करिश्मा और रजिया :
उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल खेती-किसानी में अग्रिणी होने के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे रहा है। यहाँ का समाज दो वर्गों में विभाजित है। पहला धार्मिक और जातीय आधार पर तो दूसरा शिक्षा और आर्थिक आधार पर। लेकिन ऐसा नहीं है कि शिक्षित और आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग में धार्मिकता और जातीयता नहीं है।
पूर्वांचल की भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह पूरब में बिहार, झारखंड से लगा है, तो उत्तर पूर्व में नेपाल, दक्षिण में बुन्देलखंड और मध्य प्रदेश से लगा हुआ है, पश्चिम में अवध-लखनऊ सब डिविजन से घिरा हुआ है। पूर्वांचल तीन भू-भागों में बंटा है। उत्तर पूर्व में विशाल तराई का क्षेत्र है, दक्षिण में विंध्याचल की पहाड़ी है। बीच में गंगा, गोमती, घाघरा के अलावा सैकड़ों नदियों का विशाल मैदानी क्षेत्र है।
जौनपुर जिले में 1740 ग्राम पंचायतें और 3290 ग्राम सभाएं है, 27 थानें, 21 ब्लाकों वाला हमारा जिला जौनपुर ऐतिहासिक रूप से प्रदेश में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जौनपुर 1394 से 1479 ईश्वी तक शर्की वंश के शासकों की राजधानी के रूप में आबाद रहा। शर्की वंश का संस्थापक मालिक उसशर्क था। उसके बाद उसका दत्तक पुत्र मुबारकशाह और फिर इब्राहीम शाह शर्की गद्दी पर बैठा। 1504 ईश्वी तक शर्की वंश का शासन चलता रहा। 1505 में जौनपुर मुगल साम्राज्य के अधीन हो गया। जौनपुर में कई ऐतिहासिक इमारतें आज भी अपनी भव्यता और विशालता के साथ खड़ी अपनी प्राचीनता पर इतरा रही हैं।
जौनपुर त्रिकोणीय धार्मिक शहरों- उत्तर में अयोध्या, दक्षिण में काशी और दक्षिण पश्चिम में प्रयागराज के बीच में अपनी बदनसीबी पर आँसू बहा रहा है। जौनपुर को राजनीतिक-आर्थिक रूप से उपेक्षित जिले के तौर पर देखा जा सकता है। उपेक्षा के कारण जौनपुर विकास की दौड़ में अपने पड़ोसी ज़िलों से मीलों दूर है जिसका दंश जौनपुर वासियों को झेलना पड़ रहा है, जौनपुर में गाँवों की हालत तो और भी दयनीय है।
आज हम सब बात करने वाले हैं जौनपुर नगर से सटे ग्राम प्रेमापुर और पारापट्टी ग्राम सभाओं में रहने वाली महिलाओं और लड़कियों की। मेरा नाम करिश्मा है और मैंं बी.एस.सी. प्रथम वर्ष की विद्यार्थी हूँ। मैंं अपने समुदाय के बच्चों के लिए निःशुक्ल दिशा लर्निग सेंटर चलाती हूँ। सेंटर के माध्यम से बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए प्रयास कर रही हूँ, साथ ही समाज और देश-दुनिया को समझने का प्रयास कर रही हूँ।
चलिए अब थोड़ी सी बात अपने गाँव पारापट्टी की करतें हैं। मेरा गाँव करंजाकला ब्लाक की एक ग्राम पंचायत है, जिसकी कुल आबादी तीन से चार हजार के करीब है, दो ग्राम सभाओं को मिलाकर इसे समग्र ग्राम पंचायत बना दिया गया है। पारापट्टी और धर्मशारी ग्राम सभाओं को जोड़ कर समग्र ग्राम पंचायत पारापट्टी के नाम से जाना जाता है। ग्राम पंचायत में प्रमुख रूप से चार जातियों के लोग निवास करते हैं- भूमिहार ठाकुर, कायस्थ, यादव (अहीर) और दलित (चमार)। तीनों समुदायों में सबसे बड़ी आबादी दलित समुदाय की है, लेकिन विपन्नता और बेकारी के साथ ही साथ अशिक्षा, और अंधविश्वास, कुरीतियाँ और बेगारी जैसी समस्या आज भी देखी जा सकती हैं।
मेरी बस्ती के चारों तरफ ठाकुरों, ब्रहामणों और यादवों के खेत हैं। यहाँ तक कि बस्ती में मोटर साइकल से भी कोई आराम से नहीं आ सकता। बस एक तरफ से ही कोई गाड़ी प्रवेश कर सकती है, वह भी आधी बस्ती के बाद अन्दर नहीं पहुँच सकती है। हम लोग खुद घर से अपनी साईकल घसीट कर सड़क तक ले कर आते हैं। गाँव के ज्यादातर लड़के मिडल या हाइ स्कूल के बाद कमाने के लिए दूसरे बड़े शहरों को पलायन कर जाते हैं। मेरे गाँव में सोलह–सत्रह साल के बाद एक भी लड़का ढूढनें से नहीं मिलेगा। सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र आते–आते ज़्यादातर लड़कियों की शादी कर दी जाती है। बड़ी मुश्किल से ही कोई लड़की मिलेगी जो हाई स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई कर रही होगी। डेढ़ सौ से दो सौ परिवारों वाली बस्ती में एक भी सरकारी नौकरी वाला व्यक्ति नहीं है, प्राईवेट नौकरी में भी कोई किसी बड़े पद पर नहीं है।
देश को आज़ाद हुए सात दशक से ज़्यादा हो गए हैं लेकिन मेरे गाँव के जातीय, धार्मिक ढांचे में कुछ खास बदलाव नहीं आया है। गाँव में जाति के आधार पर छुआछुत उस तरह का नहीं है जैसा मेरी दादी-दादा के समय था। हाँ, आज भी बड़ी जाति के लोग अपने बर्तनों में दलितों को चाय–पानी देने से बचते हैं। कई घरों में आज भी इनके लिए अलग बर्तन रखे जाते हैं, ज़रूरत पड़ने पर दलितों के लिए इन बर्तनों का उपयोग करते हुए मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है।
जाति और धार्मिक आधार पर भेदभाव कम ज़रूर हुए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि भेदभाव समाप्त हो गया है। आज भी दलित जाति की महिलाओं, लड़कियों को देखने का तरीका बदला नहीं है। हमारे यहाँ एक कहावत है कि गरीब की लुगाई सबकी भौजाई, यह कहावत दलितों की महिलाओं और लड़कियों के साथ हमारे गाँव में आज भी लागू होती है। महिलाओं-लड़कियों के लिए मेरे गाँव का समाज वही पुराने समय वाला ही है। आज भी लड़की अपने मन से कोई फैसले नहीं ले सकती है, वह कहाँ जाएगी, किससे मिलेगी, क्या पहनेगी, क्या पढ़ेगी यह सब परिवार के मुखिया और समाज पर निर्भर है। लड़की यदि कहीं जा रही है या गई है, शाम तक नहीं लौटी तो लोग तरह–तरह की बातें करने लगते हैं। गलती किसी की भी हो, उंगली तो लड़की की तरफ ही उठेगी, जितना अपने माँ–बाप नहीं कहेंगे उससे ज़्यादा समाज कहता है।
जहाँ दुनिया इतनी तरक्की कर रही है वहीं हमारे आस–पास की महिलाओं, लड़कियों को आज भी अकेले कहीं जाने नहीं दिया जाता है, क्योंकि इस गाँव में बहुत कुछ पुराने तौर-तरीकों से चलता है। हमारे आस–पास का समाज पुरुष प्रधान है, जहाँ बाहरी मामलों में ही नहीं बल्कि महिलाओं के निजी ज़िंदगी के फैसले भी पुरुषों के ही होते हैं। महिला बस घर पर खाना बना सकती है और खेतों में काम कर सकती है, पढ़ाई-लिखाई के लिए कोई लड़की बाहर नहीं जा सकती। यदि कहीं, कोई लड़की अपने किसी काम से चली जाए या अपने किसी लड़के दोस्त से बात कर ले तो उसे गलत मान लिया जाता है, प्रेम करना तो आज भी समाज में महापाप माना जाता है।
एक महिला का जीवन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षा और सामाजिक, आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है हालांकि पूरे भारत की ग्रामीण महिलाओं को अक्सर कई तरह की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, जातीय, और लैंगिक चुनौतियों और असमानताओं के साथ परम्पराओं, रीती-रिवाजों, अधंविश्वासों और कुप्रथाओं का भी सामना करना पड़ता है। इन्हीं सबके बीच मैंं रजिया आज अपने गाँव प्रेमापुर की सैर पर आप सभी को ले चल रही हूँ। मेरा गाँव जौनपुर जिले के करंजाकला ब्लाक के पूर्वी दक्षिणी छोर पर जौनपुर आज़मगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग 128ए से सटा हुआ है। उत्तरी दिशा में स्थित, मिक्स आबादी वाला एक बड़ी ग्राम पंचायत है। गाँव में कई जाति के लोग एक साथ रहते हैं। दलित समुदाय से चमार जाति के लोगों की आबादी सबसे ज़्यादा है। दूसरे नंबर पर मुस्लिम समुदाय के नट जाति के लोग है, तीसरे नंबर पर यादव (अहीर) और फिर ब्राह्मण, लोहार (विश्वकर्मा), वैश्य गुप्ता, माली, धोबी आते हैं।
सभी जातियों की बस्तियां एक-दूसरे से मिक्स हैं, बस दलितों और मुस्लिम नट समुदाय की बस्ती बाकियों से अलग-थलग है। आज मैं जो बात करने वाली हूँ, वह मुख्य रूप से विभिन्न जातियों के अन्दर महिलाओं की स्थिति पर है। किसी ने कहा है कि दुनियां की सबसे अंतिम गुलाम महिलाऐं है। सबकी आज़ादी के बाद आखिरी आज़ादी महिलाओं की होगी, जिसके लिए वह आज भी संघर्षरत हैं।
मेरे गाँव में अलग–अलग जाति की महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और स्वतंत्रता के मामले में स्थितियां आलग–अलग हैं। पढ़ने-लिखने और जॉब करने की सबसे अधिक आज़ादी ब्राह्मण जाति की महिलाओं को है। उसके बाद पिछड़े समुदाय की महिलाओं को है। हालाँकि पिछड़ी जाति की लड़कियों को घर और खेती के काम करना अनिवार्य शर्त है। सबसे ख़राब स्थिति दलित और मेरे नट समुदाय की महिलाओं की है।
मेरे समाज की लड़कियों की स्थिति तो इतनी ख़राब है कि मैं उसे बयां भी नहीं कर सकती। रोज़मर्रा की ज़रूरतें भी बमुश्किल से पूरी हो पाती हैं। समाज के पुरुष मज़दूरी करते हैं या फिर गाँव–गाँव घूम कर कबाड़ इकठ्ठा करते हैं। चूँकि हमारे समाज में शादियाँ आपसी रिश्तों में ही होती हैं, इसलिए लड़कियों को लेकर परिवार और समाज बहुत सख़्त और हिंसात्मक है। मोहल्ले की एक लड़की यदि किसी से प्रेम कर भाग गई तो पूरे मोहल्ले की लड़कियों का बाहर निकलना बंद हो जाता है। यदि किसी के माता–पिता अपनी लड़की को कुछ करने की थोड़ी स्वतंत्रता देते भी हैं तो पड़ोसियों और गाँव वालों के ताने, व्यंग से तंग आकर वह भी अपनी बेटियों पर प्रतिबन्ध लगा देते हैं।
कमोबेश ग्रामीण भारत में महिलाओं, लड़कियों की यही कहानी है। शिक्षा और रोज़गार तक पहुँच ना के बराबर है। इसके पीछे मूल वजह जो मैं समझ पाई हूँ वह यह है कि समाज में महिलाओं को पूरी तरह से अधिकार विहीन रखा गया है। समाज की नज़र में महिला सिर्फ बच्चे पैदा करने, पुरुषों की फिज़िकल ज़रूरत पूरा करने और घर के अन्दर के कामों को करने के लिए बनी हैं। हजारों सालों से पितृप्रधान समाज ने महिलाओं के लिए एक हद को स्थापित करने में कामयाबी हासिल की। उसी हद का हवाला देकर महिलाओं को रोका जाता रहा है जो आज भी जारी है।
समाज में आज भी यह कहते हुए और व्यवहार करते हुए देखा जाता है कि लड़कियों को सर और सीना झुकर चलना चाहिए, किसी की बात का जवाब नहीं देना चाहिए, घर की इज्जत और मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए, लड़कियाँ ज्यादा पढ़कर क्या करेंगी, आखिरकार चूल्हा-चौका ही तो करना है आदि। आज भी लड़कियों के पैर पाथर की चाकी जैसे बधें हैं। यहाँ तक कि एक महिला अपनी निजी ज़िंदगी के फैसले भी नहीं ले सकती है। उसकी निजी ज़िंदगी के फैसले भी किसी न किसी रूप में पिता, भाई, पति ही लेते हैं, जिसका प्रभाव महिला के मानसिक, शारीरिक विकास पर दिखता है।
हमारी भी कहानी एक पिछड़े ग्रामीण वंचित समाज की सामान्य लड़की से अलग नहीं है। हमें भी उन्ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो एक ग्रामीण वंचित समाज की महिलाओं लड़कियों को करना पड़ता है। शुक्र है दिशा फाउंडेशन का जिसने हमारी बस्ती में बच्चों के लिए लर्निंग सेंटर की शुरुआत की और हमें अपनी पढ़ाई जारी रखने और देश-दुनिया-समाज के बारे में नई–नई बातें जानने-समझने का अवसर मिला है। लेकिन चुनौती अभी भी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। आज भी मेरे घर वाले दिन में सिखने–सिखाने या मीटिंग चर्चा के लिए जाने तो देते हैं, लेकिन यदि कोई कार्यक्रम दिन-रात का होता है या कई दिन का आवासीय होता है, तो जाने नहीं देते हैं। ऐसी समस्या मेरे साथ ही नहीं, समाज की ज्यादातर लड़कियों के साथ है।

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