हफ्सा नाज़ :
लहूलुहान हुँ मैं आज, सिर्फ़ मेरे अस्तित्व की वजह से,
खो रहा हुँ जान मेरी, मेरे धर्म की वजह से।
खिल्ली उड़ा रहा हैं, इस जहां का वासी आज,
खो रहा है सुकून अपना, भटकती राहगिरी की वजह से।
ना खाने को रोटी है, ना पीने को पानी है,
सर पर खुला आसमान है, खाली है जेबें सबकी।
ना नौकरी है पास, ना रहने का ठिकाना है,
बस नफ़रतों से दिलों को, भरता जा रहा ज़माना हैं।।
क्यों बात आख़िर इन मुद्दों पर, करता कोई नहीं है,
क्यों सरकार से सवालात, करता कोई नहीं है।
क्या ख़ौफ है दिलों में, या मुद्दों से भटके हुए हम हैं,
या झुठ के इन बदलों में, उलझे हुए से हम हैं ।।
हाथ में लेकर हथियार, खुश आज लोग बहुत हैं।
इस अंधेरे की राह में, मंज़िल नहीं कोई है।।
लेकर गुस्सा और जुनूनियत, यूँ जिए जा रहे है।
घमंड हैं झूठी धार्मिकता का, जेबें खाली भले हैं।।
सवालों की दिशा अब, इस देश में बदल गई है ।
मर रहे हैं मासूम, जनता भी हंस रही हैं।।
अंध विश्वास की चादर, बस ओढ़े जा रहे हैं ।
ना फ़िक्र है कोई कल की, बस जियें जा रहे हैं ।।
साथ देने के वादें, नेताओं से सुने बहुत हैं ।
हक़ माँगते हैं जब हम, मगरूर यह दिखते हैं ।।
ना देश की बेहतरी का कोई इरादा, ना तरक्की के सपने हैं।।
बस नफ़रतों से दिलों को, लोगों के यह भर रहें हैं ।।
ख़ामोशी जब तक, यह जानता इख़्तियार रखेगी।
ना बदलेंगे हालात, ना भारत तुम बदलोगे।।
दल-दल से नफ़रतों की, निकलकार कभी तो देखों।
हैं जहां यह खूबसूरत, अंधेरे से हटकर तो देखों ।।
सब साथ जब चलेंगे, तभी तरक्की होगी मुमकिन,
एक हाथ इंसानियत का, बढ़ाकर तो तुम देखों ।
एक हाथ इंसानियत का, बढ़ाकर तो तुम देखों ।।

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