरज को लाठी पर से सरकाने की उम्मीद से छलांगो,
कोहरे से बुदबुदाने के लिए छलांगो,
ऊपर फैली नीली चादर को घर की छत पर सुखा सकने की ज़िद से छलांगो।
डरो मत जड़त्व कहता है
तुम हर बार आकर मेरी गोद में गिरोगे
पर याद रहे
अबके आसमां लेकर ही गिरना।

Author

  • श्रुतिका साह / Shrutika Sah

    श्रुतिका साह द्वाराहाट अल्मोड़ा (उत्तराखंड) की रहने वाली हैं। इनहोनें भौतिक विज्ञान में परास्नातक किया है। वर्तमान में अभी वे जिम कॉर्बेट इंटरनेशनल स्कूल बागेश्वर उत्तराखंड में शिक्षिका हैं। और साथ ही उन्हें 2021 में काव्य श्री (विश्व रिकॉर्ड कवि सम्मेलन) में सम्मानित किया गया। 

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