निशा त्रिपाठी :
अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस दुनिया भर के 50 से अधिक देशों में मनाया जाता है। हमारे देश में इसे 24 जनवरी को मनाया जाता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 66/170 पारित कर 11 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस घोषित किया, ताकि दुनिया भर में लड़कियों के अधिकारों और उनकी चुनौतियों को मान्यता दी जा सके।
सावित्री बाई फुले समूह, फातिमा शेख समूह की सदस्याएं, किशोरियों और युवा लड़कियों के सशक्तिकरण के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं। इसी कड़ी में उन्होने कल, भोपाल के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र की 12 बस्तियों की 200 से अधिक किशोरियों के साथ, उनके सपनों और चाहतों को समझने के प्रयास किए। साथियों ने अलग-अलग जगह की बालिकाओं के लिखे-कहे अनुभवों को सभी के साथ साझा किया।
साथी सानिया बताती हैं कि भोपाल में जवाहर चौक स्थित ट्रांज़िट कैंप में रहने वाली रोशनी ने बताया कि उनका परिवार भोपाल में सैर सपाटा के पास, भदभदा पर रहता था। हमारे मकान बहुत पुराने थे। हम सब बहन-भाई वहीं पैदा हुए। आठ महीने पहले हमारे घर तोड़ के हम लोगों को यहाँ टीन के बने कैंप में रहने भेज दिया। यहाँ आकर मैंने देखा मेरे जैसी बहुत लड़कियां अपना घर, दोस्त, स्कूल सब छोड़कर अलग-अलग जगह से यहाँ आकर रह रहीं हैं। रागिनी, पूनम, बिन्ना, रोशनी ये सब अलग-अलग बस्तियों से विस्थापित होकर यहाँ अपने परिवार के साथ रह रहीं हैं। नई सहेलियाँ भी बना ली हैं। लेकिन रागिनी और पूनम बताती हैं कि वे पहले 2 साल पढ़ाई से पिछड़ी रहीं, 2 साल बाद निशा दीदी ने कागज़ बनवाए और कस्तूरबा स्कूल में एडमिशन दिलवाया। रोशनी ने कहा मैंने अपने बचपन में ब्यूटीशियन बनने का सपना देखा था। घर में इतनी दिक्कतें आई, सबसे पहले मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई, घर के कामों की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई।
13 वर्षीय बबीता जवाहर चौक ट्रांजेक्ट कैंप में रहती हैं। बबीता बताती हैं – मेरा बचपन से सपना है कि मैं पुलिस बनूं। मेरे मम्मी-पापा मज़दूरी करते हैं, घर में कोई नहीं रहता। मैं घर में सबसे बड़ी बहन हूं, मुझे ही घर का पूरा काम करना पड़ता है। मेरा स्कूल अपने छोटे बहन-भाइयों को संभालने के चलते चौथी क्लास में ही छूट गया था। मैं जब स्कूल जाती भी थी, तो वहाँ से कुछ भी लिखना-पढ़ना नहीं सीख पाई।
नया बसेरा बस्ती निवासी 22 वर्षीय सना लिखती हैं, जब मैं स्कूल जाती थी तो वहाँ हमारी टीचर्स हमें बहुत अच्छे से पढ़ाती थीं। मैं फोर्थ क्लास में वहाँ पढ़ाई कर रही थी, तो सोचा था कि मैं भी टीचर बनूँगी, मैडम की तरह। लेकिन घर में भाइयों के बीच अकेली बहन होने के कारण मुझे घर का काम करना पड़ता था। इसी वजह से कुछ साल पहले मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई और अब इस वर्ष मेरी शादी भी हो जाएगी।
अर्शी कक्षा 10वीं में पढ़ रही हैं। वे कहती हैं- आगे मुझे डॉक्टर बनना है। मैं ज़्यादा से ज़्यादा टाइम अपनी पढ़ाई को देती हूँ, लेकिन मुझे मेरी बहन को देखते हुए समझ आ रहा है कि डॉक्टर की पढ़ाई में बहुत खर्च आता है। मेरी अम्मी चूड़ी बनाती हैं, इतने पैसे में आगे पढ़ना बहुत मुश्किल है। घर की हालात देख के बार-बार लगता है सपना देखना भी चाहिए या नहीं, अभी मैंने अपना सपना छोड़ा नहीं है।
12 वर्षीय आलिया कहती हैं- मुझे सिंगर बनना है और मुझे गाना गाने का बहुत शौक है। पर मुझे कोई तेज आवाज़ में गाना नहीं गाने देता है। मेरा बहुत मन होता है ज़ोर से गाना गाने का।
11 वर्षीय असफ़ी कहती हैं- मैं डांसर बनना चाहती हूं, मुझे डांस करने का बहुत शौक है। मैं सोचती हूं कि मैं एक बहुत अच्छी डांसर बन सकती हूँ, मेरी अम्मी तो मुझे मेरा सपना पूरा करने में मदद करेंगी लेकिन शायद मेरे पापा, बड़े पापा, अब्बा जी मुझे डांस नहीं करने देंगे। मुझे उनसे डर लगता है।
11 वर्षीय इनायत को भी डांस करने का शौक है, लेकिन डांस की इजाज़त नहीं होने की वजह से अब वे अपने ख्वाब को बदल लेना चाहती हैं।
दैनिक ज़िंदगी की रोक टोक को लेकर किशोरियों ने अनुभव बताते हुए कई सवाल भी छोड़े:
- किशोरियों ने कहा कि हमें बचपन से बड़े होने तक स्कूल जाने को मिले और पढ़ाई पूरी करने को मिले। अगर काम के बाद घर आकर भी मुझे काम करना पड़ रहा है, तो लड़कों से भी स्कूल के बाद घर की ज़िम्मेदारी लेने को कहा जाए। सिर्फ़ लड़कियां ही घर क्यों देखें? वो ही घर की सारी जिम्मेदारी क्यों संभालें?
- राधा – अगर मुझे तैयार होना (सजना) अच्छा लगता है तो मुझे रोकते-टोकते क्यों हैं? मेरे लाली लगाने से क्या हो जाएगा?
- हमें कोई खेलने से न रोके, हम खेल पाएं।
- मोहल्ले में कोई भी माहिला हमें दौड़ते हुए देखकर टोक लगा देती हैं कि अब बड़ी हो रही हो, लड़की हो के दौड़ कैसे रही हो। लड़की होकर दौड़ना गलत है क्या?
- हमें बोला जाता है, घर घर खेलो। परिवार के लोगों की नज़रों के सामने खेलो। लड़कों के साथ मत खेलो। लड़कों के खेल मत खेलो। सड़क पे मत खेलो, घर के अंदर ही खेलो। बैठ के खेलो उचको-कूदो नहीं। पाँव खोल के नहीं खेलो। पेड़ों पे लटकने- टँगने वाले खेल मत खेलो।
इस तरह मम्मियाँ हमारी सहेलियों को, और सहेलियों की मम्मी लोग, हम लोगों को रोकती-टोकती हैं। ये अनुभव हमें बताते हैं कि लड़कियाँ सबसे आसान टारगेट बन जाती हैं। परिवारों में बालिकाओं के साथ यह व्यवहार, सामाज की सोच और पितृसत्तात्मक पारिवारिक परवरिश का ढर्रा है, जिसे चुनौती देने की ज़रूरत है। हम समाज में हर जगह किशोरियों, लड़कियों के साथ भेदभाव को कम होते नहीं देख पा रहे हैं।
ये अनुभव हमें बताते हैं कि सबसे आसान टारगेट बन जाती हैं, परिवारों में बालिकाओं के साथ यह चाहा अनचाहा व्यवहार सामाजिक सोच और पितृसत्तात्मक पारिवारिक परवरिश का ढर्रा है। जिसको चुनौती देने की जरूरत है। हम सामाजिक तौर पर हर जगह किशोरियों, लड़कियों के साथ भेदभाव को कम होते नहीं देख पा रहे हैं।
जब हम विकास की बात करते हैं उसमें हम बालिकाओं के हित कैसे देख रहे हैं, इसमें स्पष्टता लाने की ज़रूरत है। विस्थापन या कम वेतन में काम करने को मजबूर माता-पिता अपने परिवार और बच्चों की ज़िम्मेदारी अक्सर बड़ी लड़कियों को दे देते हैं। उनके बोझ के कारण और घर की बड़ी बेटी होने के चलते उस बच्ची का किशोरावस्था में ही विकास रुक जाता है। जब भी बस्तियाँ या दुकानें उजाड़ी जाती हैं, तो पैसों की तंगी से निपटने और पारिवार संभालने की ज़िम्मेदारियाँ घर की माहिला अपने ऊपर ले लेती है, साथ ही घर के भीतर की ज़िम्मेदारियाँ बेटियों पर आ जाती हैं। बच्चों को संभालना, साफ-सफाई, बर्तन साफ करने आदि काम को सबके काम की तरह नहीं देखा जाता और इन्हें महिलाओं और लड़कियों के हवाले कर दिया जाते है। जब तक किशोर-युवा लड़के और पुरुष इन जिम्मेदारियों में हिस्सा नहीं लेंगे, तब तक खासतौर पर मज़दूर व वंचित परिवारों की लड़कियों के लिए खेल के मैदान, स्कूल और बाकी जगहों तक पहुँचने के मौके बनना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।

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